धर्म के कुछ अच्छे इस्तेमाल की कोशिश की जानी चाहिए

संपादकीय
25 अगस्त  2016
धर्म को लेकर कोई अच्छी बात मुश्किल से ही कही दिखती है। ऐसे में एक तस्वीर अभी सामने आई जिसमें एक कृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी के चढ़ावे के दूध को बाहर बैठे भीख मांगते परिवारों के बच्चों को दिया गया और जिसे वे खुशी-खुशी पीकर अपनी माताओं के चेहरों पर भी खुशी बिखेर रहे हैं। कल ही खबर थी कि किस मंदिर में ढाई सौ किलो, और किस मंदिर पांच सौ किलो दूध से अभिषेक किया जाएगा, और तब से हमें यह लग रहा था कि कुपोषण के शिकार इस देश-प्रदेश में पत्थर के ईश्वर पर खाने-पीने की ऐसी चीजें बर्बाद की जाती हैं, जिनसे कि एक दिन के लिए सही, बहुत से बच्चों का पेट भर सकता है, और उनके चेहरे की खुशी देखकर ईश्वर के भक्तों को यह प्रेरणा मिल सकती है कि वे रोज कुछ और बच्चों को खुश कर सकते हैं। एक प्रमुख शायर निदा फाजली ने लिखा था- घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लो, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
हम भी जानते हैं कि हमारी सोच चाहे जो हो, हम हिन्दुस्तान में न तो धर्म की ताकत को कम कर सकते, और न ही ईश्वर के मानने वाले लोगों पर कोई अधिक असर ही डाल सकते। अभी आए दिनों यह खबर आती है कि देश के किस प्रमुख मंदिर से कितने सौ किलो सोना गायब हो गया। इससे परे भी हम अपने आसपास के मठ-मंदिर देखते हैं कि किस तरह उसकी जमीनों पर लोग काबिज हो जाते हैं, उसे बेचने का धंधा करते हैं, धर्म और धार्मिक ट्रस्ट माफिया के अंदाज में चलाए जाते हैं, और ऊपर बैठा ईश्वर कुछ भी नहीं कर पाता। उसके नाम पर घी-तेल जलाया जाता है, मोटे बदन वाले लोग प्रसाद चढ़ाकर दूसरे मोटे बदन वाले लोगों को खिलाते हैं, शिवलिंग से लेकर दूसरी प्रतिमाओं तक को दूध से नहलाकर उस दूध को बहा देते हैं, हर बरस करोड़ों प्रतिमाओं को नदियों और तालाबों में विसर्जित किया जाता है, और उनके पानी को तबाह किया जाता है, धार्मिक त्यौहारों के मौके पर भयानक शोरगुल के खिलाफ अदालतें फैसले दे-देकर थक गई हैं, और धर्म तरह-तरह से हिंसा को, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हुए पनप रहा है।
ऐसे में धर्म को छोडऩे और ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने की कोशिशें हिन्दुस्तान में तो कामयाब नहीं हो सकतीं। एक समझदार के नास्तिक बनने जितनी देर में लाख लोग आस्तिक बन जाते हैं, और उनमें से हजारों लोग धर्मान्ध हो जाते हैं। इसलिए आज जरूरत है धर्म की ताकत, उसकी क्षमता, और उसकी संपन्नता को समाज के कल्याण से जोडऩे की। धर्म में चंदा जुटाने की अपार क्षमता है, लोग जो किसी और बात के लिए जेब से धेला नहीं निकालते, वे भी किसी बाबा, महाराज, साधु और साध्वी के कहे हुए धर्म के लिए करोड़ों रूपए देने को तैयार हो जाते हैं। इसलिए धर्म के भीतर से ऐसे धार्मिक और आस्थावान, जनकल्याण की सोच रखने वाले लोगों को देखने और बढ़ावा देने की जरूरत है जो कि पहाड़ी नदी की तरह के धार्मिक-संपन्नता के इस सैलाब को पनबिजली की तरह इस्तेमाल कर सकें, और दुनिया के गरीबों का भला कर सकें। हम जानते हैं कि धर्म को न तो ऐसी किसी सोच के लिए बनाया गया था कि उससे गरीबों का भला हो, और न ही धर्म का आज का मिजाज ही किसी भले का है, लेकिन फिर भी जो औजार दुनिया में बनते हैं, वे चाहे बुरे इस्तेमाल के लिए ही बनाए गए हों, किसी दिन उनका कोई बेहतर और अच्छा इस्तेमाल भी तो सोचा जा सकता है, किया जा सकता है।
धर्म दुनिया के बहुत से बुरे लोगों को आत्मग्लानि, और छाती पर से पाप के बोझ से मुक्ति दिलाने का काम करता है। पश्चिमी दुनिया में बड़े-बड़े माफिया डॉन भी धर्म की शरण में जाते हैं, कई मुस्लिम देशों में आज इतिहास की सबसे भयानक हिंसा धर्म का नाम लेकर ही की जा रही है, और सतीप्रथा से लेकर देवदासी प्रथा जैसी हिंसा भी हमने धर्म के नाम पर ही देखी है। अब ऐसे हिंसक औजार का समाज के भले के लिए इस्तेमाल आसान तो नहीं होगा, लेकिन इस बारे में सोचना जरूर चाहिए।

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