सावधानी बरतने में ही समझदारी है

संपादकीय
5 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ के दुर्ग में पिछले दो दिन एक ही घटना के दो भयानक पहलू के रहे। एक नौजवान को उसकी बुजुर्ग मां की पुलिस रिपोर्ट पर गिरफ्तार किया गया कि बेटे ने उससे बलात्कार किया है। दूसरी खबर यह है कि इस नौजवान को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया और वहां उसकी ऐसी मौत हुई है कि अंदाज है कि जेल के सिपाहियों या कैदियों ने उसे पीटकर मार डाला। ये दोनों बातें बीच-बीच में सामने आती रहती हैं जब वर्जित संबंधों को तोड़कर लोग इस तरह की हरकत करते हैं, और फिर कभी अदालत में वकील ऐसे लोगों को पीटते हैं जो कि बेटी से बलात्कार के मामले में अदालत पहुंचे हैं, या जेल में लोग ऐसे लोगों को मारते हैं। कुछ मामलों में किसी शहर के वकील यह भी तय करते हैं कि ऐसे लोगों का मुकदमा न लड़ा जाए। दरअसल मानवीय संबंधों जो सामाजिक व्यवस्था है उसके तहत कुछ तरह के संबंध लोग बर्दाश्त करते हैं, और कुछ तरह के संबंध बिल्कुल भी बर्दाश्त के लायक नहीं होते हैं।
मां-बेटे का संबंध कुछ इसी तरह का है, या बाप-बेटी का संबंध, भाई-बहन का संबंध चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से भी ठीक नहीं है, क्योंकि इतने करीबी रक्त संबंध से अगर कोई संतान पैदा होती है, तो उसके सामने जेनेटिक दिक्कतें आती हैं। ऐसे बहुत से वैज्ञानिक अध्ययन हैं जो कि ऐसे संबंध न करने की सलाह देते हैं, और भारत के कुछ समुदायों में कुछ पीढिय़ों तक के भाई-बहन या दूसरी तरह के रक्त संबंधियों के बीच रिश्तों पर रोक रहती है। हालांकि बलात्कार और हत्या की जिस घटना को लेकर हम यहां लिख रहे हैं, वह किसी विचलित दिमाग से किया गया जुर्म अधिक लगता है, और उसका नतीजा भी बहुत बुरा हो चुका है। लेकिन आज की ही एक दूसरी खबर है कि बिहार में एक नौजवान ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया, और सास से शादी कर ली। अब मां के साथ-साथ सौत भी बन गई इस महिला का अपनी बेटी से कहना है कि वह उसके साथ भी रहने को तैयार है। लेकिन ऐसे संबंधों को समाज व्यवस्था के भीतर अधिकतर जगहों पर कोई मंजूरी नहीं है, इसलिए यह अधिक अटपटा भी लगता है।
सामाजिक रीति-रिवाजों और समाज व्यवस्था का यह पूरा मुद्दा वैसे तो बहुत व्यापक और बहुत जटिल है, और इसके ऊपर हम नैतिकता के किसी भी पैमाने का इस्तेमाल करके अपने कोई विचार रखना नहीं चाहते हैं, लेकिन इन दो घटनाओं और आए दिन आने वाली ऐसी और खबरों को लेकर यह जरूर सोचते हैं कि वर्जित संबंधों को लेकर समाज व्यवस्था के भीतर जिस तरह की सावधानी बरतने की बात सदियों से कही जाती है, उसका एक महत्व रहता है। अधिकतर जगहों पर यह कहा जाता है कि जवान हो चुके दो लोगों को वर्जित संबंधों का ध्यान रखते हुए एक हद से ज्यादा करीब नहीं रहना चाहिए। पुराने जमाने से आग और घी को करीब न रखने की बात कही जाती है, क्योंकि इंसानी बदन की जरूरतें बहुत मौकों पर समाज की लगाई हुई पाबंदियों को मानने से इंकार कर देती हैं। बहुत से ऐसे कमजोर पल होते हैं जब लोग तमाम वर्जनाओं को भूलकर उस पल के सुख के सामने बेकाबू हो जाते हैं। ऐसे ही बहुत से कमजोर पलों में अनैतिक समझे जाने वाले रिश्ते भी बन जाते हैं, बलात्कार भी किए जाते हैं, और परिवार से लेकर समाज तक के भीतर बर्बाद कर देने वाले तनाव खड़े होते हैं।
समाज व्यवस्था जहां बहुत से मामलों में गैरजरूरी हैवानियत दिखाती है, और प्रेम से लेकर समलैंगिकता तक का विरोध करती है, दूसरे धर्म या जाति में शादी के खिलाफ रहती है, वहीं ऐसी मानवीय कमजोरियों को रोकने के लिए उसकी बनाई हुई कुछ बंदिशें ठीक भी लगती हैं। परिवार के भीतर होने वाले हर तरह के जुर्म इन बंदिशों से नहीं रूकते, लेकिन दुनिया की किसी भी सामाजिक, नैतिक, या संवैधानिक बंदिश से हर तरह के जुर्म नहीं रूक सकते, उनको कम ही किया जा सकता है। इसलिए वर्जित संबंधों को लेकर, और मानवीय कमजोरी के खतरों को देखते हुए परिवारों के भीतर भी एक सावधानी बरतने में ही समझदारी है।

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