बराक ओबामा की बेटी की मिसाल से सीखे की जरूरत

संपादकीय
7 अगस्त  2016
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बेटी की तस्वीरें खबरों में आई हैं कि वह इस तरह एक रेस्त्रां में गर्मी की छुट्टियों में काम कर रही है। वहां टेबिल साफ करने से लेकर खाना परोसने तक, और खाने की पार्सल देने की खिड़की पर काम करने तक, सभी तरह के काम वह कर रही है। यह अलग बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति की बेटी होने के कारण उस पर जो खतरा है, उसके चलते वहां आधा दर्जन सुरक्षा अधिकारी बाहर एक गाड़ी में तैनात रहते हैं। लेकिन खबरों से यह भी पता लगता है कि किस तरह अपनी ड्यूटी पूरी होने के बाद वह जाने के पहले इन सुरक्षा अधिकारियों को भी अपनी तरफ से ले जाकर कुछ खिलाती है।
अभी हमको इंटरनेट पर यह ढूंढने की जरूरत भी नहीं है कि बराक ओबामा ने अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में छुट्टियों में या दिन के कुछ खाली घंटों में ऐसे काम किया था या नहीं। उन्होंने शर्तिया ऐसा काम किया होगा, और ऐसा सिर्फ जरूरतमंद या गरीब परिवारों के बच्चे नहीं करते, संपन्न परिवारों के बच्चे भी तजुर्बा लेने के लिए, अपना जेब खर्च चलाने के लिए, और अपनी स्वतंत्रता की तरफ बढऩे के लिए ऐसे कई तरह के काम करते ही हैं। बहुत से बच्चे लोगों की कारें धोते हैं, वेटर या वेट्रेस की तरह काम करना बड़ी आम बात है। और इस पर चर्चा करना आज इसलिए जरूरी लग रहा है कि हिन्दुस्तान में मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों से भी यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे बाहर कुछ काम करके जेब खर्च जुटाएं, या घर पर ही कुछ काम कर लें। घर पर जिन कामों के लिए आमतौर पर नौकर-चाकर रखे जाते हैं, उनमें से कोई काम अगर घर के बच्चों को बता दिया जाए तो उनका आम जवाब रहता है कि वे नौकर तो हैं नहीं।
यही वजह है कि हिन्दुस्तान में काम का सम्मान जरा भी नहीं है, और यहां अमरीकी राष्ट्रपति जैसे ताकतवर ओहदे की बात तो छोड़ ही दें, किसी मामूली व्यक्ति से भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने घर-दफ्तर पर काम करने वाले, कम तनख्वाह वाले लोगों से कभी मुस्कुराकर बात कर लें। यह पूरा सिलसिला भारत में जाति व्यवस्था से जुड़ा हुआ भी है जिसमें किसी काम को नीचा, और किसी काम को ऊंचा माना गया है। यहां पर किसी रेस्त्रां में मेज पर खाना परोसना, या जूठे बर्तन उठाना, या मेज को पोंछना शर्म की बात मानी जाएगी, और ऐसा करने के बजाय अधिकतर लोग बिना जेब खर्च के रहना पसंद करेंगे। आज अमरीका अगर आगे बढ़ा हुआ देश है, तो वहां पर सभी तरह के काम के लिए अधिकतर आबादी के मन में किसी तरह की हेठी नहीं रहती है, और संपन्न तबके के जो बच्चे बिना ऐसे पार्ट टाईम काम किए हुए बड़े हो जाते हैं, वे खुद भी आसपास के अपने हमउम्र लोगों के बीच शर्मिंदगी महसूस करते हैं। हिन्दुस्तानी बच्चों और नौजवानों के बीच काम का सम्मान समझाने की भी जरूरत है, और इस देश के संपन्न मां-बाप के दिमाग में भी इस बात को बिठाने की जरूरत है कि मेहनत से आगे बढ़ते उनके बच्चे सचमुच आगे बढ़ सकते हैं, बजाय मां-बाप के पैसों पर ही पलने के।

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