सरकार में फाइलों से परे के जुबानी आदेश-निर्देश भी रिकॉर्ड करना ठीक होगा?

संपादकीय
30 अगस्त  2016
मनमोहन सिंह सरकार में कोयला-सचिव रहे एच.सी. गुप्ता ने आज  सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई में कहा कि उन्होंने तमाम बातें उस समय कोयला मंत्रालय देख रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रख दी थीं। इससे ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह कटघरे के और करीब पहुंच गए हैं, और आगे जाने उन पर इतनी जिम्मेदारी तय होगी। लोगों को याद होगा कि अभी इसी पखवाड़े इस रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने अदालत में रोते हुए यह कहा था कि वे अब आगे इस मुकदमे में अपना कोई पक्ष रखना नहीं चाहते, और न ही जमानत जारी रखना चाहते हैं, उन्हें जेल भेज दिया जाए। उनका कहना था कि उनके पास अब वकीलों पर और खर्च करने के लिए ताकत बची नहीं है, और जिसने जमानत ली है उसे अपनी गारंटी वापिस चाहिए इसलिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। अदालत ने उन्हें मुफ्त में सरकारी वकील देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन देश के एक सबसे बड़े मंत्रालय के सचिव रह चुके, और देश की सबसे ताकतवर आईएएस सेवा से रिटायर हुए इस व्यक्ति की इस बेबसी पर लोग हक्का-बक्का रह गए।
जब कोई कटघरे में है, तो उसकी ईमानदारी और बेईमानी पर अधिक चर्चा ठीक नहीं है, लेकिन इस अफसर के बारे में आमतौर पर सरकारी महकमों में जनधारणा ठीक रहती थी, और उन्हें ईमानदार माना जाता था। दूसरी तरफ मनमोहन सिंह को भी लोग निजी ईमानदार मानते थे, और लोगों को यह भरोसा शायद न हो कि मनमोहन सिंह ने रिश्वत ली हो। लेकिन जब कोई जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाली कुर्सियों पर बैठते हैं, तो निजी ईमानदारी की बात किसी काम की नहीं रहती। हर किसी को निजी ईमानदार रहना चाहिए, और इसमें तारीफ की कोई बात नहीं हो सकती। दूसरी तरफ सरकारी, संवैधानिक या सार्वजनिक पदों पर बैठे हुए लोगों पर यह अनिवार्य जिम्मेदारी आती है कि वे अपने मातहत लोगों के कामों पर भी नजर रखें, और गड़बड़ी सामने आने पर तो उस पर कार्रवाई उनकी कानूनी जिम्मेदारी भी रहती है। मनमोहन सिंह के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि कोई मुखिया अपने-आपको तब ईमानदार होने का तमगा नहीं दे सकता, जब उसके मातहत खुलेआम जुर्म कर रहे हों, और वह सबको दिख भी रहे हों। मनमोहन सिंह की ऐसी कोई निजी ईमानदारी अगर रही भी होगी, तो भी उन्होंने संविधान की शपथ लेकर जो कुर्सी संभाली थी, उस शपथ के साथ और उस कुर्सी के साथ तो उन्होंने अनदेखी की बहुत बड़ी बेईमानी की भी थी।
अब जब उनके मंत्रालय-सचिव रहे अफसर यह कह रहे हैं कि उन्होंने सब कुछ मनमोहन सिंह को बता दिया था, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या सरकारी फाइलों से परे की लोगों की सरकारी बातचीत को भी दर्ज किया जाना चाहिए? मंत्री और अफसर के बीच, अफसर और मातहत के बीच बहुत सारी बातें जुबानी होती हैं, और क्या अगर ऐसी बातचीत को कोई एक या दोनों पक्ष अपने फोन पर ही रिकॉर्ड करके रखने लगे, फोन पर होती बातचीत को रिकॉर्ड करने लगे, तो क्या वह सरकारी सेवा नियमों के खिलाफ होगा? या फिर उससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी? और कोई हैरानी नहीं है कि आज सूचना के अधिकार और अदालती-सक्रियता के इस दौर में सरकार में काम करने वाले लोगों में से कुछ लोग यह तय कर लें कि फाइलों से परे भी वे जुबानी निर्देश और आदेश को भी रिकॉर्ड करके रखेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें