दुनिया एक डिजिटल खतरे के ढेर पर बैठी हुई है पर...

संपादकीय
31 अगस्त  2016
दुनिया में आज मोबाइल फोन पर संदेश, तस्वीरें, और वीडियो-संगीत भेजने के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली एक सर्विस, वॉट्सऐप का मालिकाना हक दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया सर्विस फेसबुक के पास आने के बाद अब एक के फोन नंबर दूसरी सर्विस को भी चले जा रहे हैं, और ऐसे मेल से इन सोशल-मीडिया कारोबारियों के पास अपने ग्राहकों का डाटा-बेस एकदम से दुगुना हो जाएगा। इससे लोगों की निजी जिंदगी किस तरह फोन और फेसबुक पर मिलकर एक हो जाएगी यह  अंदाज लगा पाना अभी संभव नहीं है, लेकिन लोग सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर फिक्र कर रहे हैं, और यह सुझा रहे हैं कि अपनी फोनबुक को फेसबुक के साथ शेयर करने से कैसे बचा जा सकता है।
लेकिन हकीकत यह है कि रोजमर्रा की जिंदगी में शायद ही कोई ऐसे इंटरनेट-उपभोक्ता रहते हैं जो कि फोन और इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाले किसी एप्लीकेशन, या किसी सोशल मीडिया की लिखी गई नियम और शर्तों को पढ़ते हों, और उसके बाद उससे सहमति जाहिर करते हों। नतीजा यह होता है कि बाजारू और कारोबारी सभी तरह के इंटरनेट-सेवा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, और संदेश वाली सेवाएं, ये अपने ग्राहकों या सदस्यों की निजी जानकारी के इस्तेमाल का हक हासिल कर लेती हैं, और उससे फिलहाल तो अपना विज्ञापनों का कारोबार बढ़ाने की बात करती हैं, लेकिन आज ही वह दूसरी किन बातों के लिए इन बातों का इस्तेमाल करती होंगी, यह अंदाज लगाना नामुमकिन है। कुल मिलाकर यह है कि जिन लोगों को अपनी निजी जिंदगी की गोपनीयता बनाए रखने में उन्हें ओसामा-बिन-लादेन की तरह फोन और इंटरनेट से दूर ही रहना होगा, तभी उनके बदन पर तौलिया बने रह सकता है। आज जो लोग सोशल मीडिया पर पहुंचते हैं, वे कानूनी कारोबारियों, और गैरकानूनी हैकरों, सभी के हाथों अपनी गोपनीयता खो बैठते हैं।
सोशल मीडिया ने आज निजी जिंदगी को जिस तरह से नाजुक बना दिया है, और उसकी जानकारी को खतरनाक बना दिया है, उसके बाद अब दुनिया में सरकारों की खुफिया जासूसी एजेंसियों का काम खासा घट गया है। कई बरस से चलते-चलते एक लतीफा अब पिट गया है कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया है, कि अब फेसबुक के बाद जासूसी का काम तो घर बैठे हो सकता है, उस पर दुनिया भर में इतना खर्च क्यों मंजूर किया जाए। और लोग न केवल अपने सामाजिक संबंधों के लिए, बल्कि अपने कारोबार के लिए भी इंटरनेट पर पूरी तरह टिक चुके हैं, और उनकी आम या खास हर तरह की जानकारी आज इंटरनेट पर है। इससे दुनिया का कारोबार और निजी जिंदगी दोनों ही इतने नाजुक हो गए हैं कि अगला कोई विश्व युद्ध ऐसा भी हो सकता है कि जिन इंटरनेट खातों पर कोई एक खास शब्द दर्ज हो, उन सारे खातों की सारी जानकारी को एक साथ मिटा दिया जा सके। मिसाल के तौर पर अगर कोई चाहे तो किसी धर्म की कुछ बहुत ही सामान्य बातों वाले ई-मेल खाते, वैसे सोशल मीडिया खाते, इनको एक साथ मिटा दिया जाए। ऐसे में एक खास धर्म के, एक खास देश के, एक खास रंग या जाति के, एक खास राजनीतिक विचारधारा के, एक खास आय वर्ग के लोगों को उनकी पूरी डिजिटल जिंदगी से अलग किया जा सकता है, और वे एकदम से डिजिटल-दीवालिया हो जाएंगे, न उनका इतिहास बचेगा, न उनका वर्तमान बचेगा, और भविष्य बनाने में शायद पूरी जिंदगी लग जाएगी। हमारी यह भविष्य की एक आशंका है कि अगले युद्ध हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे, और किसी देश का डिजिटल-ढांचा खत्म करके उस देश को पल भर में लकवे का शिकार बना दिया जाएगा, ताकि वहां की जिंदगी थम जाए, खत्म हो जाए, और अराजकता से वहां दंगे होने लगें।
आज दुनिया को यह सोचने की जरूरत है कि किस तरह ऐसे डिजिटल-खतरे से बचने की तैयारी की जा सकती है, क्योंकि अब धीरे-धीरे किसी भी देश की सार्वजनिक सेवाओं, और रोज की जरूरतों का इतना कम्प्यूटरीकरण हो चुका है कि एक भी साइबर-अटैक देश की धड़कन को रोक सकता है। ऐसी कल्पना पर हॉलीवुड में फिल्में तो बहुत सी बनी हैं, लेकिन सरकार और समाज ऐसी नौबत से निपटने के लिए शायद कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

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