अनुयायी बनने के पहले अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल करें

संपादकीय
28 अगस्त  2016
भारत में सुबह टीवी पर किसी भी हिन्दी समाचार चैनल को शुरू करें, तो खबरों से अधिक उस पर बाबा रामदेव हावी दिखते हैं। पहले वे योग बेचते थे, फिर वे सामाजिक आंदोलन बेचने लगे, फिर वे एक राजनीतिक दल भाजपा के सेल्समैन हो गए, और अब आयुर्वेदिक दवाईयों से लेकर तेल-साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, आटा और मसाले, और भी न जाने क्या-क्या बेचते हुए वे देश के सबसे बड़े सेल्समैन बन गए हैं। वे कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले नूडल्स भी बेचने लगे हैं, और अधिक दिन नहीं लगेंगे कि वे चॉकलेट से लेकर, शायद आयुर्वेदिक-कंडोम तक बेचने लगें। यह एक आजाद देश है, इसलिए किसी योगी को कारोबारी बनने से कोई नहीं रोक सकता, और न ही किसी कारोबारी को योगी बनने से रोका जा सकता। हर साल दो साल में ऐसी खबरें आती हैं कि गुजरात या राजस्थान में हीरों के कौन से अरबपति-खरबपति कारोबारी ने यह मायावी संसार छोड़ दिया और संन्यासी हो गए। इसलिए यह देश कई तरह की विविधताओं वाला है, और योग सिखाने वाला अपना एक हाथ उन लोगों के कंधे पर रखकर चलता है जो कि बलात्कार के लिए नूडल्स को जिम्मेदार ठहराते हैं, और दूसरा हाथ वह जड़ी-बूटियों पर रखता है।
बाबा रामदेव की ऐसी हरकतों से अधिक हैरानी नहीं होती, क्योंकि रामलीला मैदान से महिला के कपड़े पहनकर भागने से लेकर, कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेडऩे तक, देश में काला धन वापिस लाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने का अंदाज दिखा देने तक, और अब गिन-गिनकर अपने अलावा देश के बाकी सारे कारोबारियों की साख चौपट करने तक रामदेव ने एक परले दर्जे की मतलबपरस्ती साबित की है, और योग, आयुर्वेद, समाजसेवा, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रसेवा की नौटंकी से गुजरते हुए वे अब एक खालिस कारखानेदार और कारोबारी के रूप में स्थापित हो गए हैं। आमतौर पर कारोबारियों के संन्यास तक जाने के मामले दिखते हैं, यहां यह भगवा खरबपति बाकी तमाम लोगों को कोसते हुए, मॉडलिंग करते हुए, और अपने कारोबार को राष्ट्रप्रेम बताते हुए टीवी के पर्दों पर छाया रहता है।
इस पर लिखने की अधिक कुछ जरूरत नहीं थी, सिवाय इसके कि योग का नाम लेकर दुकान खड़ी करने वाला आदमी जब बाजार में एकाधिकार के लिए लडऩे लगता है, देश और प्रदेश की सरकारों से रियायतें पाकर बहुत बड़ा कारखानेदार बनने लगता है, तो कारोबार तो चल सकता है, योग की साख चौपट होती है। भारत में योग को बढ़ावा देने वाले बहुत से और लोग रहे हैं, जिन्होंने योग से कुछ भी नहीं कमाया, किसी दूसरे को गाली नहीं दी, कोई झूठे नारे नहीं उछाले, किसी पार्टी का प्रचार नहीं किया, लेकिन रामदेव ने एक अलग तरह की दुकान खड़ी की। और आज ही एक दूसरी खबर यह बताती है कि भाजपा के पसंदीदा, या भाजपा के एक प्रचारक श्री श्री रविशंकर ने एक तस्वीर जारी की है जिसमें वे कश्मीर में मारे गए एक आतंकी नौजवान के पिता के साथ खड़े हैं। इस कश्मीरी बुजुर्ग का कहना है कि वे अपने इलाज के लिए रविशंकर के आश्रम गए थे और रविशंकर ने उनसे उनके बच्चों के बारे में पूछा, और उनके साथ एक तस्वीर खिंचवानी चाही। दूसरी तरफ इसके पहले ही रविशंकर ने यह तस्वीर पोस्ट करके लिखा कि कश्मीरी आतंकी का यह पिता दो दिन उनके आश्रम में रहा और उन्होंने कश्मीर के बहुत सारे मामलों पर इससे विस्तार से चर्चा की। अब रविशंकर के यह कहने के बाद जो खंडन दूसरी तरफ से आया है, वह बताता है कि बड़ी-बड़ी शोहरत पा चुके भारतीय आध्यात्मिक गुरू या योगी भी किस तरह के उथले प्रचार के लिए मारे-मारे फिरते हैं, और किसी भी मौके को दुहने की फिराक में रहते हैं।
लोगों को इस बात में फर्क समझना चाहिए कि कौन योगी है, और कौन आध्यात्म को बढ़ाने वाला है। और लोगों को यह भी समझना चाहिए कि राजनीति पर धर्म का कब्जा साबित करने के लिए दो दिन पहले ही हरियाणा की विधानसभा में जैन मुनि तरूण सागर ने पत्नी पर पति के कब्जे की जैसी मिसाल दी है, उससे धर्म की सोच पता लगती है। इन सब बातों को देखते हुए लोगों को किसी का अनुयायी बनने के पहले अपनी अक्ल का इस्तेमाल भी करना चाहिए। 

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