मदरसों पर मंदिर का प्रसाद थोपने का फैसला गलत

संपादकीय
6 अगस्त  2016
मध्यप्रदेश में उज्जैन शहर के मदरसों ने सरकार का बाहर से पकाकर पहुंचाया जा रहा दोपहर का भोजन लेने से मना कर दिया है। यह विरोध तब शुरू हुआ जब सरकार ने दोपहर के भोजन को पकाकर सप्लाई करने का काम इस्कॉन नाम के हरे कृष्ण सम्प्रदाय को दिया, और इस पर मदरसों की आपत्ति थी कि वहां पकाया भोजन पहले भगवान को चढ़ाया जाता है, और फिर प्रसाद के रूप में बाकी लोगों को पहुंचाया जाता है। मुस्लिम शैक्षणिक संस्थाओं का यह कहना था कि खाने के साथ जुड़ी हुई यह हिन्दू सोच उनकी मुस्लिम भावनाओं से अलग है, और इसलिए वे ऐसा प्रसाद नहीं ले सकते।
मध्यप्रदेश में यह अकेला तनाव नहीं है। स्कूलों में गीता पढ़ाने को लेकर, या योग में ओम की ध्वनि के साथ सूर्य नमस्कार करवाने को लेकर, कई तरह से वहां हिन्दू धर्म की सोच बाकी धर्मों के लोगों पर भी लादने का लंबा इतिहास है। और इसके साथ ही मध्यप्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव का भी इतिहास है, और दलितों पर अत्याचार का भी। कुल मिलाकर हिन्दू धर्म के भीतर ही एक बहुत सीमित संख्या वाले जिन सनातनी सोच वाले लोगों का दबदबा सत्ता और समाज में है, वे न सिर्फ बाकी हिन्दू तबकों, बल्कि समाज के बाकी धर्मों के लोगों को उसी रंग में रंगना चाहते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब उमा भारती कुछ वक्त के लिए मुख्यमंत्री बनाई गई थीं, तो उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री निवास के अहाते में एक मंदिर बनवाया था, बल्कि मुख्यमंत्री की मेज भी मंदिर की तरह प्रतिमा और फूल-मालाओं से सजा दी गई थी। उनका अपना भगवा चोला तो उनके स्वघोषित साध्वी जीवन के मुताबिक था ही, उनकी बातें भी घोर साम्प्रदायिकता की रहती थीं, और रहती हैं। लेकिन उनके बाद भी मध्यप्रदेश में वह सर्वधर्म समभाव सत्ता के रूख में कभी नहीं दिखा, जो कि भारतीय विविधतावादी लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी है। सत्ता के रंग, सत्ता के समारोहों के रंग, सत्ता की योजनाओं के नाम, और सत्ता की जुबान, इन सबमें मध्यप्रदेश में एक ऐसा हिन्दूवादी माहौल खड़ा किया है, कि दूसरे धर्मों के लोगों का ऐसे में चौकन्ना हो जाना तय और जायज दोनों ही था।
हम पहले भी यहां पर कुछ मिसालें गिना चुके हैं कि किस तरह भारत में आक्रामकता के साथ हिन्दू धर्म के नाम पर कुछ बातों को थोपना शुरू होने के पहले तक भारतीय संस्कृति में हिन्दू धर्म की बातों को देश के सभी तबके एक स्वाभाविक सांस्कृतिक तत्व की तरह मंजूर करते आए थे। किसी सरकारी योजना का भूमिपूजन या शिलान्यास हो, या किसी सरकारी दफ्तर और बैंक में दीवाली की लक्ष्मी पूजा हो, दूसरे धर्मों के मंत्री-अफसर इनमें बिना कुछ सोचे शामिल होते आए थे, और देश में कभी यह मुद्दा नहीं बना कि मुस्लिम मंत्री-अफसर कैसे अपने मजहब के खिलाफ बुतपरस्ती करें। धर्म से परे भी संस्कृति के एक महत्व को हर कोई मानते थे। और हो सकता है कि वैसा माहौल रहता तो मध्यप्रदेश के मदरसे आज इस्कॉन के प्रसाद का विरोध नहीं करते। लेकिन देश में पिछले बरसों में जिस तरह लगातार एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज धार्मिक टकराव खड़ा किया जा रहा है, दलितों और आदिवासियों के खानपान के खिलाफ एक हिंसा खड़ी की जा रही है, जिस तरह मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है, जिस तरह मरी हुई गाय को ठिकाने लगाते लोगों को भी गाय का कातिल करार देते हुए उन्हें मारा जा रहा है, उन सबको देखते हुए इस हमलावर सवर्ण-हिन्दू मान्यता के खिलाफ आबादी के एक बड़े हिस्से के मन में विरोध खड़ा हो गया है। और यह विरोध जगह-जगह सड़कों पर उतर रहा है, छात्रों के बीच से सामने आ रहा है, और दलित संगठनों के झंडे तले खड़ा हो रहा है।
मध्यप्रदेश सरकार को दोपहर के खाने में किसी धार्मिक संगठन को जिम्मा देने के पहले यह भी सोचना था कि न सिर्फ मदरसों के मुस्लिम बच्चे, बल्कि बाकी स्कूलों में पढऩे वाले गैरहिन्दू बच्चे भी ऐसा प्रसाद खाना मुश्किल पा सकते हैं। कभी स्कूलों के कोर्स को धार्मिक रंग देना, कभी योग का भगवाकरण करना, कभी खानपान को सनातनी करना, और कभी सरकारी खर्च के मिड डे मील में धर्म को घोलना, इनमें से कोई भी बात लोकतंत्र की मूल भावना के अनुकूल नहीं है, और देश-प्रदेश की हर सरकार को इससे बचना चाहिए, इससे एक ऐसा गैरजरूरी तनाव खड़ा हो रहा है जिसकी आग में मोदी के सारे आर्थिक कार्यक्रम, सारी योजनाएं झुलसकर रह जाएंगे।

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