बेरोजगारों के हक में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

संपादकीय
26 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला आने में ग्यारह बरस तो लग गए, लेकिन इससे उन दर्जनों लोगों की जिंदगी ही बदल जाएगी जो कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में 2003 में छांटे गए उम्मीदवारों की लिस्ट को गलत बताते हुए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। इस फैसले के बाद जो उठापटक और फेरबदल होगी, वह कुछ खतरनाक भी होगी, क्योंकि बड़े प्रशासनिक पदों पर पहुंच चुके राज्य सेवा के अफसरों की नौकरी भी जा सकती है, और कुछ लोगों को नौकरियां मिल भी सकती हैं जो कि 2003 से अब तक बिना नौकरी के थे। हाईकोर्ट ने पूरी चयन सूची को खारिज करते हुए नई चयन सूची बनाने को कहा है, और इस फेरबदल से हो सकता है कि जो अफसर आज बड़े पद पर हैं, वे कल अपने ही किसी मातहत के नीचे काम करने को मजबूर हो जाएं, और जो लोग मातहत काम कर रहे थे, वे सीनियर हो जाएं।
लेकिन मध्यप्रदेश का व्यापमं घोटाला हो, या कि छत्तीसगढ़ की पीएससी का यह मामला हो, इन दोनों की तरह के मामले देश के दूसरे प्रदेशों में भी हुए हैं और बरसों की नौकरी के बाद लोगों को काम से निकाला भी गया है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्टके एक फैसले के बाद पंजाब के सौ जजों को दस बरस की नौकरी के बाद हटा दिया गया था। राज्य सरकार के लिए भी आज आए हुए बिलासपुर हाईकोर्ट के इस फैसले पर अमल से कई तरह की विसंगतियां खड़ी होंगी, और शायद राज्य सरकार को मंत्रिमंडल में इस फैसले को ले जाकर यह भी विचार करना होगा कि क्या 2003 से अब तक काम कर रहे लोगों की नौकरी जारी रखने के लिए मंत्रिमंडल कोई फैसला ले। लेकिन कुल मिलाकर बड़े कमजोर तबके की एक युवती वर्षा डोंगरे ने जिस लड़ाई को शुरू किया था, वह आज दस बरस बाद जाकर एक मुकाम तक पहुंची है, और इससे एक तरफ तो लोगों को देर से मिले हुए इंसाफ में भी कुछ भरोसा पैदा होगा, और शायद सरकार या पीएससी को भी इससे कुछ सीखने मिलेगा। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में कुछ महीने पहले एक और महिला अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट तक दस बरस की कानूनी लड़ाई लडऩे के बाद पुलिस में डीएसपी की नौकरी मिली, और सुप्रीम कोर्ट ने दस बरस पहले की वरिष्ठता के साथ वह नियुक्ति की। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वह नियुक्ति आदेश खुद इस महिला अधिकारी को सौंपा था।
दरअसल कॉलेजों में दाखिले या नौकरियों के मामले में जब कभी कोई बेइंसाफी होती है, तो उससे बहुत बड़े जरूरतमंद तबके के लोगों के हक छिनते हैं, और मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में तो यह सामने आया था कि बहुत बड़े पैमाने पर आपराधिक साजिश के तहत करोड़ों रूपए के लेन-देन, और राजनीतिक प्रभाव-दबाव की वजह से वैसे चयन किए गए थे, और उसमें मंत्री से लेकर अफसरों तक कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, उस व्यापमं घोटाले से जुड़े हुए दर्जनों लोग रहस्यमय तरीके से मारे जा चुके हैं, और मध्यप्रदेश के राज्यपाल अपने बेटे सहित इस मामले में संदेह के घेरे में हैं, और वे अब तक गिरफ्तारी से इसलिए बचे हुए हैं कि पुलिस को राजभवन की दीवार फांदने का हक नहीं है। भारत के संविधान की आड़ लेकर जो राज्यपाल जेल जाने से बचा हुआ है, उसे तो शर्म से ही डूब मरना चाहिए था।
छत्तीसगढ़ के इस पीएससी घोटाले की साजिश में ऐसे बड़े लोगों का सीधा षडय़ंत्र तो अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन यह बात तो तय है कि बिना रिश्वत के, या बिना राजनीतिक दबाव के भला पीएससी के लोग चयन सूची में साजिश के तहत फेरबदल क्यों करते। इसलिए यह फैसला इस तरह की रिश्वत और ऐसे राजनीतिक असर दोनों के मुंह पर एक तमाचा भी है। हाईकोर्ट ने तो अभी अपने फैसले में दुबारा चयन सूची बनाने को कहा है, और हो सकता है कि उससे दस बरस देर से ही कुछ दर्जन लोगों को इंसाफ मिल जाए, लेकिन पीएससी में जिन लोगों ने ऐसी धांधली की थी, और ऐसी साजिश की थी उन लोगों को अगर सजा नहीं मिली, तो समाज के ऐसे ताकतवर दफ्तरों में काम करने वाले लोगों को कोई सबक नहीं मिल पाएगा। इसलिए हमारा यह कहना है कि इस साजिश में जो लोग शामिल थे, उनको सजा दिलवाने के लिए भी सरकार को अलग से जांच करनी चाहिए, अगर वह हाईकोर्ट के आदेश में स्पष्ट नहीं हुई हो।

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