खिलाडिय़ों की पीठ पर लदे मैनेजर और पदाधिकारी...

संपादकीय
9 अगस्त  2016
भारत की महिला धावक दुती चांद ने रियो ओलंपिक से अपनी आवाज में एक संदेश पोस्ट करते हुए बताया कि किस तरह हैदराबाद से रियो तक का छत्तीस घंटे का सफर उसे विमान की तंग इकॉनॉमी क्लास में करना पड़ा, और न आराम मिला, न नींद हुई, और न ही उसके कोच को साथ भेजा गया। दूसरी तरफ भारतीय टीम के मैनेजर और संघ पदाधिकारी बिजनेस क्लास की लंबी-चौड़ी आरामदेह सीटों पर गए। दुती चांद ने सवाल उठाया है कि ऐसे में किसी खिलाड़ी से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
यह कोई अकेला मौका नहीं है कि खिलाडिय़ों के नाम पर पलने वाले मैनेजर और संघ पदाधिकारी अपने लिए आराम जुटाकर खिलाडिय़ों को बदहाली में रखते मिले हैं। यह एक अलग बात है कि आमतौर पर खिलाड़ी ऐसी किसी बात का विरोध नहीं करते हैं क्योंकि आवाज उठाने पर अगली बार उनके टीम में ही चुने जाने पर खतरा खड़ा हो जाता है। ऐसे ही खतरे को देखते हुए बहुत सी खिलाड़ी लड़कियां देहशोषण को भी बर्दाश्त करती रहती हैं, क्योंकि बरसों की तपस्या के बाद जब किसी बड़े मुकाबले के लिए टीम में जगह का मौका आता है, तब उसे खोने का मतलब बरसों का वक्त भी खो देना रहता है, और ऐसे में खिलाड़ी तरह-तरह से समझौते के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। उनमें से कुछ आवाज उठाते हैं, लेकिन बहुत से इसे बर्दाश्त कर जाते हैं।
जब भारत के खिलाड़ी दुनिया के मुकाबलों में बराबरी नहीं कर पाते हैं, तो उसके पीछे की बहुत सी वजहें रहती हैं। खिलाडिय़ों को वक्त पर जूते, खेल की पोशाक, या खेल के उपकरण नहीं मिलते, और सीखने का मौका नहीं मिलता, खाने को ठीक से नहीं मिलता, और सफर या रहना तो खराब रहता ही है। जब तक कि खिलाड़ी सितारा-खिलाड़ी न बन जाए, तब तक उसे खेल संघों के नेता-अफसर पदाधिकारियों के रहमो-करम पर जिंदा रहना पड़ता है। ऐसे में जाहिर है कि दुनिया के बेहतर इंतजाम वाले देशों के खिलाडिय़ों से मुकाबला आसान नहीं रहता। और जो हम आज लिख रहे हैं, यह इस खिलाड़ी के नाम के बिना पचीस बरस पहले भी लागू होता था, और शायद पचीस बरस बाद भी लागू होगा। खेलों की राजनीति में देश और प्रदेशों की सत्ता पर काबिज नेता और अफसर इसी तरह हावी रहेंगे, और खेल की प्रतिभाओं की कोई आवाज नहीं रहेगी।
दरअसल क्रिकेट के मामले में तो फिर भी सुप्रीम कोर्ट तक ने दखल दी है, और इतना समय दिया है, कि मानो सुप्रीम कोर्ट के जज मैदान के अंपायर हों, लेकिन भारत के बाकी खेलों की ऐसी किस्मत कहां। नतीजा यह है कि जब तक खेल संघों के पदाधिकारियों को अपने राजनीतिक और कारोबारी नफे  के आसार दिखते हैं, वे अपना सार्वजनिक बाहुबल बढ़ाने के लिए खेलों का इस्तेमाल करते हैं, दुनिया में अपना नाम बढ़ाने का काम करते हैं, और खिलाडिय़ों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करके नीचे कुचलते रहते हैं। न सिर्फ दुती चांद के मामले में, और न सिर्फ ओलंपिक के मामले में, हिंदुस्तान में तो जिले-जिले तक खेलों की राजनीति को खत्म करना चाहिए, वरना खिलाड़ी तो खत्म हो ही रहे हैं।

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