इंसानियत से निराशा रोकने का एक आसान नुस्खा...

संपादकीय
27 अगस्त  2016
पिछले दो दिनों की खबरों को देखें तो इंसानियत पर एक अलग किस्म का भरोसा होने लगता है। लेकिन यह भरोसा किसी शब्दकोष में इंसानियत के जो मायने हैं उनसे अलग है, और इंसानियत हकीकत में क्या होती है, उसके मुताबिक है। ओडिशा की दो खबरें थीं, एक तो यह कि एक गरीब आदिवासी की बीवी सरकारी अस्पताल में गुजर गई और तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद उसे कोई गाड़ी नहीं मिली, तो वह 60 किमी दूर अपने गांव के सफर पर लाश को कंधे पर लेकर रवाना हो गया, और साथ में उसकी छोटी बेटी रोते-रोते चल रही थी। दस किमी के बाद कुछ लोगों को यह दिखा, तो अफसरों तक दौड़-भाग करके उसके लिए गाड़ी का इंतजाम किया। ओडिशा से ही दूसरी घटना एक दिन बाद आई, वह और भी भयानक है। एक कोई महिला गुजरी, और उसकी लाश घर तक ले जाने के लिए पैसे नहीं थे, तो दो लोगों ने मिलकर लाश की हड्डियां तोड़ीं, और उसकी गठरी बनाकर बांस पर टांगकर, ले गए।
मानो इन दोनों तस्वीरों से इँसानियत की परिभाषा ठीक से न बनी हो, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल सुबह-सुबह सड़क पर दो गाडिय़ां टकराईं, और मुर्गियां ले जाते हुए एक गाड़ी के दोनों कर्मचारी बुरी तरह कुचली गाड़ी में फंसे रह गए। उन्हें निकालकर अस्पताल भेजने का जो मौका हो सकता था, उस मौके पर आसपास से जुटे हुए लोग मुर्गी लूटने में जुट गए, और कैमरों की परवाह किए बिना भी लूटकर ले जाते रहे। नतीजा यह हुआ कि दोनों कर्मचारी वहीं पर मारे गए। फिर उधर दिल्ली की एक खबर कल आई कि किस तरह एक महिला अपने शराबी पति से परेशान होकर उसे छोड़कर चली गई, और जाते हुए अपने बेटे को तो साथ ले गई, दो छोटी बेटियों को शराबी पिता के पास छोड़ गई, जिन्हें ताले में बंद करके पिता चले गया, और बाद में पुलिस ने उन्हें बुरी हालत में छुड़वाया। इधर मध्यप्रदेश की एक खबर है कि किस तरह एक बस में सफर करती महिला गुजरी, तो बस के कर्मचारियों ने उसकी लाश सहित पति और पांच दिन की बेटी को जंगल में उतार दिया। अभी यह लिखते हुए रायपुर की एक खबर है कि एक मंदिर के पीछे एक झोले में बंद एक नवजात शिशु मिला है जो कि जिंदा भी है। मिला तो वह भगवान के पिछवाड़े है, लेकिन बचाया उसे इंसानों ने है।
अब इंसानियत किसे कहा जाए? चारों तरफ से रोज जो खबरें आती हैं, वे बताती हैं कि इंसान की सोच के, उसके मिजाज के जिस हिस्से को हैवानियत कहा जाता है, वह पूरी तरह से इंसानी दिल-दिमाग का ही एक हिस्सा है, और उससे आजाद इंसान कम हैं। ऐसी हैवानियत दिखाने की बेबसी और मौका दोनों रहें, और उसके बाद भी लोग इंसान बने रहें, जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह दिखाते रहें, ऐसा कम ही होता है। लोग भले बने रहते हैं, क्योंकि भलापन छोडऩे से उनको कोई फायदा नहीं दिखता है, और बुरा बनने की कोई बेबसी नहीं रहती है। आज इंसानियत शब्द को लेकर जितने तरह की शिकायतें लोगों को रहती हैं, वे इसलिए रहती हैं कि इंसान की सोच के महज अच्छे हिस्सों को इंसानियत मान लिया गया है, और बुरे हिस्से को नाजायज कही जाने वाली औलाद की तरह छोड़ दिया गया है।
यह याद रखने की जरूरत है कि हैवान जैसा दुनिया में कुछ भी नहीं है। जो भी है वह इंसान के भीतर ही है, और इंसान के भीतर हर किस्म की हिंसा है, हर किस्म का जुर्म करने की ताकत और हसरत है, इसलिए अपने ही एक हिस्से को रावण के पुतले की तरह बनाए गए हैवान और हैवानियत नाम के शब्दों पर थोपना नाजायज है। जब तक अपनी खामियों को कोई मानते नहीं, तब तक उससे आजाद होने का सिलसिला शुरू नहीं हो पाता। इसलिए इंसानों को सबसे पहले यह मानना पड़ेगा कि जितनी बातों को हैवानियत कहते हैं, वे हमारा ही एक हिस्सा है, आंखों की तरह, कानों की तरह, या हाथ-पैर की तरह, हैवानियत हमारी ही है, और इंसानियत उसे मिलाकर ही बन सकती है, महज अच्छी बातों से नहीं। जब ऐसा सोच लेंगे, तब तथाकथित इंसानियत से निराशा होना भी बंद हो जाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें