कश्मीर का समाधान महज श्रीनगर के राजभवन में नहीं बाकी देश में भी जरूरी

संपादकीय
29 अगस्त  2016
कश्मीर को लेकर भारत में फिक्र बनी हुई है। पचास दिन के कफ्र्यू के बाद आज वहां कुछ ढील दी गई है, और दो दिन पहले ही वहां की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर गई थीं। अभी यह खबर भी आ रही है कि कश्मीर के मुद्दे को सुलझाने में लगे हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अब एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के साथ कश्मीर जाने वाले हैं, और वे पिछले कुछ हफ्तों में दो बार वहां होकर आ भी चुके हैं। उन्होंने महबूबा के साथ जब मीडिया से बात की थी, तो केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच कोई मतभेद नहीं थे, और महबूबा ने ही श्रीनगर के मीडिया के तीखे सवालों को झेला था, और कश्मीर में चल रह उपद्रव पर तीखे सवाल खड़े भी किए थे। आज ही एक खबर यह भी है कि देश के कुछ गैरराजनीतिक प्रमुख लोगों को कश्मीर का समाधान ढूंढने के लिए एक अनौपचारिक टीम की तरह वहां भेजा जा सकता है, और इसके लिए देश के एक सबसे बड़े, और उदार सोच वाले संविधान विशेषज्ञ वकील सोली सोराबजी का नाम भी सामने आया है, और एक वरिष्ठ पत्रकार रहे हुए, भारत-पाक मामलों के बड़े पुराने जानकार, और दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्तों के हिमायती कुलदीप नैयर का नाम भी लिया जा रहा है। लोगों को याद होगा कि मनमोहन सिंह के समय भी एक वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडग़ांवकर, और दिल्ली की एक प्राध्यापक राधाकुमार जैसे कुछ लोगों को एक औपचारिक कमेटी बनाकर कश्मीर भेजा गया था, और वे अपनी क्षमता जितनी कोशिश करके लौटे भी थे।
आज भारत की दिक्कत यह है कि इसकी अधिकतर समस्याओं का समाधान तो निकल सकता है, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के समर्थकों के ऐसे संगठन हैं, जिनका अपना अस्तित्व कई तरह के तनाव बने रहने पर टिका हुआ है। कुछ लोगों का अस्तित्व साम्प्रदायिक नफरत पर जिंदा है, कुछ लोगों का अस्तित्व महिलाओं के खिलाफ बयानबाजी से चलता है, और कुछ लोग इस देश में एक ऐसी सनातनी हिन्दू संस्कृति लाना चाहते हैं जिसमें दलितों-आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और मांसाहारियों का खानपान भी सनातनियों के काबू में रहे। आज अगर केन्द्र की मोदी सरकार और एनडीए की मुखिया भारतीय जनता पार्टी, जो कि कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के साथ राज्य की सत्ता में भागीदार भी है, वे अगर यह सोचते हैं कि कश्मीर एक भौगोलिक समस्या है, तो वह सोचना निहायत गलत होगा। जब पूरे देश में मुस्लिमों के खिलाफ एक उन्माद फैलाया जाएगा, उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखने की वकालत की जाएगी, उनके खानपान पर रोक लगाई जाएगी, उनके कारोबार तबाह किए जाएंगे, सड़कों पर कश्मीरी मुस्लिम ट्रक ड्राइवरों को रोक-रोककर मारा जाएगा, तो कश्मीर कभी भी भावनात्मक रूप से बाकी भारत से नहीं जुड़ पाएगा। एक देश की विविधता न सिर्फ धर्मों में होती है, न सिर्फ भौगोलिक सीमाओं में होती है, बल्कि वह रीति-रिवाजों की विविधता भी होती है, और उसके सम्मान के बिना कोई दो इलाके, दो धर्म, दो जातियां, या दो संगठन साथ नहीं रह सकते। सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान लोकतंत्र की अनिवार्य शर्तें रहती हैं, और इनको अनदेखा करके कश्मीर का कोई हल नहीं निकल सकता।
कश्मीर के मुद्दे को लेकर भाजपा का इतिहास चाहे जो रहा हो, आज केन्द्र सरकार चलाने की जिम्मेदारी जब उस पर आई है, और जब जम्मू-कश्मीर सरकार में वह भागीदार भी है, तो भाजपा के भीतर भी एक तबका जिम्मेदारी की बात भी करता है। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इस रूख को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि उन्होंने कश्मीर जाकर यह कहा कि कश्मीर के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। और यह बात सभी को समझने की जरूरत है कि कश्मीर का मतलब महज डल झील, वहां के पहाड़, वहां की नदियां, और वहां की जमीनी खूबसूरती नहीं हैं। कश्मीर के साथ वहां के लोग जुड़े हुए हैं, उनकी हसरतें जुड़ी हुई हैं, उनका इतिहास जुड़ा हुआ है, और भारत के भीतर कश्मीर का जो खास दर्जा इतिहास में दर्ज हुआ था, वह भी जुड़ा हुआ है। इसलिए कश्मीर के मुद्दे पर देश के भड़काऊ लोगों का हौसला पस्त किए बिना कोई अगर यह सोचे कि महज श्रीनगर के राजभवन में बैठकर कश्मीर समस्या का हल निकल जाएगा, तो वह आखिर तक सपना ही बने रहेगा। कोई अगर यह सोचे कि फौज की तैनाती से कश्मीर का हल निकल जाएगा, तो ऐसी फौज वहां पौन सदी से चली आ रही है, और कोई हल नहीं निकला। कश्मीर को भारत में बनाए रखने के लिए वहां के लोगों की भावनाओं को समझना होगा, उनके जख्मों पर मरहम रखना होगा, और बाकी हिन्दुस्तान में भी धर्म के आधार पर नफरत को खत्म करना होगा। इस मुद्दे पर इन दो कॉलमों में तमाम पहलू नहीं लिखे जा सकते, लेकिन फिर भी कश्मीर का समाधान वहां से बाहर भी बाकी देश में भी ढूंढना होगा, और उसकी शुरुआत करने के लिए मुद्दे सामने हैं, पहचाने हुए हैं, और हमारा यह भी मानना है कि देश की बाकी पार्टियों को भी केन्द्र सरकार के साथ मिलकर अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने में हिचक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसा मौका भी रहेगा कि भाजपा अपनी कुछ रीति-नीति को सुधार भी पाएगी, जो कि देशहित में जरूरी भी है।

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