संसदीय लोकतंत्र में सहमति का महत्व

संपादकीय
4 अगस्त  2016
बहुत समय बाद भारतीय संसद में किसी बात को लेकर एकमत सा हुआ और देश में टैक्स ढांचे को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ा कानून बनने का रास्ता खुला। अब यह उम्मीद है कि राज्यों की विधानसभाओं से मंजूरी पाते हुए जीएसटी अगले साल-छह महीने में लागू हो जाएगा। जीएसटी विधेयक यूपीए सरकार के वक्त बना था, और उस वक्त देश के विपक्ष में रही एनडीए ने इसका जमकर विरोध किया था। छत्तीसगढ़ भी उन भाजपा-एनडीए राज्यों में से एक था जहां के वित्त मंत्रियों ने दिल्ली जाकर इसका खुला विरोध किया था। इसके बाद जब अरूण जेटली पर देश की अर्थव्यवस्था का बोझ पड़ा, तो इस टैक्स व्यवस्था का महत्व समझ आया, और कांग्रेस को मनाते हुए दो बरस गुजर गए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की मर्जी के कुछ संशोधनों के साथ अब यह विधेयक राज्यसभा में पारित हो चुका है, और देश के ग्राहकों को, जनता को इसका असर देखने मिलेगा।
अभी हम इससे होने वाले अलग-अलग नफे-नुकसान की बात नहीं कर रहे, क्योंकि पिछले दो दिनों में हमने इस अखबार में इस बारे में बहुत से अधिक जानकार लोगों के विश्लेषण छापे हैं, और आज के अखबार में भी इस बारे में जानकारी जा रही है। लेकिन हम भारत सरीखे लोकतंत्र में संसदीय सहमति की अहमियत, और उसकी कमी, इस बारे में जरूर बात करना चाहते हैं कि विरोध के नाम पर विरोध कितना खतरनाक होता है। हमको याद है कि छत्तीसगढ़ में जब अजीत जोगी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, और उन्होंने हेलमेट लागू करवाने की कोशिश की थी, तो भाजपा सड़कों पर उतर आई थी। इसके बाद भाजपा की सरकार आई और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यही कोशिश की, तो कांग्रेस इसके खिलाफ सड़कों पर थी, और हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को जैसा नारा लगा रही थी। जबकि उसी पार्टी के पिछले मुख्यमंत्री हेलमेट के हिमायती रह चुके थे, और उस दिन के कुछ प्रमुख प्रदेश कांग्रेस नेता हेलमेट का समर्थन कर रहे थे, फिर भी कांग्रेस के बकवासी नेता गालियों का इस्तेमाल कर रहे थे, और लोगों के बीच लापरवाही बढ़ा रहे थे। यह एक छोटी सी मिसाल है, लेकिन देश की संसद में भी ऐसे बहुत से मौके लगातार आते हैं, जब किसी विधेयक पर चर्चा को रोका जाता है, और राजनीतिक विरोध संसदीय अड़ंगा बनकर देश का नुकसान करता है। भारतीय लोकतंत्र को अपने सत्तरहवें बरस में पहुंचते हुए जिस परिपक्वता को हासिल करना था, वह उससे कोसों पीछे है, और पार्टियों के बीच की कटुता देश पर राज कर रही है।
हम छत्तीसगढ़ में भी यह देख रहे हैं कि सरकार के खिलाफ किसी आंदोलन को चलाने के नाम पर जिस तरह के उथले अंदाज में सड़कों पर हरकतें की जा रही हैं, उससे सबसे बड़ा नुकसान तो राज्य की जनता का हो रहा है, जिसके असल मुद्दे धरे रह जा रहे हैं, और तुकबंदी वाले नारे आंदोलन बन रहे हैं। यह सिलसिला चाहे जिस देश में हो, चाहे जिस प्रदेश में हो, उसके पीछे की नीयत को उजागर करना लोकतांत्रिक ताकतों की जिम्मेदारी है।
संसदीय लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था नहीं है कि जिसमें हर मुद्दे पर, हर दिन सदन के भीतर के बाहुबल की पंजा-कुश्ती करवाई जाए। लोकतंत्र में व्यापक जनहित को देखते हुए दो चुनावों के बीच के पांच बरसों में महज दंगल से संसदीय व्यवस्था नहीं चल सकती। और भारत में लोगों की, राजनीतिक दलों की बाहुबल-प्रदर्शन की चाहत इतनी मजबूत है कि देश की जनता सड़क किनारे भूखी और जख्मी पड़ी हो, पार्टियां सड़क पर कुश्तियों में लगी रहती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से आज देश का प्रिंट मीडिया भी सतह पर तैरती हुई सनसनी पर जिंदा रहने की लत का शिकार हो चुका है, और कल तक अखबारों की जो गंभीरता थी, उसे आज टीवी चैनलों की सनसनी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मीडिया भी आज राजनीति को जिम्मेदारी की नसीहत देने के बजाय, उसकी गैरजिम्मेदारी पर अधिक जिंदा है। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए बहुत ही निराशा की है, आज इतने बरसों की कोशिशोंके बाद, कई सरकारों के आने-जाने के बाद किसी तरह समझौते करके जीएसटी बिल पास हुआ है, लेकिन देशहित के ऐसे ढेरों काम देश की संसद, और प्रदेशों की विधानसभाओं में धक्के खा रहे हैं।

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