गौहिंसा पर मोदी का कहा टू लेट, एंड टू लिटिल...

संपादकीय
8 अगस्त  2016
कुछ दिन पहले मन की बात के रेडियो प्रसारण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के लोगों से पूछा था कि इस बार उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से किन-किन बातों पर कहना चाहिए। वे चाहते थे कि वे अपने मन की बातें करने के बजाय आजादी की सालगिरह पर देश की जनता के सुझाए हुए मुद्दों पर भी बोलें। और सोशल मीडिया पर लोग टूट पड़े, प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए कि उन्हें साम्प्रदायिकता पर, गाय के नाम पर की जा रही हिंसा पर, दलितों पर अत्याचार पर, कश्मीर में लोगों पर बरसाए जा रहे छर्रों पर बोलना चाहिए। जितने मुंह उतनी बातें। नतीजा यह हुआ कि उनकी कही बात उन्हें खासी महंगी पड़ी, और सोशल मीडिया पर लोगों ने याद दिलाया कि देश के कौन-कौन से जलते-सुलगते मुद्दों पर प्रधानमंत्री कुछ भी नहीं बोलते हैं।
अब इन बातों की वजह से, या एक बड़ी दलित आबादी वाले उत्तरप्रदेश के चुनाव की वजह से, चाहे जिस किसी वजह से प्रधानमंत्री ने पिछले दो दिनों में गाय का नाम लेकर हिंसा करने वालों के खिलाफ खासी कड़ी बातें कही हैं, और खुलकर यह माना कि गोरक्षा की बात करने वाले तीन चौथाई लोग असामाजिक तत्व हैं, जो कि बाकी वक्त जुर्म करते हैं, और उनको छुपाने के लिए दिन में गाय के नाम पर ठेकेदारी करते हैं। उनके शब्द कुछ और रहे होंगे लेकिन उन्होंने काफी कड़ाई से न सिर्फ यह कहा, बल्कि यह भी कहा कि अगर किसी को दलितों को मारना है, तो उनकी बजाय प्रधानमंत्री (मोदी) पर वे लोग गोली चला लें। यह बात वजन तो रखती है, और दो बातों की वजह से रखती है, पहली बात यह कि गाय के नाम पर दलितों के साथ, और अल्पसंख्यकों के साथ जाति और धर्म की हिंसा करने वाले सारे के सारे लोग नरेन्द्र मोदी की पार्टी के आसपास के हिन्दू संगठन ही हैं। दूसरी बात यह भी है कि प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ रहा है कि राज्य सरकारें ऐसी हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करें। अब सवाल यह है कि ऐसी सबसे हिंसक वारदातें खुद भाजपा की सरकारों के इलाकों में हुई हैं, तो फिर प्रधानमंत्री को ऐसी हिंसा के महीनों बाद सार्वजनिक मंच से ऐसी बात क्यों कहनी पड़ रही है? देश के प्रधानमंत्री वैसे भी किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री को उस प्रदेश की हिंसा के खिलाफ लिख भी सकता है, और बोल भी सकता है। फिर अगर मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी के हों, तो प्रधानमंत्री अपने दफ्तर का इस्तेमाल किए बिना भी, पार्टी के रास्ते यह नसीहत दे सकते थे। और अगर कई महीनों पहले नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही होती, तो हो सकता है कि देश में जगह-जगह दस-बीस दलितों और अल्पसंख्यकों की जिंदगियां बच गई होतीं।
अंग्रेजी में एक लाईन कही जाती है, टू लेट, एंड टू लिटिल। प्रधानमंत्री के कहे हुए पर यह बात लागू होती है। देश में गाय के नाम पर जो नफरत और दहशत फैलाई जा रही है, जिस तरह की साम्प्रदायिकता और जातीयता की हिंसा फैलाई जा रही है, उसने जगह-जगह दरार पैदा कर दी है, और प्रधानमंत्री ने सब कुछ देखते हुए इस झिड़की में बड़ी देर कर दी। उनकी कही हुई बात जब तक एक कानूनी कार्रवाई की शक्ल में सामने नहीं आती है, और उन्हीं की पार्टी के, उन्हीं के सहयोगी संगठनों के सैकड़ों लोग जब तक जेल नहीं पहुंच जाते हैं, तब तक उनकी कही बात महज शब्दों से बने हुए वाक्य रहेंगे, उससे अधिक कुछ नहीं। और फिर अभी तो नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के हाथ देश और राज्यों की सरकारें अगले कुछ बरस हैं ही, और आने वाले वक्त में गाय के नाम पर इंसानों का कत्ल होना या थमना यह साबित कर देगा कि वे कितने गंभीर हैं, क्योंकि इस बात को तो कोई भी नहीं मानेगा कि उनकी पार्टी या उनके मुख्यमंत्री उनके काबू के बाहर हैं।
हम इस बारे में लगातार लिखते आ रहे थे कि गाय के नाम पर की जा रही धर्मान्ध राजनीति के चलते न सिर्फ अल्पसंख्यक, बल्कि दलित-आदिवासी भी भाजपा और मोदी से कटते जा रहे हैं, और हिन्दू समाज के कई और तबकों के लोग भी ऐसी गौहिंसा के खिलाफ हैं। हिन्दू समाज के भीतर सिर्फ दलित-आदिवासियों में गाय खाने वाले लोग नहीं हैं, और भी बहुत सी जातियों के लोग गाय खाते हैं, और इन सबके ऊपर एक हिन्दू-अल्पसंख्यक-सनातनी सोच को इस तरह की हिंसा के साथ लागू करके भाजपा बड़ी तेजी से अपना जनाधार खो रही है। हो सकता है कि हमारी तरह की यह बात और लोगों ने भी मोदी के सामने रखी हो, और हो सकता है कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में दलितों की नाराजगी को दूर करने के लिए अचानक मोदी ने एक कड़ी बात कहना तय किया हो, लेकिन देश की जनता कथनी और करनी का फर्क देखते चल रही है, और भारत का चुनावी इतिहास बताता है कि जनता चाहे पढ़ी-लिखी न हो, वह ऐसा फर्क करना जानती है। फिलहाल मोदी की बातों पर जिनको अमल करना है, या नहीं करना है, वे सब उन्हीं के साथी हैं, और बाकी जनता असर और अमल की राह तक रही है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति जन्मदिवस : भीष्म साहनी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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