बूढ़ी गाय से खून दुह लेना

22 अगस्त 2016 

अभी दो दिन पहले एक परिचित परिवार में जाना हुआ जहां एक गमी हो गई थी। मृत्यु कर्म करवाने के लिए एक पंडित सामानों की लंबी लिस्ट नोट करवा रहे थे, और इसमें जब दूध की बारी आई, तो खासी देर तक यह सलाह-मशविरा चलते रहा कि पैकेट वाले दूध का क्या भरोसा कि वह गाय का होगा, या भैंस का? वे गाय के दूध पर जोर देते रहे और उन्हें यह मलाल भी था कि उनके अपने घर में गाय है और अगर उन्हें याद रहता तो वे घर से ही दूध ले आते। इसके बाद की बात शायद एक मासूम अनजानेपन में उनके मुंह से निकल गई- अगली बार मैं घर से ही गाय का दूध ले आऊंगा।
अब गमी के मौके पर अगली बार को लेकर किसी किस्म का भरोसा-दिलासा बड़ा गड़बड़ भी लग रहा था, लेकिन गाय के दूध की फिक्र में किसी का ध्यान उनकी बात की तरफ गया नहीं।
पिछले एक-दो बरस से हिन्दुस्तान में गाय सबसे ही खतरनाक जानवर हो गई है। गाय को जानवर कहने पर भी बहुत से लोगों को दिक्कत हो सकती है, और कुछ लोगों ने तो पिछले दो बरस में यह मांग भी की कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। आज शेर भारत का राष्ट्रीय पशु है, और सिंह भारत के राजचिन्ह पर विराजमान है, गाय की जगह दूध की डेयरियों में है, और धर्म-राजनीति में है, और गिनती में अगर देखें तो गाय की सबसे अधिक जगह उन घूरों पर है जहां पर लोग अपने घरों से लाकर बच्चों के पखाने से लेकर मांसाहार के बचे हुए हिस्से तक फेंकते हैं, और इन्हीं सबके बीच से फल और सब्जी के कुछ छिलके, कुछ सड़े हुए खाने को तलाश करती हुई गाय पॉलीथीन में लिपटे हुए इन सामानों के साथ-साथ पेट में प्लास्टिक का गोदाम भी बनाते चलती है। अपने शहर की सड़कों पर और सड़कों के किनारे जो अकेली तंदरूस्त गाय मुझे आज तक दिखी है, वह सरकारी जमीन पर सरकार द्वारा एक निजी कंपनी के पैसों से बनाए हुए कामधेनु-स्थल के चबूतरे पर चढ़ी हुई है, और यह तय है कि उस सड़क से निकलने वाली बाकी गायें चबूतरे पर स्थापित इस कामधेनु को जलती-भुनती ही देखती हुई जाती होंगी, एक घूरे से निकलकर दूसरे घूरे की ओर।
गाय के नाम पर हिन्दुस्तान में आज जितने तरह की नफरत फैलाई जा रही है, हिंसा की जा रही है, अगर गाय में सचमुच कोई समझ होती, तो वह घूरों पर खाने को कुछ ढूंढने के बजाय कीटनाशक कारखानों के आसपास जाकर वहां से निकला पानी पीकर मर चुकी होती। लेकिन गाय में समझ सीमित होती है, और उसे ठीक से यह एहसास नहीं होगा कि उसका इस्तेमाल नफरत शब्द के चार अक्षरों की तरह किया जा रहा है, और उसके नाम में जिस नफरत का एक भी अक्षर नहीं है, उसी नफरत को गाय के ढाई अक्षरों से गढ़ दिया जा रहा है।
यह तय है कि गाय में समझ नहीं होती है, या कि इंसानों के दर्जे की मक्कारी और कमीनेपन की समझ नहीं होती है, इसीलिए जब उसके बछड़े-बछिया को थोड़ा सा दूध पीने देने के बाद उन्हें मां के थन से हटा दिया जाता है, और फिर इंसान उसका दूध बाजार के लिए दुहने लगता है, तो गाय ठीक से समझ नहीं पाती। दुनिया में भला इंसान से परे कौन सा ऐसा इतना कमीना प्राणी होगा जो कि किसी दूसरे प्राणी के बच्चों के हिस्से का दूध छीनकर उसे खुद पीकर, उसे अपने भगवान को पिलाकर, उसे अपने मृतजनों की चिता पर चढ़ाकर, उससे देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को धोकर अपने स्वर्ग की गारंटी करता हो? किसी दूसरे प्राणी के बच्चों को भूखा रखकर उनकी मां का दूध छीन-झपट लेने वाला, निचोड़ लेने वाला कमीनापन महज इंसान में ही हो सकता है। और उसके बाद इस परले दर्जे की बेशर्मी भी इंसान में ही हो सकती है कि उस गाय को मरने के लिए घूरे पर छोड़कर, और उसे बचाने के नाम पर दूसरे इंसानों को कत्ल करने को जो आत्मगौरव और राष्ट्रगौरव मानता हो, ऐसा कमीना महज इंसान ही हो सकता है।
इस पूरे सिलसिले में मुझे एक बड़े पुराने परिचित की याद आ रही है, छत्तीसगढ़ के महासमुंद के पास एक गांव के ग्रामसेवक रहे लखन लाल मिश्र की। कई बरस हो गए हैं, और एक खतरा यह भी लग रहा है कि उनके नाम को याद करने में मुझसे कोई चूक भी हो रही हो, लेकिन इतना तो ठीक-ठीक याद है कि उनके नाम में किसी हिन्दू भगवान का नाम था, और उनका जातिनाम मिश्र था। उनकी कहानी बहुत लंबी है, और ग्रामसेवक के ओहदे से निलंबित होने के बाद जब बहाली का आदेश उन्हें अंग्रेजी में मिला, तो उसे लेने से मना करते हुए उन्होंने शायद 20-30 बरस तक वापिस नौकरी नहीं ली थी। लेकिन वह राष्ट्रभाषा के प्रेम का एक अलग मामला था, आज की इस चर्चा में उनकी एक दूसरी जिद की बात करना है।
ईमानदारी के लिए जिद पर पागल की तरह टिके रहने वाला यह ग्रामसेवक जब रिटायर हुआ, तो वह अपनी निजी आस्था के मुताबिक किसी जगह पर गायों की सेवा करने के लिए किसी डेयरी में नौकरी ढूंढ रहा था। मैं तो इसमें उनकी कोई मदद कर नहीं पाया, उन्होंने खुद ही राजधानी रायपुर (तब न छत्तीसगढ़ राज्य था, और न ही रायपुर राजधानी बना था) में एक बड़े कारोबारी परिवार में नौकरी पा ली, जहां परिवार अपनी आस्था के मुताबिक घर पर ही बहुत सी गायें रखता था, और घर का ही दूध पीता था।
लेकिन अधिक वक्त नहीं हुआ, उन्होंने वह काम छोड़ दिया, और फिर काम तलाशते हुए मेरे पास पहुंचे। उनका यह कहना था कि इस परिवार में विदेशी नस्ल की गायें हैं, जो कि उनकी मां नहीं हैं, इसलिए वे उनकी सेवा करना नहीं चाहते। और इस जिद के चलते-चलते भी उन्होंने ऐसे ही एक दूसरे परिवार में काम तलाश लिया जहां पर सिर्फ हिन्दुस्तानी नस्ल की गायें थीं।
लेकिन कुछ समय ही गुजरा था, और वे फिर काम छोड़कर आ गए। इस बार काम छोडऩे की वजह मैंने पूछी तो पता लगा कि इस सेठ के घर पर गायों की देखभाल तो होती थी, लेकिन जब दूध की बारी आती थी, तो मिश्रजी चाहते थे कि जब बच्चों का पेट पूरी तरह भर जाए, और वे खुद होकर मां से अलग हो जाएं, तभी उनका दूध दुहा जाए। वे गाय के दूध पर इंसानों का हक तभी मानते थे, जब गाय के अपने बच्चों का पेट पूरा भर चुका हो।
उनकी कई किस्म की जिद उनसे परिचय के लंबे बरसों में सामने आती रहीं, राष्ट्रभाषा के लिए जिद, गौप्रेम के लिए जिद, और उनकी जिद हिंसक भी नहीं थी। अपनी जिद पर टिके रहने के लिए वे दशकों तक निलंबित भी रहना बर्दाश्त कर चुके थे, और आखिर में हिन्दी में बहाली-आदेश मिलने पर उन्होंने सरकारी नौकरी पर काम शुरू किया था, इसी तरह गौमाता की उनकी अपनी परिभाषा थी, और उस पर अमल करने के लिए वे दूसरों पर हमला करने के बजाय खुद तकलीफ पाकर और नुकसान झेलकर रह जाते थे। गाय के दूध पर उसके बच्चों के पहले हक की उनकी अपनी जिद थी, और यह पूरी न होने पर उन्होंने पल भर में नौकरी छोड़ दी थी।
मैंने बरसों पहले अपने कॉलम में गाय को काटने के खिलाफ लिखा था। लेकिन इसके पीछे न तो मेरी भावना किसी धर्म से जुड़ी हुई है, और न ही किसी राष्ट्रप्रेम से। मेरी यह समझ दो बातों पर टिकी हुई है, एक तो यह कि मैं इंसान के इस्तेमाल के लिए किसी भी दूसरे प्राणी को मारने-काटने के खिलाफ हूं, इसलिए भी, गाय को भी, नहीं मारा जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में बचपन से गाय का दूध पीकर बड़ा होने की वजह से मेरा यह मानना है कि मेरे सरीखे लोगों को गाय का अहसानमंद होना चाहिए, क्योंकि मां के दूध के बाद गाय का दूध ही मेरे जैसे लोगों के काम आया, और इस नाते गाय से मां का रिश्ता तो बनता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह की इस्लाम के भीतर खून के रिश्ते से भी ऊपर दूध के रिश्ते को माना जाता है, और मुस्लिमों में आसपास के खून के रिश्ते के भाई-बहनों में तो शादी हो सकती है, लेकिन एक ही महिला का दूध पीने वाले दो ऐसे बच्चों में भी शादी नहीं हो सकती, जो कि एक-दूसरे के रिश्तेदार भी न हों, संबंधी भी न हों।
एक तीसरी बात भी मुझे किसी प्राणी को मारने के खिलाफ यह लगती है कि धरती पर कुदरत ने जितने प्राणी बनाए हैं, उन सबको जिंदा रहने का बराबरी का हक है, और दूसरों को मारकर खुद जिंदा रहना उन्हीं के लिए ठीक है जिन्हें कि कुदरत से एक मांसाहारी बदन ही मिला है, और उस मांसाहार के बिना वे जी नहीं सकते। इंसानों के सामने यह पसंद मुमकिन है कि वे चाहें तो आज बिना मांसाहार के रह सकते हैं, और बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि अपने लिए डेयरी और पशुपालन करने में इंसान धरती का जितना पानी इस्तेमाल करते हैं, जितना चारा व दाना इस्तेमाल करते हैं, वह मांसाहार से भरने वाले पेटों के मुकाबले कई गुना अधिक पेटों को खाली भी रखता है। मतलब यह कि अगर खाने के लिए जानवरों को न पाला जाए, तो उतनी खेती से अधिक इंसानों का पेट भर सकता है।
लेकिन इस एक वैज्ञानिक तथ्य और तर्क से परे भी मैं बाकी तमाम पशु-पक्षी, और जानवरों के साथ-साथ गाय को भी बचाने का हिमायती हूं। और मेरा यह भी मानना है कि जो लोग भी गाय का दूध पीते हैं, उन्हें खुद होकर एक ऐसा टैक्स देना चाहिए, जो कि गाय के बुढ़ापे के वक्त उसे जिंदा रखने के लिए काम आए। गाय से दूध मिलना बंद होने के बाद उसे बचाकर रखने को बहुत से लोग पर्यावरण के लिए खतरनाक मानेंगे, और उसे धरती पर बोझ भी साबित कर देंगे। लेकिन मेरा यह मानना है कि धरती पर बोझ तो इँसानों के अपने मां-बाप भी कहे जा सकते हैं, जब वे किसी उत्पादक काम के लायक न रह जाएं। लेकिन बुढ़ापे में मां-बाप फेंक तो नहीं दिया जाता। इसलिए मेरा मानना है कि जो इंसान जिस प्राणी की मदद से बड़े हुए, उस प्राणी के उपकार को याद रखना और उससे कर्जमुक्त होना इंसान के एक बेहतर इंसान बनने के लिए भी जरूरी है। और यह बात महज गाय पर लागू नहीं होती, जो लोग बकरी का दूध पीकर बड़े होते हैं, उन्हें भी उसका दो तरह से भुगतान करना चाहिए, जब तक दूध मिले तब तक अच्छा खाना-पीना तो हर कोई हर जानवर के लिए करते ही हैं, दूध मिलना बंद होने के बाद भी बाकी जिंदगी तक इस दूध का कर्ज चुकता किया जाना चाहिए।
बरसों पहले मैंने यह लिखा था कि अगर लोग हर एक लीटर दूध के पीछे एक रूपए और देने लगें, तो उससे गायों का, या भैंसों और बकरियों का, बुढ़ापा गुजर सकता है। मेरा यह भी मानना है कि जो लोग इस तरह की, कर्ज चुकाने की सोच रखेंगे, वे अपनी जिंदगी में दूसरे इंसानों के अहसानों का भी कर्ज चुकाने का सोच पाएंगे, और बेहतर इंसान बनेंगे।
लेकिन सारे प्राणियों को बचाने की मेरी आस्था मेरी निजी है। जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे अपनी मर्जी से जानवरों को मार सकते हैं और खा सकते हैं, उससे मेरे मन में उनके लिए हिंसा पैदा नहीं होती। आज हिन्दुस्तान में गाय को बचाने के नाम पर बचाया तो किसी को नहीं जा रहा है, आज सड़कों पर हर गाय पॉलीथीन का चलता-फिरता गोदाम बन चुकी है, लेकिन उसे बचाने के नाम पर दूसरे लोगों को मारा जरूर जा रहा है, और इस काम को वही लोग अधिक जोर-शोर से कर रहे हैं, जो लोग खुद गाय को बचाने के लिए कुछ भी नहीं करते हैं। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि अगर वे खुद गाय को बचाने कुछ कर रहे हैं, तो उन्हें गाय को काटने वाले लोगों को मारने का हक है। देश का कानून जहां इसकी रोक लगा रहा है, वहां पर कानून ऊपर है। लेकिन गाय के नाम पर सारे कानून हाथ में लेकर गैरकानूनी दर्जे की हिंसा करना गाय बूढ़ी हो जाने के बाद भी उससे खून दुह लेने सरीखा है।

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