शहाबुद्दीन का फिर जेल जाना लोकतंत्र की साख के लिए अच्छा

संपादकीय
30 सितंबर 2016
बिहार के सबसे अधिक कुख्यात और तरह-तरह के जुर्म में फंसे हुए बाहुबली कहे जाने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन को पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे वापिस जेल भेजने को कहा है। एक तो बिहार लंबे समय तक वैसे भी राजनीति से जुड़े हुए मुजरिमों की वजह से बदनाम राज्य था, जिसे कि नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में काफी हद तक ठीक किया है। लेकिन आज नीतीश की सत्ता में लालू यादव भी भागीदार हैं, और शहाबुद्दीन लालू यादव की पार्टी का ही एक कुख्यात नेता है। उस पर एक पूरे परिवार के लोगों को तेजाब से जलाकर मार डालने, हत्या करवाने जैसे कई आरोपों के मामले चले हैं, और चल रहे हैं। ऐसे में जब उसे बिहार हाईकोर्ट से जमानत मिली, तो उसके इलाके में बसे हुए उसके शिकार ऐसे परिवार सहम गए थे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के एक नामी-गिरामी वकील प्रशांत भूषण सामने आए, और उन्होंने शहाबुद्दीन को जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां जमानत खारिज करने के पहले कोर्ट ने बिहार सरकार को भी लताड़ लगाई कि जब पटना हाईकोर्ट में शहाबुद्दीन की जमानत का मामला चल रहा था, तब राज्य सरकार ने वहां पर इसका विरोध क्यों नहीं किया? अभी इस जमानत को रद्द करवाने के लिए राज्य सरकार भी अलग से सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
भारत की न्याय व्यवस्था में बहुत बड़े-बड़े मुजरिमों में से  कुछ गिने-चुने लोगों को ही अदालत से दिक्कत होती है, बाकी अपनी जमानत या रिहाई खरीदने, या उसका कानूनी इंतजाम करने की ताकत रखते हैं। फिर इस शहाबुद्दीन को देखें तो बरसों की जेल के बाद निकलकर बाहर आया, और मीडिया के पूछने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ बयान दिया कि वे परिस्थितियों के बने हुए मुख्यमंत्री हैं। उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री, कई विधायक, कई फरार हत्यारे, और सैकड़ों गाडिय़ां जेल पहुंचे थे। खुद लालू यादव से जब उनकी पार्टी के नेता शहाबुद्दीन के बयान के बारे में पूछा गया तो वे पूरी तरह भड़क गए थे, लेकिन शहाबुद्दीन के खिलाफ कहने को उनके पास दो शब्द भी नहीं थे। ऐसे में सत्तारूढ़ गठबंधन की एक पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने जब इस जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना तय किया, तो इसे गठबंधन के भीतर उनकी अपनी इज्जत बचाने की कोशिश भी माना गया।
शहाबुद्दीन दरअसल एक प्रतीक है कि भारतीय राजनीति में किस तरह भयानक मुजरिमों की जगह भी राजनीति में निकल आती है, पार्टियां उन्हें मंजूर करके नेता बनाती हैं, वे खुद चुनाव खरीद लेते हैं या जीत जाते हैं, और फिर अदालत से लडऩे की ताकत तो ऐसे लोगों के पास रहती ही है। ऐसे में इस आदमी की जमानत खारिज होना, और उसका जेल जाना भारत के लोकतंत्र और भारत की न्याय व्यवस्था की साख के लिए एक अच्छी बात है। भारत की राजनीति को ऐसी गंदगी से साफ करना भी बहुत जरूरी है। इसका क्या रास्ता निकल सकता है, इसके लिए समाज के जागरूक लोगों को आगे आना पड़ेगा, क्योंकि देश में शायद ही कोई ऐसी पार्टी है जिसे मुजरिमों से परहेज हो।

पाकिस्तान पर भारत की सीमित फौजी कार्रवाई

संपादकीय
29 सितंबर 2016
भारतीय थलसेना की तरफ से यह घोषणा की गई कि उसने पाकिस्तान के साथ सरहद पर एलओसी, नियंत्रण रेखा, पर सर्जिकल हमले किए, और भारत में हमले के लिए घुसने को तैयार बैठे कुछ आतंकियों को मार गिराया। इस घोषणा को भारत के किसी मंत्री की तरफ से नहीं किया गया, और इस पत्रवार्ता में बैठे हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी एक फौजी जनरल को ही सब कुछ कहने दिया। इन तमाम बातों का कूटनीतिक अर्थ यह है कि अभी भारत सरकार इसे भारतीय फौज के किसी बड़े हमले की तरह दिखाना नहीं चाह रही है, और न ही इसे एक राजनीतिक फैसला दिखाना चाह रही है, बल्कि सरहद की हिफाजत के लिए तैनात फौज का स्थानीय स्तर पर लिया गया फैसला और की गई कार्रवाई दिखाना चाह रही है। भारतीय जनरल ने यह भी कहा कि उन्होंने अपने पाकिस्तान के समकक्ष अफसर को भी फोन पर इसके बारे में बता दिया है।
पिछले कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था कि भारत कोई न कोई कार्रवाई करेगा। और यह एक न्यूनतम फौजी कार्रवाई है जिसमें सरहद पर घुसने को तैयार आतंकियों को मारा गया। हालांकि इस घटना को देखने का पाकिस्तानी नजरिया कुछ और भी हो सकता है, और अभी पाकिस्तान में ऐसी किसी हमले से इंकार भी किया है और कहा है कि भारत की तरफ से चलाई गई गोलियों से पाकिस्तान के दो सैनिक मारे गए हैं। लड़ाई के दो पक्षों के बीच नजरिए का यह फर्क हमेशा रहता है, और भारत और पाकिस्तान के बीच आगे भी बना रहेगा, लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि कोई भी कार्रवाई बहुत ही तौल-तौलकर की जाए, और जरूरत से जरा भी अधिक कार्रवाई न की जाए। हम भारत की तरह के किसी देश का आतंकी हमलों से बार-बार जख्मी होने के बाद यह हक भी मानते हैं कि वह ऐसे हमलों की जड़ पर हमला करके उसे खत्म कर सके। दुनिया के बहुत से देशों में सीमित कार्रवाई से एक संदेश भी दिया जाता है, और परेशानी के सबब को घटाया भी जाता है। भारत से लंबे समय से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह सरहद के पार जिन आतंकी कैम्पों का जिक्र करता है, उन पर हमला करके उन्हें खत्म भी करे। जिस तरह पाकिस्तान से ऐसे भड़काऊ बयान आ रहे हैं कि उन्होंने परमाणु हथियार सहेजकर रखने के लिए नहीं बनाए हैं, उसी तरह भारत में भी अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि भारत की फौज भी दिखावे की सजावटी फौज नहीं है, और जरूरत पडऩे पर उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की जरूरतों के बारे में बार-बार कहते हुए भी हमारा यह मानना तो रहता ही है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक सीमा से अधिक बर्दाश्त करके कोई देश अपने को कमजोर ही साबित करता है। और ऐसा करके वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों की तो फिक्र करता है लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों के साथ वह कभी-कभी बेइंसाफी भी कर बैठता है। नेहरू के बारे में भी कई लोगों का ऐसा मानना रहा है कि उन्होंने चीन के साथ सावधानी बरतने के बजाय उस पर एक सीमा से अधिक भरोसा करके अपने अंतरराष्ट्रीय कद का परिचय दिया था, और उसका नुकसान भारत को उठाना पड़ा था। आज भारत-पाक सरहद पर जो नौबत है, उस जटिल स्थिति में बातचीत की सारी कोशिशें भी जारी रखनी चाहिए, कूटनीतिक दबाव डालने की भी कोशिशें जारी रखनी चाहिए, और अगर जरूरत लगती है, तो इस तरह के सीमित फौजी ऑपरेशन से एक मजबूत संदेश भी भेजना चाहिए।

पाकिस्तान के मोर्चे पर अब तक भारत का रूख समझदारी का है

संपादकीय
28 सितंबर 2016
पाकिस्तान के साथ चल रही तनातनी के बीच भारत का यह फैसला एक अच्छा और अहिंसक, शांतिप्रिय फैसला है कि वह पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। भारत की इस घोषणा के बाद सार्क के दो सदस्य देशों ने भी वहां न जाने का फैसला घोषित किया है, हालांकि बांग्लादेश ने यह कहा है कि वह कुछ घरेलू कारणों से वहां नहीं जा रहा, और बांग्लादेश के अलावा अफगानिस्तान ने वहां न जाने की बात कही है। आज जब सरहद पर पाकिस्तान की फौजें कवायद करते दिखने की खबरें आ रही हैं, तब भारत का यह कूटनीतिक फैसला सही लगता है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए बने हिन्द महासागर के इन देशों के संगठन सार्क का काम और भारत पर हुए आतंकी हमले साथ-साथ नहीं चल सकते। यह एक अच्छा संकेत है कि अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के लोगों की जख्मी भावनाओं के मुताबिक नहीं चल रहे हैं, और एक देश के प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी से संतुलित और सीमित कार्रवाई ही कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान पर देश की तरफ से खासा तगड़ा हमला किया है, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को किनारे करने, अकेले करने की भारत की पहल ही आज की जरूरत दिख रही है।
भारत और पाकिस्तान में एक बुनियादी फर्क है कि भारत एक विकसित और स्थिर लोकतंत्र है, और कुछ मामलों को छोड़ दें, तो यहां पर संगठित आतंंक धार्मिक कट्टरवाद के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं कर पाया है। दूसरी तरफ भारत में फौज का न तो ऐसा कोई इतिहास है, और न ही ऐसा कोई भविष्य है कि वह निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार पर हावी हो सके। इसलिए भारत को पाकिस्तान के साथ ऐसी तनातनी के दौर में भी अपने इतिहास, अपने वर्तमान, और अपने भविष्य उन सबका ख्याल रखना चाहिए। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का ओहदा कई जिम्मेदारियों को लेकर आता है, और नरेन्द्र मोदी जैसे कल तक जंग के फतवे देने वाले नेता भी प्रधानमंत्री की हैसियत से बहुत शांत हैं, और एक नई जिम्मेदारी का परिचय दे रहे हैं। हम इस बात की हिमायती नहीं हैं कि बीते बरसों में किसी ने अगर कोई भड़काऊ बात कही है, तो आज उसे गिना-गिनाकर यह कहा जाए कि आज तुम भड़क क्यों नहीं रहे हो, आज शांत क्यों हो। विपक्ष के नेता के चुनावी तेवर, और प्रधानमंत्री की विदेश या अंतरराष्ट्रीय नीति में अगर जमीन-आसमान का फर्क है तो हम उसमें कुछ बुराई नहीं मानते। हर किसी को हालात देखते हुए खयालात बदलने की छूट रहनी चाहिए, और लोकतंत्र ऐसी छूट की मांग करता भी है।
आज कई लोगों को यह भी लग रहा है कि भारत से जिस सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान जाता है, उसे रोक देना चाहिए। लेकिन पानी और नदी के जानकार लोगों का यह भी कहना है कि किसी नदी के पानी को चाहकर भी इस तरह नहीं रोका जा सकता, और इस रोके हुए पानी को किसी बाल्टी में भरकर नहीं रखा जा सकता। इसलिए ऐसे तमाम मामलों को राजनीति से परे जमीनी हकीकत और तकनीकी सलाह देखते हुए भी तय किया जाना चाहिए। फिलहाल हमारा यह मानना है कि अमरीका जैसे देशों के दबाव में पाकिस्तान से होने वाले आतंकी हमले काबू में किए जा सकते हैं, और भारत को उस मोर्चे पर भी अधिक कोशिश करनी चाहिए। साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि जहां अमरीकी दखल से कोई बात होती है, तो वह चीनी और रूस को भी बहुत दूर तक खींचती है, और आज भारत इन दोनों बातों को भी अनदेखा नहीं कर सकता।

हफ्ते में एक दिन दफ्तर में बैठने की पहल ठीक

संपादकीय
27 सितंबर 2016
छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने मंत्रियों और सचिवों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे अपने एक दिन मंत्रालय-सचिवालय में अपने दफ्तर में बैठें और जनता से मिलें। यह पता लगा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर ऐसा हो रहा है कि सरकारी अफसर-मंत्री लोगों के लिए उपलब्ध रहें। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि बहुत साल पहले जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे, उस समय भी हफ्ते में एक दिन, हर सोमवार यह अनिवार्य किया गया था कि सारे लोग बिना किसी दौरे या मीटिंग के लोगों से मिलने के लिए अपने दफ्तर बैठें।
जिन लोगों का सरकार से वास्ता पड़ता है वे जानते हैं कि भारत में प्रचलित यह बात गलत नहीं है कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा-लगाकर जूते-चप्पल घिस जाते हैं। टीवी पर एक हिन्दी सीरियल भी आता था जिसमें दफ्तरों में जाने वाले लोगों की तकलीफ को लेकर बड़ा कड़ा व्यंग्य किया जाता था, और लोग उससे सहमत भी रहते थे। लेकिन अब देश और प्रदेशों मेें चुनावी राजनीति के चलते समझदार राजनीतिक दलों को यह मजबूरी भी लग रही है कि वे जनता की तकलीफों को कुछ हद तक तो दूर करें। हफ्ते में एक दिन दौरे और मीटिंग न रखकर आम लोगों के लिए पूरे वक्त मौजूद रहना इस कोशिश में पहला कदम हो सकता है। हमारा यह मानना है कि जनता को यह मालूम रहना चाहिए कि कौन से अफसर और मंत्री, कौन से सरकारी कर्मचारी किस दिन छुट्टी पर हैं, और आने-जाने में उसका वक्त खराब नहीं होना चाहिए। आज सरकार के हर विभाग इंटरनेट पर मौजूद हैं, और अगर वे अपनी वेबसाइटों पर विभागीय ढांचे के साथ महीने का कैलेंडर डालकर यह लिखने लगें कि कौन-कौन से लोग किस-किस दिन मौजूद नहीं रहेंगे। आज तो हाल यह रहता है कि अफसर बदल जाते हैं, बरसों तक उनके नाम नहीं बदलते, टेलीफोन नंबर बदल जाते हैं लेकिन इंटरनेट पर बरसों पुराने नंबर दिखते रहते हैं।
अभी छत्तीसगढ़ सरकार के बारे में यह पता लगा है कि नया रायपुर मंत्रालय तक लोगों के आने-जाने के लिए सरकार मुफ्त में बस सेवा उपलब्ध करा रही है। यह इसलिए भी जरूरी है कि 25 किमी दूर बसे हुए मंत्रालय तक जाना आम लोगों की जेब से परे की बात होती है। इसके अलावा सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि ऐसे मंगलवार को सुबह से लेकर शाम तक कोई बैठक न रखी जाए, और तमाम लोग मौजूद रहें। लोकतंत्र में अगर जनता को इतनी सहूलियत भी नहीं मिलेगी, तो उसकी नाराजगी निकलती ही रहेगी। लेकिन इससे परे भी कुछ और बातें छत्तीसगढ़ सरकार को तेजी से करनी चाहिए। अलग-अलग विभागों में कौन सी फाईल कहां तक पहुंची है, इसे इंटरनेट पर डालना चाहिए, और इसकी गोपनीयता जहां जरूरी है, वहां पर उसे बनाए रखने के लिए फाईल के नंबर के साथ तलाशने की सहूलियत होनी चाहिए। राज्य सरकार अगर चाहे तो कम्प्यूटर पर अपने खुद के लिए एक ऐसी सुविधा जुटा सकती है जिससे किसी एक टेबिल पर एक फाईल एक सीमा से अधिक समय तक रहने पर उसे खबर लग जाए। ये तमाम बातें प्रशासनिक सुधार के तहत बड़ी छोटी-छोटी और आम समझ वाली बातें हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि भूतपूर्व नौकरशाहों को ही प्रशासनिक सुधार का जिम्मा दिया जाता है। जिन लोगों ने अपनी पूरी सरकारी नौकरी के दौरान किसी सुधार की कोशिश नहीं की, वे अब रिटायर होने के बाद पुनर्वास के लिए सुधार के ऐसे नाटक में लग जाते हैं। सुधार तो दफ्तरों का चक्कर लगाने वाले आम लोगों की राय से हो सकता है, किसी सरकारी अफसर के किए हुए नहीं। 

रामदेव का कारोबार कोई समाजसेवा नहीं अकेले बालकृष्ण का मालिकाना हक है

26 सितंबर 2016   

इन दिनों हिन्दुस्तान के टीवी समाचार चैनलों पर टीवी के अपने समाचार पढऩे वाले लोगों के अलावा जो चेहरा सबसे अधिक दिखाई देता है, वह बाबा रामदेव, और उनके सहयोगी बालकृष्ण का है, जो कि अपने अनगिनत सामानों के अनगिनत इश्तहारों की मॉडलिंग करते हुए दिखते हैं, और रामदेव अपने सुपरिचित गैरजिम्मेदार अंदाज में देश के बाकी सभी सामानों, सभी कंपनियों को कोसते हुए, उन्हें विदेशी कंपनी या घटिया सामान बताते हुए पतंजलि ब्रांड के अपने सामानों को बढ़ावा देते दिखते हैं। एक समय वे योग बेचते थे, फिर वे कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जागरूकता बेचते थे, फिर वे कालेधन को देश में लाने की मांग बेचते थे, फिर वे मोदी के अच्छे दिन बेचने लगे, और अब वे अपने सामानों को बनाने वाली तमाम कंपनियों की साख को बेचते हैं, और अपना बाजार बढ़ाते हैं।
ये तमाम बाजारू हथकंडे हैं, और इनको लेकर हमें कोई खास शिकायत उनसे नहीं है। जो बाजार में उतरते हैं, वे दूसरों के सामान को घटिया बताकर ही अपने सामान को बेहतर साबित करने का काम करते हैं। वही काम आज देश के सबसे बड़े बाजारू योगी-सन्यासी भगवा रामदेव भी कर रहे हैं, यहां तक भी कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन दिक्कत इस बात पर है कि जब वे बार-बार अपने सामानों को लेकर स्वदेशी का नारा, देशप्रेम या राष्ट्रप्रेम का नारा लगाते हैं, जब-जब वे दूसरी कंपनियों को विदेशी, बहुराष्ट्रीय, या मुनाफाखोर कंपनियां कहते हैं, तब-तब वे बाजार की आम बेईमानी को इस्तेमाल करते हुए इन हथकंडों की वजह से भगवा कपड़ों, योग, आध्यात्म, ध्यान, और आयुर्वेद, इन सभी को साख को चौपट करते हैं। योग और आयुर्वेद ऐसे हथकंडों पर जिंदा बातें नहीं हैं, और हजारों बरस से इनकी साख चली आ रही थी, और आज इनके नाम पर यह बाबा नूडल्स से लेकर जींस तक बनाकर बेचने चला है।
लेकिन इन बातों से भी बड़ी दिक्कत एक दूसरी है। जब बाबा दूसरों को मुनाफाखोर कहता है, बाजारू कहता है, तब ऐसा आभास होता है कि पतंजलि एक ट्रस्ट है जिसका मुनाफे से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि पतंजलि सामानों का कारोबार बाबा के सहयोगी बालकृष्ण के हाथ में है, और अभी-अभी कारोबार की दुनिया की एक सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका, फोब्र्स का जो सर्वे सामने आया है, उसमें भारत के सबसे संपन्न सौ खरबपतियों में इस बालकृष्ण का नाम भी है जिसके नाम पर 25 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति लिखाई हुई है। और यह एक निजी हैसियत से पाई हुई संपत्ति है, किसी ट्रस्ट की संपत्ति नहीं है। इस पत्रिका के आंकड़े बताते हैं कि पतंजलि कारोबार का 94 फीसदी शेयर अकेले बालकृष्ण के नाम पर है।
किसी के नाम पर कारोबार रहने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब इसके लिए भगवा कपड़े और योगी का चोला पहनकर, अपने को राष्ट्रवादी और स्वदेशी बताकर और दूसरों को लुटेरा और मिलावटी बताकर जब यह कारोबार खड़ा किया जाता है, जब यह झांसा खड़ा किया जाता है कि मानो यह कारोबार कोई समाजसेवक ट्रस्ट कर रहा है जिसका मुनाफा किसी के नाम पर नहीं रहेगा, तो वह झांसा बुरा है।
और फिर यह देखें कि बालकृष्ण कौन है, तो बालकृष्ण की नागरिकता को लेकर बरसों से विवाद चले आ रहा है कि वह नेपाली मूल का है, और भारतीय नागरिकता पाने के लिए उसने जिन संस्थानों से पढ़-लिखकर सर्टिफिकेट पाने की बात सरकारी अर्जी में लिखी थी, उन संस्थानों का ही या तो खुद का अस्तित्व नहीं है, या फिर वहां पर बालकृष्ण नाम के ऐसे किसी शख्स का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इसके अलावा अखबारों की कतरनों में यह अच्छी तरह दर्ज है कि केन्द्र सरकार की बहुत सी जांच एजेंसियों ने किस तरह बालकृष्ण को मनी लॉड्रिंग की जांच के घेरे में लिया था, बहुत से नोटिस भी दिए थे, फाईलें भी बनी थीं, लेकिन फिर भी मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह रामदेव एक राजयोगी का दर्जा पा गए, उसी तरह बालकृष्ण एक राजमाफी का दर्जा पा गया, और सारी जांच बंद हो गई।
रामदेव दूसरी कंपनियों के सामानों में जिस मिलावट की बात करते हैं, और अपने सामान को बढ़ावा देते हैं, वही मिलावट वे अपने कारोबार और अपनी लफ्फाजी में कर रहे हैं, जब वे अपने आपको अकेली स्वदेशी कंपनी की तरह पेश करते हैं। हकीकत तो यह है कि जिन सौ सबसे बड़े खरबपतियों की लिस्ट में उनके सहयोगी बालकृष्ण बीचोंबीच हैं, उस लिस्ट के शायद सारे ही लोग भारत के ही उद्योगपति हैं, और उनका काम और कारोबार भी हिन्दुस्तानी ही है। उन्होंने कभी कालेधन को लेकर असंभव किस्म के गैरजिम्मेदार नारे भी नहीं लगाए, और अपने कारोबार को एक कारोबारी की तरह बढ़ाया है।
रामदेव अपने धंधे को बढ़ाने के लिए सरकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं, सार्वजनिक जगहों और कार्यक्रमों का इस्तेमाल कर रहे हैं, टैक्स रियायतों और जांच एजेंसियों की अनदेखी का इस्तेमाल कर रहे हैं, सस्ती सरकारी जमीन पा रहे हैं, मध्यप्रदेश में तो सरकार सरकारी राशन दुकानों से पतंजलि के सामान बेचने जा रही है, और रामदेव आज देश के सबसे रफ्तार से बढ़ते हुए ऐसे कारोबार हैं, जिसका 94 फीसदी मालिक बालकृष्ण है।
दरअसल सार्वजनिक जीवन में लोगों को कारोबार और समाजसेवा, इन दोनों को अलग-अलग करके ही चलना चाहिए। खासकर जो लोग नैतिकता और ईमानदारी, देशभक्ति और राष्ट्रसेवा के नारे कुछ अधिक ही लगाते हैं, उन्हें यह भी साफ करना चाहिए कि उनका कारोबार जो मुनाफा करता है, उसका मालिक कोई ट्रस्ट है, या कि कोई एक व्यक्ति है? उस मुनाफे का क्या इस्तेमाल होता है, और अगर यह निजी कारोबार है तो इसकी तस्वीर एक समाजसेवा की तरह, देशसेवा की तरह पेश करके बाकी कारोबारियों को खलनायक और मुजरिम की तरह पेश करना कहां की नैतिकता है?

इसरो की कामयाबी के बहाने कुछ बातें

संपादकीय
26 सितंबर 2016
भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो ने आज फिर एक बड़ी कामयाबी हासिल की जब उसने अपने एक रॉकेट से कई उपग्रह तो भेजे ही भेजे, उसने एक बार में ही अंतरिक्ष की दो अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रह स्थापित किए। देश में कम ही ऐसे संस्थान हैं जो कि भारत को बार-बार गौरव का मौका देते हैं, और केन्द्र में आती-जाती सरकारों, आती-जाती पार्टियों से प्रभावित हुए बिना लगातार आसमान छूती कामयाबी देश के सामने पेश करते हैं। उधर दूर गुजरात में अमूल नाम का एक ब्रांड सहकारिता क्षेत्र के सबसे बड़े प्रयोग की वजह से देश भर में दूध की नदियां बहा रहा है, और अपने देशी बाहुबल से अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को डेयरी-उत्पादों के मामले में बाजार में लगातार शिकस्त भी दे रहा है। और यह कैसा विचित्र संयोग है कि केरल में केन्द्रित भारत के अंतरिक्ष अभियान में एक समय विक्रम साराभाई गुजरात के थे, और दूसरी तरफ गुजरात में आनंद में अमूल का पूरा साम्राज्य खड़ा करने वाले वर्गीज कुरियन केरल के थे। अब भारत का अंतरिक्ष संस्थान इसरो देश के लिए कमाई भी कर रहा है, और दुनिया भर की सरकारों और निजी कंपनियों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने में लगातार कामयाब हो रहा है, और जिस तरह एक वक्त भारत के मजदूर दुनिया के कई देशों में जाकर खूब मेहनत से कमाते थे, और वहां की अर्थव्यवस्था को बढ़ाते थे, कुछ उसी तरह आज भारत का यह रॉकेट-कुली दुनिया के कई देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचा रहा है, और अपने खुद के रिसर्च के नए-नए रिकॉर्ड बना भी रहा है।
इस मौके पर कुछ बातों को सोचने की जरूरत है। ऐसी क्या वजह है कि इसरो के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों में अधिकतर लोग दक्षिण भारतीय हैं, उत्तर भारत के लोगों में टेक्नालॉजी की समझ और सीख में कमी क्यों हैं? दूसरी तरफ इसरो की कामयाबी में पिछले बरसों में लगातार ऐसी तस्वीरें भी सामने आई हैं कि वहां महिला वैज्ञानिक बड़ी संख्या में हर कामयाबी के पीछे हैं, और इससे भी भारतीय महिला की एक अलग, शानदार, गौरव के लायक तस्वीर बनती है। फिर एक सवाल यह उठता है कि देश में बहुत सारी सरकारी कंपनियां हैं, एजेंसियां हैं, और शिक्षा और शोध के संस्थान भी हैं। इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो भारी नुकसान में चलते हैं, जिन्हें बेचने की बात आती है, जहां पर भ्रष्टाचार हावी रहता है, और जो नाकामयाबी की मिसालें हैं। दूसरी तरफ अमूल और इसरो जैसे कामयाब संस्थान भी इसी देश के हैं। और हम सरकार से जुड़े सहकारिता आंदोलन वाले अमूल-आनंद को न भी देखें, तो भी एक और सहकारिता-प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर एक अविश्वसनीय कामयाबी वाला है। इंडियन कॉफी हाऊस नाम से पूरे देश में खाने-पीने की सबसे विश्वसनीय, और किफायती जगहें देखने को मिलती हैं, और उसमें काम करने वाले कर्मचारी एक सहकारी संस्थान के सदस्यों की तरह उसे चलाते हैं, विश्वसनीयता को जारी रखते हैं, और सरकारी अनुदान के बिना भी वे एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पेश करते हैं।
हम इस बारे में पहले भी लिख चुके हैं कि देश में ऐसे कामयाब तजुर्बों को बाकी जगहों पर भी लागू करने की कोशिश की जानी चाहिए। ऐसा करने पर भारत एक बहुत ही अधिक उत्पादक और सफल अर्थव्यवस्था बन सकेगा, और उसकी अंतरराष्ट्रीय साख भी बढ़ सकेगी। देश में एक से अधिक इसरो की जरूरत तो नहीं है, लेकिन देश के कई हिस्सों में आनंद जैसा सहकारी-डेयरी का प्रयोग जरूर हो सकता है, और सहकारी क्षेत्र में डेयरी से परे भी बहुत से दूसरे कामकाज को सफलता से बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए राजनीतिक दखल और राजनीतिक भ्रष्टाचार से परे रहने देने जितनी सरकारी रियायत की जरूरत रहती है। अगर भ्रष्ट नेता-अफसर अपने हाथ अलग रखें, तो अमूल जैसे कई ब्रांड कई दूसरे सामानों में आ सकते हैं, और इसके लिए ही कोशिश करनी चाहिए। ऐसा एक-एक ब्रांड करोड़ों लोगों को काम भी दे सकता है, और देश की अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ जोड़ भी सकता है।

मोदी अपने ही कल के कद से बहुत ऊंचे होते हुए दिख रहे

संपादकीय
25 सितंबर 2016
भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के मुद्दे पर हफ्ते भर की अपनी चुप्पी तोड़ी, और भारत पर चल रहे आतंकी हमलों के बीच पाकिस्तान की जनता और वहां की सरकार को एक किस्म से यह चुनौती दी कि पाकिस्तान के नेता हजार साल तक लडऩे की बात करते हैं, तो वह चुनौती वे मंजूर करते हैं लेकिन यह लड़ाई दूसरे मोर्चे पर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सरकार आपको गुमराह करने के लिए हिन्दुस्तान से 1000 साल तक लडऩे की बात करती है। आज दिल्ली में ऐसी सरकार बैठी है कि आपकी इस चुनौती को स्वीकार करती है। भारत लडऩे के लिए तैयार है। आओ लड़ते हैं देखें पहले अपने देश की गरीबी कौन खत्म करता है। पहले बेरोजगारी पहले कौन खत्म करता है। दोनों देश अशिक्षा को खत्म करने के लिए लड़ें, देखें पहले कौन अशिक्षा से पार पाता है। आओ नवजात शिशुओं को बचाने की लड़ाई लड़ें।
पूरा देश मोदी की प्रतिक्रिया की तरफ ध्यान से देख रहा था, और यह देर से आई, लेकिन दुरूस्त आई। आज पाकिस्तान के मोर्चे पर मोदी अगर पल भर को जंग का ऐलान कर देते, तो वे देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के हीरो बन जाते। लेकिन इतिहास उन्हें एक गैरजिम्मेदार के रूप में दर्ज करता। आज मोदी ने अपने पर काबू पाकर, और जनता के लिए एक लुभावने जंग के ऐलान से बचकर अपने को अधिक बड़ा साबित कर दिया है। सोशल मीडिया पर आमतौर पर मोदी के आलोचक रहने वाले लोग और वामपंथी सोच रखने वाले लोग भी मोदी की सहनशीलता और उनके इस बयान की तारीफ कर रहे हैं, जो कि राष्ट्रवादी-हिंदूवादी फतवापरस्ती से परे का है, और एक बहुत जिम्मेदारी की बात करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच इसी एक सोच की गुंजाइश रहनी चाहिए, क्योंकि लड़ाई तो आसान है, और उसकी कीमत भुगतना मुश्किल है। हमने अभी-अभी कुछ अर्थशास्त्रियों का यह अंदाज इसी जगह लिखा भी था कि पाकिस्तान के साथ एक जंग भारत को दस बरस पीछे ले जाएगी। यह जाहिर है कि वह पाकिस्तान को और भी अधिक पीछे ले जाएगी, क्योंकि वह आज भी सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर अपने लोगों को भारत के लोगों के मुकाबले नहीं ला पाया है। पाकिस्तानी जनता न ठीक से पढ़-लिख पाई है, न ही उसकी कमाई का ठिकाना है, और समाज आतंक की दहशत की गिरफ्त में है, कट्टरपंथ की गिरफ्त में है, और देश में लोकतंत्र भारत की तरह मजबूत नहीं हो पाया है। ऐसी ही तमाम कमजोरियों के चलते किसी देश की जनता, वहां की सरकार, और वहां की फौज को जंग सुहाती है। लेकिन हिन्द महासागर के क्षेत्र में एक बड़ा देश और बड़ी ताकत रहते हुए भारत को बड़प्पन दिखाना चाहिए, और एक अधिक मजबूत लोकतंत्र होने के नाते अधिक जिम्मेदारी भी दिखानी चाहिए, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल यही किया है।
सोशल मीडिया पर उनके आलोचक भी यह मानते हैं कि मोदी अगर पाकिस्तान के मोर्चे पर एक कामयाबी पाते हैं, तो वे अकेले, या पाकिस्तानी नेता के साथ मिलकर नोबल शांति पुरस्कार जैसा कुछ पा भी सकते हैं। हम इसे एक भावनात्मक अटकल मानते हुए भी यह मानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री को एक पार्टी के नेता के कद से ऊपर उठकर, एक पार्टी की विचारधारा से ऊपर उठकर, एक धर्म की विचारधारा से ऊपर उठकर विश्व के एक बड़े नेता की तरह की दरियादिली और जिम्मेदारी दोनों ही दिखानी चाहिए, क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री न सिर्फ अपनी साख कायम करते हैं, बल्कि वह देश की साख भी कायम करते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अभी जो बातें कही हैं, वे उनका कद भी बढ़ा गई हैं, और पाकिस्तान की जमीन से भारत पर होने वाले हमलों को लेकर पाकिस्तान को यही मुंहतोड़ जवाब बाकी दुनिया में भारत को एक ऊंची जगह दिलाएगा, और पाकिस्तान को अलग-थलग भी करेगा। आज मोदी की जगह कोई गैरभाजपाई प्रधानमंत्री होते, तो उनकी ऐसी बात पर वह तबका उबल पड़ा होता जो कि आज मोदी की वजह से गम खाकर चुप रह गया है। कोई कांग्रेसी या समाजवादी-वामपंथी मोदी की जगह ऐसी दरियादिली दिखाकर कायर और गद्दार जैसी गालियां भी पा जाते, लेकिन यह अच्छा है कि मोदी ताजा इतिहास में अपनी ही कही हुई हमलावर बातों से उबरकर एक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी दिखा रहे हैं, और आने वाले बरसों में उन्हें जंग से परे के रास्तों को ही तलाशना होगा, उसी में भारत का भी भला है, और पड़ोस के एक छोटे देश, एक कमजोर लोकतंत्र, और भारत से अधिक गरीब आबादी वाले पाकिस्तान का भी भला है।

हैवानियत की खबर अगली हैवानियत सामने आने तक

संपादकीय
24 सितंबर 2016
जिंदगी में जिन लोगों को अपनी दुख-तकलीफ से बहुत सी शिकायतें हों, उनका एक इलाज तो मनोचिकित्सक कर सकते हैं। और उनका दूसरा अवैज्ञानिक, गैरमेडिकल इलाज भी है, कि उन्हें किसी सरकारी अस्पताल में कुछ दिन तक रोज चक्कर लगाने के लिए कहा जाए। वहां जब वे लोगों की दुख-तकलीफ को देखेंगे, तो उनका सारा दर्द जाता रहेगा। झारखंड की राजधानी रांची अपने साथ बनी बाकी दोनों प्रदेशों की राजधानियों के मुकाबले अधिक सुविधा-संपन्न थी, क्योंकि वह बिहार में पहले से उपराजधानी का दर्जा पाई हुई थी। लेकिन वहां के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जिस तरह एक जख्मी गरीब मरीज महिला को फर्श पर खाना दे दिया गया कि वहां बर्तनों की कमी है, तो लगता है कि हैवानियत के अच्छे दिन आ गए हैं। इंसानियत के चेहरे से मुखौटा हटा हुआ सा लगता है, और अस्पताल के बड़े-बड़े अफसरों से लेकर खाना बांटने वाले छोटे कर्मचारियों तक का असल चेहरा इससे उजागर हुआ है।
कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह अस्पतालों से लाशों को ले जाने, बीमारों को अस्पताल लाने, और इलाज के लिए दाखिला देने या न देने में जो हैवानियत सामने आती है, उसके बारे में लिखा था। और इतनी जल्दी एक तस्वीर, इस एक मामले की वजह से फिर लिखना पड़ रहा है। झारखंड आदिवासियों की अधिक आबादी वाला एक ऐसा राज्य है जो कि खनिजों की वजह से अमीर होते हुए भी गरीब राज्य है, गरीबों का राज्य है। ऐसा नहीं होता तो यहां के लोग भी इलाज के लिए निजी अस्पतालों में गए होते, और सरकारी अस्पताल में न आए रहते। सरकारी अस्पताल चाहे वे झारखंड के हों, या कि छत्तीसगढ़ के, उनकी बदहाली से एक बात साफ है कि सत्ता पर बैठे हुए लोग कभी भी इन अस्पतालों में एक आम मरीज की तरह पांव भी नहीं रखते। छत्तीसगढ़ में तो हमने कई राज्यपालों और मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी इलाज या जांच के लिए राजधानी के, प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचते देखा है। और कभी-कभी हो सकता है कि कोई मंत्री या अफसर भी यहां पहुंचे हों। लेकिन उनके लिए जिस तरह का इंतजाम पहले से किया जाता है, उससे इसकी गारंटी हो जाती है कि उन्हें आम मरीज जैसा कुछ भी न भुगतना पड़े। इसका यह नतीजा होता है कि सरकारी अस्पताल कभी नहीं सुधर पाते।
देश के सरकारी अस्पतालों में अमूमन गरीब ही जाते हैं, न तो उनकी राजनीतिक पहुंच होती है, और न ही वे आसानी से सरकारी अस्पतालों में प्रचलित रिश्वत दे पाते हैं। नतीजा यह होता है कि वे हर जांच के लिए, इलाज के लिए, और ऑपरेशन के लिए ऐसी अंतहीन कतार में लग जाते हैं, कि जो इंसानियत से परे की होती है। आमतौर पर न्याय व्यवस्था को लेकर यह बात कही जाती है कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता है। लेकिन क्या देर से मिला इलाज, इलाज कहा जा सकता है? यह जाहिर है कि जब वक्त पर इलाज नहीं मिलता है, तो मर्ज बेकाबू हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में हम कई बार यह सुनते हैं कि एड्स जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी के मरीजों को भी समय पर दवा नहीं मिल पाती है क्योंकि उसकी खरीदी समय पर नहीं हो पाई है। ये बीमारियां ऐसी हैं कि जिनमें समय पर दवा न मिले तो बदन में बीमारी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेती है। अब रांची के अस्पताल में फर्श पर महिला को खाना दिया गया है, उसे खाने के साथ-साथ किस तरह की गंदगी, और किस तरह की बीमारी और मिल जाएगी, इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। हमको तो लगता है कि ऐसी नौबत आने पर बड़े-बड़े मंत्रियों और अफसरों को शर्म खाकर इस्तीफा दे देना चाहिए, और अदालतों को खुद होकर मुकदमा दर्ज करके ऐसे अस्पतालों के इंतजाम देख रहे मंत्री-अफसर की तनख्वाह भी काटनी चाहिए, उन्हें प्रतीकात्मक सजा भी देनी चाहिए।
फिलहाल दो दिनों तक मीडिया इन खबरों से भरा हुआ है, तब तक ही भरा रहेगा जब तक कि इंसान कहे जाने वाले लोगों की हैवानियत कही जाने वाली कोई अगली हरकत सामने नहीं आएगी, और हमारा तजुर्बा कहता है कि उसमें अधिक देर नहीं है।

यह वक्त वीर रस का युद्धोन्माद फैलाने का नहीं, गरीब देशों में जंग का खतरा समझने का है..

संपादकीय
23 सितंबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कुछ तो बढ़ रहा है और कुछ बढ़ाने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान के एक अखबारनवीस ने यह लिखा कि वहां के आसमान पर बीती रात लड़ाकू विमान उड़ते हुए दिखे। इसे लेकर भारत में भी तनाव खड़ा हुआ है, और मीडिया के कुछ भरोसेमंद और जिम्मेदार तबकों की भी यह खबर है कि भारत में सरहद की तरफ तोपखाने तैनात करना शुरू कर दिया है। उधर महाराष्ट्र से खबर है कि घोर साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पाकिस्तानी कलाकारों को धमकी दी है कि वे भारत छोड़कर चले जाएं वरना उन्हें मार-मारकर भगा दिया जाएगा।
भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकी और फौजी तनाव खड़ा करने में सरहद के दोनों तरफ के कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक, आतंकी, युद्धोन्मादी, और कुछ फौजी अफसरों को हमेशा ही मजा आता है। इनमें से कोई भी सरहद पर जाकर जंग लडऩे वाले लोगों में से नहीं हैं। और दोनों तरफ के टीवी चैनलों पर जो बुढ़ा चुके फौजी जनरल युद्ध के लिए चीखते हैं, उन्होंने भी कभी अपनी जिंदगी में सरहद का खतरा नहीं झेला है, और कम से कम आज तो उस खतरे से दूर ही हैं। ऐसे में पाकिस्तान का एक पोस्टर सामने आया है जो वहां के एक रेस्त्रां पर लगा है, और जिस पर लिखा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव घटाने के लिए पाकिस्तान आए हुए हिन्दुस्तानियों को उनका वीजा दिखाने पर तोहफे में खाना खिलाया जाएगा। जब जंग की बातें होती हैं तो दोनों तरह के लोग दोनों तरफ सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में अगर अमन-पसंद लोग घर बैठ जाएंगे, तो गुंडाई और आतंकियों की बन पड़ेगी। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि अखबारों से लेकर बाकी मीडिया तक और राजनीति से लेकर अर्थशास्त्र तक के लोगों तक यह समझने की जरूरत है कि कोई भी जंग मुफ्त में नहीं होती है, और भारत और पाकिस्तान में अनगिनत आबादी कुपोषण के शिकार ऐसे बच्चों की है, इलाज के बिना दम तोड़ते ऐसे गरीबों की है, जो किसी भी जंग का सबसे बड़ा शिकार होंगे, और जिनसे रोटी, कपड़ा, मकान, इलाज, पढ़ाई यह सब कुछ छिन जाएगा। आज ही एक अर्थशास्त्री का यह विश्लेषण आया है कि अगर यह जंग होती है तो भारत की अर्थव्यवस्था दस बरस पीछे चली जाएगी।
जंग की बात वे लोग करते हैं जो पांच सितारा अस्पतालों में अपना इलाज कराते हैं, वे लोग करते हैं जो करोड़ों का काला धन चुनाव में खर्च करते हैं, वे लोग करते हैं जो हथियारों के कारखानेदारों से दलाली पाते हैं। दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान जैसे कल तक के भाई-भाई देशों में तमाम गरीब और तमाम अमन-पसंद लोग किसी भी जंग की बात का खतरा और नुकसान अच्छी तरह जानते हैं, और अच्छी तरह समझते हैं। आज भी दोनों देशों में बहुत से समझदार लोग लगातार यह दिख रहे हैं कि फौजी हमले या जंग से परे कौन सी ऐसी तरकीबें हैं जिनसे दोनों देशों के बीच बातचीत हो सकती है, या कि भारत पाकिस्तान पर दबाव बना सकता है। यह समय है जब जिम्मेदार तबका अपनी बातचीत में भी सावधान रहे, और लोकतंत्र की समझ से परे वीर रस की जो कविताएं लिखी गई हैं उन कविताओं को चारों तरफ फैलाकर एक उग्र राष्ट्रवादी युद्धोन्माद न फैलाएं। 

दिल्ली के इतने विधायकों पर कार्रवाई, गलती कहां पर है?

संपादकीय
22 सितंबर 2016
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विधायक संसदीय सचिव बनकर सहूलियतें पाने के मामले में वैसे भी विधानसभा सदस्यता से अपात्र होने की कगार पर हैं, दूसरी तरफ वे अलग-अलग किस्म के मामलों में पुलिस में भी फंस रहे हैं, और गिरफ्तार भी हो रहे हैं। यह बात तय है कि केजरीवाल-सरकार जिस तरह से मोदी सरकार से सांप-नेवले जैसे संबंध रख रही है, और दोनों के बीच अंतहीन-स्थायी टकराव दिन में चार बार होने का सिलसिला चल रहा है, उसके चलते केन्द्र सरकार के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस से केजरीवाल के विधायक किसी रियायत की उम्मीद नहीं कर सकते। बहुत से मामलों में राजनीतिक बदला लेने की तोहमत न लगे इसलिए कई सरकारें विपक्षी नेताओं के साथ भी रियायत बरतती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली में मोदी सरकार की पुलिस को ऐसी कोई फिक्र नहीं है। ऐसा भी नहीं कि हम ऐसी रियायत के हिमायती हों, हमारे हिसाब से तो राजनीतिक या सरकारी, या संवैधानिक, या कारोबारी, जैसी भी ताकतवाले लोग हों, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, और हम तो इसी जगह कई बार ऐसे लोगों के लिए अधिक कड़ी सजा का इंतजाम करने की मांग कर चुके हैं। लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी के इतने अधिक विधायकों पर कानूनी कार्रवाई से दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि आम आदमी पार्टी के विधायक राजनीति में पहली बार चुनकर आए हैं, और ऐतिहासिक बहुमत के साथ जीत और सरकार में उनके दिमाग आसमान पर कर दिए हैं। और दूसरी बात यह कि मोदी सरकार इनको निपटाने का कोई मौका छोडऩा नहीं चाहती है।
अब सवाल यह है कि अगर कोई मौका खड़ा ही नहीं होगा, तो क्या मोदी सरकार की पुलिस किसी के घर घुसकर झूठा मुकदमा खड़ा कर रही है? अभी दो दिन पहले एक आप विधायक गिरफ्तार किया गया जिस पर उसकी एक रिश्तेदार महिला ने ही किसी यौन अपराध की शिकायत दर्ज कराई थी। आज एक दूसरे विधायक सोमनाथ भारती की गिरफ्तारी की खबर है जिन पर एम्स के सुरक्षा कर्मचारी से बदसलूकी का आरोप है। इसी तरह बहुत से आप विधायकों पर अलग-अलग तबकों के लोगों ने आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। सोमनाथ भारती जब मंत्री थे तब उन्होंने दिल्ली में रह रहीं अफ्रीकी महिलाओं के साथ बदसलूकी की थी, और तब तो शायद दिल्ली पुलिस यूपीए सरकार के मातहत थी, और मोदी सरकार सत्ता में आई भी नहीं थी। मोदी बदला लेने के लिए कुछ नहीं कर सकते, ऐसा हमारा बिल्कुल भी मानना नहीं है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनको अपना खुद का बर्ताव, और चाल-चलन ऐसा रखना चाहिए कि वह किसी जुर्म के दायरे में न आए। अब दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल अभी एक दूसरे मामले में अदालत के कटघरे में हैं कि उन्होंने दिल्ली पुलिस को एक अपमानजनक शब्द, ठुल्ला, कहा था, और अब अदालत में उनसे यह जवाब देते नहीं बन रहा कि इस शब्द का मतलब क्या है, और उन्होंने पुलिस के लिए इसका इस्तेमाल क्यों किया?
अभी दिल्ली महिला आयोग में आम आदमी पार्टी की एक महिला नेता के खिलाफ पुलिस ने बहुत सी नौकरियां देने में गड़बड़ी के आरोप में जुर्म दर्ज किया है, और इस मामले में केजरीवाल का नाम भी जोड़ दिया गया है। पल भर में केजरीवाल की प्रतिक्रिया थी कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहने से किया गया है। हमारा यह मानना है कि सरकारी या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को आरोप बाद में लगाना चाहिए, पहले खुद पर लगे हुए आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। तथ्य तो धरे रह जाते हैं, विशेषणों में बात होने लगती है। अगर कोई तथ्य या सुबूत आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ नहीं हैं, तो भारत की अदालतें बहुत से मामलों में पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों के खिलाफ भी बहुत कड़ी बातें कहते आई हैं, और हो सकता है कि दिल्ली पुलिस भी अदालत की ऐसी फटकार पाए, अगर उसने आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे गढ़े हैं। लेकिन फिलहाल केजरीवाल और उनके साथियों को यह सोचना चाहिए कि क्या उनके लोगों में कोई ऐसी कमियां या खामियां हैं कि जिनके चलते उनके खिलाफ ऐसी शिकायतें हो रही हैं, और मामले मुकदमे की नौबत आ रही है? ऐसा न करके सिर्फ राजनीतिक बदले का आरोप लगाकर केजरीवाल अपने लोगों को और लापरवाह बना रहे हैं, वे खुद भी ऐसे आरोपों के साए में अपनी लापरवाही के साथ चैन से बैठे हैं। लेकिन पूरे पांच बरस रात-दिन आरोपों से किसी भी पार्टी की सरकार, या राजनीति नहीं चलती। इस सोच और सिलसिले का नुकसान ऐसे लोगों को होता ही है।

कंधों पर बीमार और लाश की अनगिनत कहानियां...

संपादकीय
21 सितंबर 2016
एक बार मीडिया में किसी किस्म की खबरें आना शुरू होती हैं, तो बाकी जगहों पर मीडिया के बाकी लोगों का ध्यान भी उस तरह जाता है, और फिर वैसे मामलों का सैलाब सा आ जाता है। पिछले एक महीने में देश के अलग-अलग बहुत से हिस्सों से ऐसी खबरें आईं कि एम्बुलेंस न मिलने पर किस तरह टांगकर पहुंचाया गया, रास्ते में कैसे मौत हो गई, और किस तरह लाश को घर ले जाने के लिए कोई गाड़ी न मिली, तो कंधे पर लादकर पति किस तरह रोती हुई बेटी के साथ निकल पड़ा। ऐसे मामले दिल हिला देते हैं, लेकिन अकेली सरकार को तोहमत देना जायज नहीं है।
यह न सिर्फ ओडिशा की बात है, या बस्तर और सरगुजा की बात है, बल्कि देश के बहुत से हिस्सों में ऐसा होता है कि बीमार को, सड़कों पर जख्मी पड़े लोगों को अस्पताल पहुंचाने में लोग नहीं मिलते। कई जगह के सड़कों के कैमरे बताते हैं कि कैसे जख्मी के पड़े-पड़े बगल से दर्जनों गाडिय़ां निकल गईं, और लोग रूके नहीं। किसी भी जगह सरकार अकेले सारा इंतजाम नहीं कर सकती। और समाज की अपनी एक जिम्मेदारी भी होती है, क्योंकि समाज के लोग सरकार से अपने अधिकारों की मांग भी करते हैं, और उम्मीद भी रखते हैं। जब सरकार से हक चाहिए, तो वे बिना किसी जिम्मेदारी के नहीं मिल सकते। इसलिए सरकारी एम्बुलेंस आ रही है तब तो ठीक है, लेकिन अगर सरकारी एम्बुलेंस नहीं पहुंच रही है, तो हर नागरिक की यह कानूनी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे जख्मी को अस्पताल पहुंचाएं। भारत के कानून में भी जंगल की आग को बुझाना हर नागरिक की कानूनी जिम्मेदारी तय की गई है, और कानून के मुताबिक जंगल कर्मचारी लोगों को इसके लिए शायद बेबस भी कर सकते हैं। हमारा यह मानना है कि जख्मी को छोड़कर आगे निकलने वाले लोगों पर एक बड़े जुर्माने और उनका ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित करने का एक कानून बनना चाहिए। किसी भी लोकतंत्र और सभ्य समाज में ऐसे लोग बिना जुर्माने नहीं रहने चाहिए।
छत्तीसगढ़ में यह देखा हुआ है कि सरकारी एम्बुलेंस सेवा ने धीरे-धीरे काफी फर्क दिखाया है। अब जख्मी या बीमार के लिए अधिकतर मामलों में गाडिय़ां समय पर पहुंच जाती हैं। लेकिन एम्बुलेंस से जुड़ा हुआ ही मामला इलाज का भी है। सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पतालों, दोनों ही जगहों पर पहुंचने वाले जख्मी और बीमार के साथ तरह-तरह की बदसलूकी बहुत ही आम बात है। और यह जाहिर है कि बीमार या जख्मी के साथ पहुंचने वाले लोग भी मानसिक यातना से गुजरते हुए परेशान लोग रहते हैं, और ऐसे में एक गर्भवती को अस्पताल से भगा दिया जाए, जैसा कि कोरबा में दो दिन पहले हुआ है, तो उसके बाद लोग अस्पतालों में मारपीट न करें तो क्या करें? और छत्तीसगढ़ में अस्पतालों में तोडफ़ोड़ या मारपीट करने के खिलाफ एक बड़ा कड़ा कानून भी बनाया हुआ है, इसे कहते हैं कि जबरा मारे भी और रोने भी न दे।
सरकार को अपने और निजी क्षेत्र के अस्पतालों के तौर-तरीकों में सुधार लाने के लिए स्वास्थ्य विभाग से परे के लोगों को भी लगाना चाहिए, जो कि बाहरी निरीक्षकों की तरह वहां जाकर निगरानी रख सकें। इसके लिए जरूरत हो तो आसपास के महिला मंडलों, रिटायर्ड बुजुर्ग लोगों को भी अधिकृत निरीक्षक का एक अवैतनिक दर्जा दिया जा सकता है, और उनकी रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है। किसी भी देश-प्रदेश का विकास वहां पर कांक्रीट के निर्माण से तय नहीं होता, वह इससे तय होता है कि वहां सरकार सबसे कमजोर, सबसे गरीब, सबसे जरूरतमंद के अधिकारों की कितनी गारंटी कर सकती है। इस बारे में राज्य सरकारों को तुरंत सोचकर सामाजिक तबकों के साथ मिलकर योजना बनानी चाहिए, और समाज को भी हाथ बंटाने के लिए कहना चाहिए।

अमिताभ का दिमाग सचमुच खाली है...

संपादकीय
20 सितंबर 2016
महिला अधिकारों पर बनी हुई एक फिल्म के प्रमोशन के दौरान अमिताभ बच्चन कभी अपनी नातिन और पोती को खुली चिट्ठी लिखकर परोक्ष रूप से अपनी आने वाली फिल्म का प्रचार करते हैं, तो कभी टीवी चैनलों पर जाकर प्रत्यक्ष रूप से फिल्म को बढ़ावा देते हैं। अब अभी अमिताभ ने कहा कि कुछ मामलों में महिलाएं भी उन कानूनों का गलत इस्तेमाल करती हैं जो उनकी हिफाजत के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि कई ऐसे मामले होते हैं जहां महिलाएं उन कानूनों का बेजा इस्तेमाल करती हैं जो बलात्कारियों या छेडख़ानी करने वालों की सजा के लिए बने हैं। उन्होंने कहा कि उनके कई दोस्तों ने भी उन्हें बताया है कि उन्हें किस तरह ऐसे बेजा इस्तेमाल का सामना करना पड़ा।
अभी दो दिन पहले ही बड़बोले जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अमिताभ के बारे में कहा था कि उनका दिमाग खाली है। और आज बेमौके की ऐसी बात को करते हुए लगता है कि सचमुच ही अमिताभ का दिमाग खाली है। उनका दिल खाली है यह बात तो हम बरसों से लिखते आ रहे हैं क्योंकि अपनी ससुराल के शहर भोपाल में चौथाई सदी पहले जो यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी हुई थी, उसकी हजारों मौतों, और लाखों मुश्किल जिंदगियों के लिए अमिताभ बच्चन ने न कभी कुछ किया, न ही मुंह खोला। जबकि वे बीच के कुछ बरसों में राजनीति में भी आ चुके थे, और उनकी एक सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बनती थी। इसके बाद उत्तरप्रदेश से लेकर गुजरात तक बहुत से ऐसे सार्वजनिक मामले रहे जिनमें सरकारें कटघरों में खड़ी रहीं, लेकिन अमिताभ इन प्रदेशों के ब्रांड एम्बेसडर बने हुए इनका प्रचार करते रहे, यहां के जख्मी लोगों के बारे में उनका मुंह नहीं खुला। आज जब एक फिल्म के प्रचार के लिए वे आयोजित और प्रायोजित कार्यक्रमों में बोल रहे हैं, तब भी उन्होंने महिला रक्षा कानूनों के बेजा इस्तेमाल का एक ऐसा मुद्दा छेड़ा है जो कि अपवाद की तरह होता है। जब हजारों महिलाएं जुल्म का शिकार हो चुकी रहती हैं, तो शायद कोई दो-चार महिलाएं ऐसे कानून का बेजा इस्तेमाल करती होंगी, और उसे इस तरह से गिनाने का मतलब देश की महिलाओं की बदहाली को कम करके दिखाना है। महिला को ऐसे मौके पर एक साजिश में भागीदार बताकर अमिताभ बच्चन खुद भी महिला पर ज्यादती के कुसूरवार बने हैं।
यह बात सही है जो जस्टिस काटजू ने कही है कि एक वक्त राजा अपनी प्रजा को मुगालते में रखने के लिए, झांसे में रखने के लिए और बेचैनी से दूर रखने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते थे। अब आज के वक्त में भारत जैसे लोकतंत्र में लोग अपनी तकलीफों को भूल जाएं, इसके लिए फिल्म, क्रिकेट, टीवी सीरियल, और सेक्स स्कैंडलों का इस्तेमाल किया जाता है। देश की जनता आधे पेट खाकर पूरे-पूरे घंटे के टीवी सीरियल देख लेती है, अखबारों में फिल्म अभिनेत्रियों के उघड़े हुए बदन और उनके सेक्स संबंधों को पढ़ लेती है, और टीवी के कई-कई चैनलों पर दिन-दिन भर क्रिकेट भी देख लेती है। अमिताभ बच्चन एक ऐसे ही कारोबार का हिस्सा हैं जो कि अफीम की तरह समाज को एक झांसे में रखता है, उसे हकीकत का एहसास नहीं होने देता। जो आदमी अपने परिवार की निजी जिंदगी के लिए लोगों पर नाराज भी हो जाता है, वही आदमी अपनी एक फिल्म के प्रमोशन के लिए अपनी नातिन और अपनी पोती को लिखी गई निजी चिट्ठी को वीडियो कैमरों के सामने सार्वजनिक भी करता है। इससे जस्टिस काटजू की बात सही साबित होती है कि अमिताभ खाली दिमाग वाले इंसान हैं, कम से कम सामाजिक सरोकारों के लिए। हमने उनका दिल तो पहले ही खाली पाया है, और उनकी जेब कितनी भरी हुई है, यह सभी लोग जानते हैं। इसलिए ऐसे कारोबारी को जब राष्ट्रपति बनाने की चर्चा होती है, तो लगता है कि पहले ये सार्वजनिक सवाल किए जाने चाहिए कि देश के जलते-सुलगते मुद्दों पर इतनी पहाड़ सी जिंदगी में अमिताभ बच्चन ने कब मुंह खोला, और क्या कहा, क्या किया?

अपने पुराने जुमलों को भूलकर पाक पर ठंडे दिल से सोचा जाए

संपादकीय
19 सितंबर 2016
कश्मीर में भारतीय सेना पर आतंकी हमले में अब तक 20 लोगों की शहादत की खबर आ चुकी है और दिल्ली में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बैठकें चल रही हैं। पहली नजर में इस हमले के पीछे सरहद पार पाकिस्तान की जमीन से आए हुए हमलावरों का हाथ दिखता है, और इसके पीछे पाकिस्तान की सरकार है, वहां की फौज है, या कि वहां के आतंकी संगठन हैं, यह अभी साफ नहीं हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच इस बात को लेकर एक लंबा मतभेद चलते रहता है कि मुंबई हमलों से लेकर पठानकोट के हमलों तक, और अब कश्मीर के उरी में हुए इस ताजा हमले तक के पीछे पाकिस्तान का सरकारी हाथ है, या कि वहां की जमीन से काम करने वाले और गैर-स्टेट कहलाने वाले कुछ और संगठनों का हाथ है। सवाल यह है कि जब किसी एक देश की जमीन से पड़ोस की जमीन पर लगातार ऐसे हमले होते हैं, तो वह जख्मी देश क्या करे?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए विपक्ष में रहते हुए ऐसी नौबत से जूझना अधिक आसान था। उन्होंने अनगिनत बार एक के बदले दस सिर काटकर लाने की घोषणा की थी, और उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ऐसे हमलों के बारे में देश की जनता को यकीन दिलाया था कि मोदी प्रधानमंत्री रहेंगे तो भारत ऐसे हमलों के जवाब में पाकिस्तान में घुसकर हिन्दुस्तानी झंडा फहराकर आएगा। ऐसी बहुत सी बातें युद्धोन्माद के चलते होती हैं, और किसी सरकार के खिलाफ चुनाव में जनभावनाओं को भड़काने के लिए भी की जाती हैं। हम ऐसे मौके पर मोदी सरकार को उनके विपक्ष-कॉल के नारों की याद दिलाकर उकसाना नहीं चाहते हैं क्योंकि बहुत से मामलों में यह सरकार बार-बार यह भी बोल रही है कि उसकी कही बातें महज जुमला थीं, और उनका कोई खास मतलब नहीं था। ऐसे जुमले की तरह पाकिस्तान के खिलाफ कही गईं हमलावर बातें याद दिलाने का यह मौका इसलिए नहीं है कि लोकतंत्र में जब विपक्ष सत्ता में आता है, तो सत्ता की जिम्मेदारियों से उसके तेवर बदल जाते हैं, और बदल भी जाने चाहिए।
आज भारत में आम जनता के बीच यह सोच अपने आप भी हो सकती है, और लोग भड़काकर ऐसी सोच को बढ़ाना भी चाह सकते हैं कि भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए। यह बात अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों को देखते हुए तर्कसंगत और न्यायसंगत भी लग सकती है क्योंकि अमरीका जैसे देश अपने पर हुए आतंकी हमले के जवाब में दुनिया के बेकसूर देशों को भी तबाह करते हुए संयुक्त राष्ट्र की बात भी अनसुनी करते रहे। भारत भी पाकिस्तान की जमीन पर चल रहे आतंक के ट्रेनिंग कैम्प तबाह करने के लिए एक हमला करने का हक इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन ऐसा करने के पहले यह भी याद रखना पड़ेगा कि 20 मौतों के ऐसे बदले लेते हुए हो सकता है कि 20 हजार और लोगों की मौत की नौबत आ जाए। और ये मौतें सरहद के एक तरफ हों, ऐसा भी नहीं है, वे दोनों तरफ हो सकती हैं, होगी, और किसी भी जंग को एक आखिरी रास्ता ही मानना चाहिए।
भारत में पिछले कुछ बरसों में अमरीका के साथ अपना जिस तरह का घरोबा बढ़ाया है, उसके चलते आज उसे एक ऐसी नौबत हासिल है कि वह अमरीका पर जोर डालकर पाकिस्तान को मिलने वाली मदद को घटवाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि जो बात हम कह रहे हैं वह उतनी आसान इसलिए नहीं है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमरीका को यह भी देखना होगा कि पाकिस्तान की मदद से अगर उसने हाथ खींचा, तो पाकिस्तान चीन की गोद में ही पहुंच जाएगा। लेकिन आज भारत के सामने कई किस्म की दुविधाएं हैं। पाकिस्तान के साथ अमरीका और चीन के अलग-अलग रिश्तों को अनदेखा करके भारत अपनी आबादी के युद्धोन्मादी हिस्से को खुश करने के लिए हमले के विकल्प को आसानी से नहीं चुन सकता। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है और वहां की फौज सरकार के काबू के बाहर है, खुद सरकार लाचार है, और सरकार-फौज का कुछ हिस्सा आतंकियों का मददगार है। ऐसे में वहां के परमाणु हथियारों को देखते हुए किसी भी तरह की जंग में कैसे खतरे हो सकते हैं, यह समझना बहुत आसान नहीं है। इसलिए भारत को ऐसे मौके पर अपने ही पुराने नारों और जुमलों को अनदेखा करते हुए इस पूरे इलाके की भलाई के लिए फैसला लेना होगा, और हमारा ख्याल है कि वह युद्ध से परे का ही रहना चाहिए। जब तक बिना जंग के नौबत सुधर सकती है, या काबू में आ सकती है, तब तक जंग की बात नहीं करनी चाहिए। सरहद के दोनों तरफ फौजी विकल्प पर अपार भरोसा करने वाले जंगखोर लोग हैं, और उनके लिए ऐसा कोई भी हमला एक नया जोश लेकर आता है।
लेकिन इस मौके पर पाकिस्तान को यह समझने की जरूरत है कि भारत के साथ उसकी जमीन से इस तरह के हमले पाकिस्तान का कोई भला नहीं करने वाले। किसी जंग की नौबत लाने में हथियारों के कारखानेदारों की बड़ी दिलचस्पी हो सकती है, और दोनों देशों में मीडिया से लेकर राजनीति तक, और रिटायर्ड फौजियों से लेकर आतंकियों तक कई बड़बोले बकवासी ऐसे हथियार-कारखानों से महीना भी पाते हो सकते हैं। इसलिए ऐसा कोई हमला भाड़े के हमलावर भी कर सकते हैं, और इसे सोचते हुए भी फैसला लेना चाहिए। फिलहाल भारत बहुत ही विचलित है, और भड़की हुई जनभावनाओं को देखते हुए भारत कोई असंतुलित फैसला भी ले सकता है।

बिना तालमेल का लोकतंत्र मुर्दा विपक्ष से फिर भी बेहतर

संपादकीय
18 सितंबर 2016
चुनाव के दो-ढाई बरस पहले छत्तीसगढ़ एक बहुत ही सक्रिय, तेज रफ्तार, और संवेदनशील राजनीति देख रहा है। कांग्रेस से अलग होने के बाद अजीत जोगी और उनके बेटे अमित जोगी को अपनी हाईवोल्टेज राजनीति को और तेज करने की एक मजबूरी है, और दूसरी तरफ जोगीमुक्त कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने की चुनौती पर खरा उतरने का बोझ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल पर है। नतीजा यह है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार के हर काम को लेकर, हर फैसले को लेकर, राज्य की हर बड़ी घटना को लेकर इन दोनों पार्टियों के बीच अपना वजूद साबित करने का जो अंतहीन मुकाबला चल रहा है, उसने राज्य की जिंदगी को बुरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
हम लोकतंत्र में ऐसी सक्रियता के खिलाफ भी नहीं हैं, और एक मुर्दा और बेअसर विपक्ष के मुकाबले ओवरटाईम करता हुआ विपक्ष बेहतर होता है, लेकिन प्रदेश की जिंदगी पर इसके कुछ दूसरे असर भी देखने मिल रहे हैं। किसी घटना के मौके पर, उसके पहले या उसके बाद, स्थानीय प्रशासन और पुलिस के जिम्मे कई किस्म की बातें आती हैं, और उस इंतजाम के बीच आज जिस तरह से इन दोनों पार्टियों के विरोध-प्रदर्शन को भी झेलना पड़ रहा है, वह पुलिस और प्रशासन के रोजमर्रा के काम को पीछे छोड़ देगा। एक अतिसक्रिय विपक्ष की वजह से सरकारी अमला अधिक चौकन्ना होने पर मजबूर तो होता है, लेकिन आम जनता की पुलिस में जो शिकायतें दर्ज रहती हैं, प्रशासन के पास जो मामले पड़े रहते हैं, वे ऐसे विरोध-प्रदर्शन के चलते हुए और पीछे छूट जाते हैं।
ऐसे में प्रदेश की डॉ. रमन सिंह सरकार पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि इन दो विपक्षों को वे कम से कम मौके दें। भारतीय जनता पार्टी को भी बहुत चौकन्ना होकर सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए अपने लोगों के बर्ताव, उनकी जुबान, उनके फैसलों, और उनकी जनछवि के बारे में सोचना होगा कि एक-एक गलत हरकत, एक-एक गलत बात का चुनाव के वक्त किस तरह का भारी चुकारा करना पड़ सकता है। वैसे तो यह बात सारी ही राजनीतिक पार्टियों पर लागू होती है, लेकिन प्रदेश में चूंकि भाजपा तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद चुनाव में जाएगी, इसलिए यह जाहिर है कि उसके मंत्री, विधायक, और दूसरे सत्तारूढ़ नेताओं की गलत हरकतें भी सामने अधिक रहेंगी, और बड़ा चुनावी मुद्दा भी बनेंगी। वैसे अतिसक्रिय विपक्ष के चलते भाजपा सरकार और उसके प्रशासन को एक मौका भी मिल रहा है कि कमर कसकर काम को सुधारे, और चुनाव के पहले के ये दो-ढाई बरस अगर सरकार-भाजपा ने अपना घर सुधारने में लगाए, तो चुनाव के वक्त उस पर मुसीबत कम रहेगी।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी देश में कांग्रेस पार्टी की बदहाली से दूर, अधिक संभावनाओं वाली है, और देश में शायद ही किसी दूसरे राज्य में कांग्रेस इतनी सक्रिय है। लगातार सत्ता से बाहर रहने के बारह से अधिक बरस के बनवास के बावजूद पार्टी आज दमखम के साथ डटी हुई है, यह एक बड़ी बात है। और जोगीमुक्त होने के बाद कांग्रेस अब एक संगठन के रूप में अधिक संभावनाओं और अधिक चुनौती दोनों के साथ काम कर रही है। अब अपनी हार के लिए न तो उसे जोगी का डर रहेगा, और न ही हार के लिए तोहमत लगाने को जोगी हासिल ही रहेंगे। ऐसे राजनीतिक माहौल में यह प्रदेश एक ऐसे लोकतांत्रिक टकराव के अगले दो-ढाई बरस देखने जा रहा है जिसमें ये तीनों ही पक्ष एक-दूसरे से किसी भी तालमेल के बिना महज टकराव से राजनीति करने वाले हैं। बिना तालमेल का लोकतंत्र नुकसानदेह होता है, लेकिन वह मुर्दा विपक्ष से फिर भी बेहतर होता है।

छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के सिंगूर-फैसले की बातों को लागू करके देखने की जरूरत

संपादकीय
17 सितंबर 2016
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा के कारखाने के लिए वामपंथी सरकार द्वारा कई बरस पहले किए गए जमीन अधिग्रहण को गलत ठहराते हुए उसे किसानों को वापिस दे देने का हुक्म दिया है, और चूंकि बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी यही मांग कर भी रही थीं, उन्होंने भूस्वामियों को जमीन लौटाना शुरू कर दिया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या देश के बाकी प्रदेशों में कारखानों के लिए सरकार ने जो जमीनें ली हैं, उनमें यह फैसला लागू होता है, तो क्या वे राज्य खुद होकर इस फैसले की भावना के मुताबिक जमीन लौटाना शुरू करेंगे, या फिर किसी को एक जनहित याचिका लेकर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगानी पड़ेगी? यह बात हम बस्तर में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा टाटा के कारखाने के लिए ली गई जमीन के सिलसिले में कह रहे हैं, और अब टाटा ने भी वहां कारखाना लगाने से खुद होकर मना कर दिया है, इसलिए उस जमीन को लेने का जाहिर मकसद तो खत्म हो चुका है।
किसी एक मिसाल को जब दूसरे मामले पर दिया जाता है, तो दोनों मामलों में फर्क को गिनाना बड़ा आसान हो जाता है। छत्तीसगढ़ में भी सरकार सिंगूर के मामले से बस्तर के मामले को कई मायनों में अलग साबित कर सकती है, लेकिन हमारा यह मानना है कि देश के आदिवासी समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं, बहुत से राजनीतिक दलों की यह मांग चली भी आ रही थी कि आदिवासियों को उजाड़कर, खेतों को खत्म करके कारखाने न लगाए जाएं, और वह मांग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राहत पाती है। इसलिए सरकार को खुद होकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के शब्दों और उसकी भावना को देखते हुए छत्तीसगढ़ के बस्तर की इस जमीन के बारे में फैसला लेना चाहिए जो कि टाटा के कारखाने के लिए सरकार ने लोगों की बांह मरोड़कर हासिल की थी।
इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ में दर्जनों ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें अलग-अलग कारखानेदारों ने आदिवासियों की जमीन को हासिल करने के लिए कानून की आंखों में मिर्च झोंकते हुए अपने गरीब-आदिवासी के नाम से करोड़ों की जमीनों की खरीददारी कर ली, और उस जमीन को कारखाने की जमीन बताते हुए पर्यावरण मंजूरी से लेकर बाकी कई किस्म की मंजूरियां हासिल कर लीं। ऐसे कई मामलों में जिला प्रशासन के सामने जालसाजी स्थापित भी हो चुकी है, लेकिन अभी हम ऐसे किसी कारखानेदार को न तो किसी आदिवासी कानून के तहत गिरफ्तार होते देख रहे हैं, और न ही केन्द्र सरकार के कोई टैक्स विभाग यह छानबीन करते दिख रहे कि गरीब-आदिवासी कर्मचारी के नाम पर इन कंपनियों ने दसियों करोड़ का यह फर्जीवाड़ा कैसे किया?
छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी राज्य के लिए राज्यपाल को भी न सिर्फ विशेष अधिकार दिए गए हैं, बल्कि उन पर विशेष जिम्मेदारी भी डाली गई है। हमने पिछले कई राज्यपाल देख लिए, उनमें से किसी ने भी आदिवासियों के साथ सरकार या कारोबार द्वारा की गई ऐसी किसी ज्यादती के मामले में कोई दखल नहीं दी, बल्कि किसी भी राज्यपाल ने संविधान में की गई इस विशेष व्यवस्था का इस्तेमाल भी नहीं किया। राजभवन अगर हाथ पर हाथ धरे आदिवासियों के हक छिनते हुए देखता रहे, तो संविधान में राज्यपाल की ऐसी अनदेखी के खिलाफ कोई प्रावधान भी नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि देश-प्रदेश का लोकतांत्रिक इतिहास राज्यपालों की सक्रियता या निष्क्रियता को अच्छी तरह दर्ज करते चलता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भ्रष्टाचार, धांधली, और सरकारी जुल्म-जबर्दस्ती के बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें राज्यपाल को दखल देना ही चाहिए था, लेकिन राजभवन महज समारोहों और जलसों का दरबार हाल बनकर रह जाए, तो आदिवासी का बदहाल तो तय है ही।
छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले दिनों एक फैसला लेकर राजधानी की एक विवादास्पद कमल विहार-2 योजना को ताक पर धर दिया है। वैसे तो उसे खारिज ही कर दिया गया है, लेकिन सरकार की बहुत से लोगों को सार्वजनिक असुविधा से बचाने के लिए अभी उसे रोका गया बताया जा रहा है। यह फैसला कमल विहार-1 योजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आए एक बहुत ही लंबे और ऐतिहासिक फैसले के बाद लिया गया। किसी भी समझदार और संवेदनशील सरकार को किसी एक फैसले को लेकर कई तरह के सबक खुद भी लेना चाहिए। सरकारी पैसों से वकील लगाकर वैसे तो कोई सरकार अपने पूरे कार्यकाल तक किसी मामले को लड़ सकती है लेकिन आगे चलकर जब सरकार की किसी नीति या निर्णय के खिलाफ बड़ा फैसला आता है, तो वह उन नेताओं और अफसरों की साख को भी चौपट करता है। छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के सिंगूर-फैसले की बातों को लागू करके देखने की जरूरत है। 

अपने राज्य से गैरहाजिर गैरजिम्मेदार सरकार...

संपादकीय
16 सितंबर 2016
दिल्ली की सरकार अपने आपको एक मजाक बनाकर वहां के वोटरों को निराश कर रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू करके अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह आम आदमी पार्टी बनाई, और दिल्ली की परंपरागत दोनों पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा को शिकस्त दी, उसके बाद दिल्ली की राजनीति में एक नई ताजगी की उम्मीद की जा रही थी। और केजरीवाल ने कई तरह की नई उम्मीदें बंधाते हुए राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बड़े ऊंचे पैमाने घोषित भी किए। नतीजा यह हुआ कि जब उनके विधायक एक-एक करके किसी जुर्म में फंसने लगे, उनके मंत्री गलत काम करते पकड़ाने लगे, तो लोगों का मोहभंग होने लगा। फिर उन्होंने केन्द्र सरकार के साथ एक स्थायी टकराव शुरू किया और जारी रखा कि दिल्ली के उपराज्यपाल के अधिकार क्या हैं, और मुख्यमंत्री के अधिकार क्या हैं।
हम इस बात को बुरा नहीं मानते कि एक मुख्यमंत्री दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करे, और निर्वाचित सरकार को अधिक हक देने की मांग करे। इसलिए उस टकराव को भी हम बहुत बुरा नहीं मानते। लेकिन आज दिल्ली की जो हालत है, उसमें केजरीवाल और उनकी पार्टी, उनके मंत्री बहुत ही परले दर्जे के गैरजिम्मेदार साबित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री खुद कर्नाटक में ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों के लिए काम से बाहर हैं, और उनके उपमुख्यमंत्री सहित बाकी कई मंत्री अलग-अलग वजहों से अलग-अलग प्रदेशों में हैं, एक शायद हज करने को देश के बाहर हैं। एक मंत्री बिना किसी इमरजेंसी के छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं, और दिल्ली में चिकनगुनिया और डेंगू से लोग मारे जा रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जनता के बीच जिंदगी की ऐसी मुसीबत के चलते हुए अगर केजरीवाल के मंत्री वहां नहीं हैं, और हर बात के लिए केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल को कोसना जारी है, तो यह दिल्ली की जनता के चुने हुए एक विकल्प की आत्महत्या भी है। केजरीवाल दिल्ली में गैरजिम्मेदारी दिखाकर पंजाब में चुनाव नहीं जीत सकते। पंजाब में बादल कुनबे ने जो बदहाली कर रखी है, उसे देखते हुए वहां की जनता एक नया विकल्प छांट भी सकती थी, लेकिन वह विकल्प ऐसा तो नहीं हो सकता जो कि दिल्ली में गैरजिम्मेदारी दिखाए, मुसीबत के वक्त गायब रहे, और पंजाब में बड़े-बड़े वायदे करे। आज पंजाब और दिल्ली अगल-बगल बसे हुए मीडिया से जुड़े हुए ऐसे राज्य हैं जहां कि दसियों लाख लोगों की रिश्तेदारियां भी हैं। इसलिए केजरीवाल न सिर्फ अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि इस देश में कांग्रेस-भाजपा से परे की एक वैकल्पिक राजनीतिक-संभावना को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। पिछले इन बरसों में केजरीवाल ने सरकार चलाने के साथ-साथ ऐसी भयानक बकवास भी की है, और ऐसी बड़ी-बड़ी गलतियां की हैं, जिनमें से किसी की भी जरूरत नहीं थी, ये सारे के सारे गलत काम अवांछित थे, और ये किसी तजुर्बे की कमी से नहीं हुए थे, ये चुनावी कामयाबी से पैदा अहंकार से उपजे थे, और केजरीवाल इसका लंबा दाम भी चुकाएंगे। फिलहाल आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल कोई सबक लेते नहीं दिख रहे हैं, और यह देश के लोकतंत्र का भी एक नुकसान है।
फिलहाल इसी बहाने दिल्ली को पूर्ण राज्य देने के दर्जे पर भी बात होनी चाहिए, और हम इस कुतर्क को मानने से इंकार करते हैं कि दुनिया के किसी देश में राजधानी की पुलिस स्थानीय सरकार के हाथ में नहीं रहती, और केन्द्र सरकार के हाथ में रहती है। हमको भारत की राजधानी और भारत की संघीय व्यवस्था को देखते हुए यह बात साफ समझ आती है कि यहां तो किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है, और आज चाहे दिल्ली पर जिस पार्टी का राज हो, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर राजधानी-राज्य की सरकार और देश की सरकार के बीच का टकराव खत्म हो, और निर्वाचित सरकार अपना राज्य चला सके।

भारत के चीन से पीछे रहने में मच्छर और नेता दोनों का हाथ

संपादकीय
15 सितंबर 2016
भारत और चीन की अर्थव्यवस्था और इन दोनों देशों के भविष्य को लेकर कई तरह की तुलना होती है। लेकिन पिछले दिनों भारत की यात्रा पर आए सिंगापुर के उपप्रधानमंत्री ने भारत की पूरी केन्द्र सरकार की मौजूदगी में इस देश की जिन कमियों को गिनाया, उनमें एक यह भी था कि चीन सहित भारत के पड़ोसी देश मलेरिया पर काबू पा चुके हैं, यहां तक कि श्रीलंका भी इससे आजाद हो चुका है लेकिन भारत इससे जूझ रहा है और ऐसी नौबत इस देश की तरक्की में आड़े आ सकती है। उन्होंने और भी बहुत सी बातें कही, जिनमें भारत के सामाजिक ढांचे पर कम खर्च करना और उसे उपेक्षित रखना भी शामिल है। अब दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ के भिलाई तक की खबरें हैं कि डेंगू और चिकनगुनिया से मौतें हो रही हैं। छत्तीसगढ़ में तो बस्तर में खतरे के बीच तैनात राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान भी मलेरिया में मारे जा रहे हैं, और गरीबों की बहुत सी मौत तो मलेरिया के नाम के साथ दर्ज भी नहीं हो पाती है।
लेकिन एक तरफ तो छत्तीसगढ़, या देश के ऐसे बहुत से प्रदेश और शहर काफी महंगी और खर्चीली शहरी विकास योजनाओं को देख रहे हैं, और दूसरी तरफ इतने खर्च के बावजूद जब इन जगहों पर गंदगी इतनी अधिक रहती है, मच्छर इतने अधिक रहते हैं, तो मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियां सरकार के लिए एक चुनौती बनी रहती हैं, और लोगों की जिंदगियां ले जाती हैं। जो लोग भी यह मानकर चलते हैं कि शहरों का गौरव बढ़ाने के लिए चौड़ी सड़कें और फ्लाईओवर जैसे महंगे खर्च काफी हैं, उन्हें सबसे पहले इंसान की सफाई की बुनियादी जरूरत के बारे में सोचना चाहिए कि कांक्रीट के ऊपर गंदगी और अधिक गंदी दिखती है। देश हो, प्रदेश हो, या शहर और गांव हो, योजनाओं पर खर्च में यह ध्यान रखना चाहिए कि नेता, अफसर, ठेकेदार के पसंदीदा कांक्रीट के साथ-साथ सफाई की बुनियादी जरूरत भी पूरी कर ली जाए।
दुनिया का अंदाज यह है कि आने वाले वक्त में मलेरिया एक और जानलेवा बीमारी के रूप में आगे बढ़ सकता है, और मच्छरों का सीधा रिश्ता गंदगी से है, जिसे कि काबू में किया जा सकता है। भारत के सभी हिस्सों को यह भी सोचना चाहिए कि सरकार के जिम्मे ही सफाई का काम भी रहता है, और सरकार के जिम्मे ही गरीबों के इलाज का काम भी रहता है। अगर गंदगी को घटाया जाएगा, तो सरकार का इलाज का खर्च सीधे-सीधे घट जाएगा। लेकिन चूंकि सत्ता पर बैठा ताकतवर तबका और समाज का संपन्न तबका, अपने बंद घरों के भीतर मच्छरों के बिना रहते हुए अपने को बड़ा महफूज समझता है, इसलिए गरीबी के साथ जुड़े रहने वाली गंदगी से उपजी बीमारियों को लेकर सरकार से लेकर मीडिया तक में एक बेफिक्री रहती है। अब जनता की बहुत सी दिक्कतों को लेकर जिस तरह जनहित याचिकाएं लेकर लोग अलग-अलग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं, तो क्या मलेरिया से बचने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा? सफाई करवाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा? और गंदगी से दूर रहने वाले जजों को क्या इसकी अधिक फिक्र होगी? भारतीय लोकतंत्र में वर्गहित और वर्गचिंता से जुड़े हुए ऐसे बहुत से सवाल हैं।
भारत दुनिया के उन देशों में से है जहां अब तक कुष्ठ रोग बाकी है। और यह बीमारी भी गरीबों तक सीमित है, इसलिए सरकार को इसकी एक सीमित फिक्र है। हमारा यह भी सोचना है कि जिस तरह देश की संसद, लोकसभा और राज्यसभा दोनों, और राज्यों की विधानसभाओं से लेकर म्युनिसिपलों तक निर्वाचित और मनोनीत लोगों में करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं, उससे भी गरीबों की फिक्र खत्म होती जा रही है। आज बड़े शहरों के छोटे-छोटे वार्डों में पार्षद बनने के लिए करोड़ों रूपए भी खर्च करते हुए लोग दिखते हैं। उनसे भला यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे गरीबों की फिक्र करेंगे? और सरकारें यह भी नहीं समझ पा रही हैं कि गरीबों की बदहाली के साथ किसी देश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। और आने वाले दशकों में भारत चीन से जिन वजहों से पीछे रहेगा, उसमें मच्छरों का भी योगदान रहेगा, और भारत के नेताओं का भी। इन दोनों में से अधिक योगदान किसका रहेगा, यह अंदाज लगाना नामुमकिन होगा।

कुनबापरस्त-लोकतंत्र से लदी पार्टियों वाला भारत

संपादकीय
14 सितंबर 2016
उत्तर भारत और हिंदी इलाकों की खबरें उत्तरप्रदेश पर काबिज मुलायक कुनबे के भीतरी झगड़ों से भरी हुई हैं। सतह पर जो तैर रहा है उससे लगता है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्री बेटे से कुछ खफा चल रहे हैं। और इस नौजवान मुख्यमंत्री का अपने चाचा, उसकी सरकार के मंत्री से तनातनी चल रही है, और चाचा के कुछ विभाग भतीजे ने छीन लिए हैं। दूसरी तरफ चाचा के पसंदीदा मुख्य सचिव को भतीजे ने हटा दिया है, और अभी इन सब पर नेताजी, यानी मुलायम सिंह यादव का फैसला और फतवा आना बाकी है।
यह कुनबा भारतीय लोकतंत्र के भीतर के बड़े अजीब अलोकतांत्रिक विरोधाभासों का एक प्रतीक है। यह कहने के लिए समाजवादी पार्टी कहलाता है, लेकिन इसका समाजवाद से शायद कोई संबंध नहीं रह गया है। दूसरी तरफ इस कुनबे की रिश्तेदारी बगल के बिहार के ऐसे ही दूसरे कुनबे से हो गई है, और लालू यादव भी अपनी पार्टी को निजी भैंस की तरह हांकते हैं, और वे भी लोहिया और समाजवाद का नाम लेकर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाते हैं। भारत की राजनीति में एक समय कांग्रेस के परिवारवाद के खिलाफ जो समाजवादी राम मनोहर लोहिया खड़े होते थे, उनके खड़ाऊ उठाकर नेता बने हुए बहुत से लोग आज अपने परिवारवाद को ढो भी रहे हैं, और समाजवाद उनको ढो रहा है। लेकिन समाजवाद से परे भी मालिकाना हक वाली बहुत सी पार्टियां इस देश में हैं। उधर ऊपर कश्मीर से शुरू करें तो पिछले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तीसरी पीढ़ी के लगातार मुख्यमंत्री रहे, और राज्य की राजनीति में अब उनका जिन महबूबा मुफ्ती से मुकाबला है, वह खुद दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं। थोड़ा नीचे उतरें तो पंजाब कुनबापरस्ती या नशा, इनमें से किससे अधिक लदा हुआ है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। फिर पड़ोस के हरियाणा में तो दोनों-तीनों पार्टियां दो-तीन पीढिय़ों से कुनबापरस्ती को ढो रही हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार का हाल हम गिना ही चुके हैं।
ऐसी ही कुनबापरस्ती कुछ और राज्यों में भी है, लेकिन उनसे भी आगे बढ़कर एक अकेले नेता की सनक पर चलने वाली पार्टियां भी कम नहीं हैं। कई पार्टियों में नेताओं की अगली पीढ़ी अभी हावी नहीं हो पाई है, या है नहीं, और ऐसे में उनकी अपनी मर्जी ही पार्टी की रीति-नीति होती है। इसकी एक बड़ी मिसाल मायावती हैं जो कि बसपा बनाने वाले कांशीराम की सबसे करीबी रहीं, और उनके जाने के बाद अब विरासत की वसीयत में उन्हें पार्टी का मालिकाना हक मिला है। इस पार्टी में मायावती से परे किसी और का नाम भी नहीं है, और वे अकेले ही पार्टी हैं। ऐसा ही हाल बंगाल में ममता बैनर्जी का है, जो कि एक तानाशाह के अंदाज में अपने राज्य के साथ-साथ अपनी पार्टी भी अकेले ही चलाती हैं। उधर दक्षिण में जयललिता को देखें तो वे अपनी पार्टी के नेता एम जी रामचंद्रन की सबसे करीबी रहीं, और उनके गुजरने के बाद उनकी पत्नी तो कहीं टिक नहीं पाईं, और जयललिता ने ही विरासत संभाली। आज उनकी पार्टी और उनका प्रदेश यूगांडा के तानाशाह ईदी अमीन के इतिहास की तरह का वर्तमान है, और भारतीय लोकतंत्र के भीतर वे अलोकतांत्रिक मिसालों में सबसे ऊपर के दो-चार लोगों में हैं। आंध्र में एन टी रामाराव के गुजरने के बाद उनके दामाद चंद्राबाबू नायडू उनकी राजनीति के हकदार बने, और उनके तेवर चाहे अधिक तानाशाह न हों लेकिन उनके बेटे ने भी अब राजनीति में आकर पिता की पार्टी को संभालना शुरू कर दिया है। आज जो राजनीतिक इतिहास नहीं रह गया है, उस इतिहास को देखें तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाके में कांग्रेस की राजनीति हालांकि राष्ट्रीय पार्टी के मातहत रही, लेकिन इन इलाकों में रविशंकर शुक्ल से लेकर श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल का जो दबदबा 1980 के पहले तक रहा, वह अर्जुन सिंह के आने के बाद कमजोर पड़ा और खत्म हुआ।
आज अगर कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता है, तो यह आरोप अब एक कमजोर इतिहास बनकर रह गया है। इस पार्टी के दो मुखिया और दो प्रधानमंत्री जिस तरह आतंक के हाथों मारे गए, उसके चलते हुए भी परिवार के और लोगों को परिस्थितियों ने पार्टी का नेता बना दिया, और अगर अकेले कुनबे की राजनीति करने वाली दूसरी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों को देखें तो लगता है कि कांग्रेस बड़ी ही लोकतांत्रिक-कुनबापरस्त पार्टी है। फिलहाल जिस उत्तरप्रदेश को लेकर यह लिखने की नौबत आई है, वह एक बहुत ही बेहूदी कुनबापरस्ती का शिकार प्रदेश है, और भारत के लोकतंत्र के इससे उबरना सीखना चाहिए।

हसरतें और जरूरतें मिलाकर ही नई खरीदी का फैसला करें

संपादकीय
13 सितंबर 2016
दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक एप्पल का नया आईफोन बाजार में आ रहा है, और उसके कई दिन पहले से अमरीका और जर्मनी जैसे देशों में इसके शोरूम के बाहर लोग कतार में लग गए हैं। कुछ ने टेंट लगा लिए हैं, कुछ ने मच्छरदानियां, और कुछ लोग आराम कुर्सी लगाकर जम गए हैं। एक खबर यह भी है कि कतार में लगने वाले कुछ लोग भाड़े पर यह काम करते हैं और ऐसे हफ्ते भर के इंतजार के लिए उन्हें दो लाख रूपए से अधिक का भुगतान होता है, जितना कि फोन का दाम भी नहीं होता।
दरअसल बाजार ने लोगों की जिंदगी को इस तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि जिन लोगों के पास ऐसे सबसे महंगे सामान सबसे जल्दी नहीं पहुंचते हैं, वे हताश-निराश हो जाते हैं, और दूसरों के मुकाबले अपने को कम या कमजोर समझने लगते हैं। छोटे-छोटे सामानों ने लोगों की जिंदगी पर ऐसा कब्जा किया है, और ऐसा असर डाला है कि लोग अपनी जरूरत से सौ गुना अधिक रफ्तार से काम करने वाले फोन खरीद लेते हैं, ऐसे कैमरे खरीद लेते हैं जिनकी उनको कोई जरूरत नहीं होती है, जिन सड़कों पर सौ किलोमीटर घंटे की रफ्तार से गाड़ी नहीं चलाई जा सकती, उन सड़कों के लिए लोग ढाई-तीन सौ किलोमीटर की रफ्तार वाली गाडिय़ां ले लेते हैं। यह सिलसिला बाजार का पैदा किया हुआ एक ऐसा झांसा रहता है, जिसके असर से लोग अपने पास की चीजों की खुशी तो खो बैठते हैं, लेकिन वे उन चीजों की हसरत में स्थायी रूप से बेचैन रहते हैं, जो उनके पास नहीं है, लेकिन बाजार में है, या कुछ दूसरों के पास है। किसी ब्रांड की चाह, नए से नए मॉडल की चाह, और दूसरों से पहले पाने की चाह लोगों की खुशी पूरी तरह छीन लेती है, और उनको यह समझ ही नहीं पड़ता कि उन्हें किसी नए सामान की जरूरत क्यों है, और वे उस मृगतृष्णा के पीछे लग लेते हैं। इन दिनों संपन्न तबका अपने पास के सामानों के पिछले मॉडलों को ठीक से समझ भी नहीं पाता है, उनको सारी बटनों के काम का पता नहीं लगता है, और वे नए मॉडल को लेने के लिए ऐसे उतारू हो जाते हैं कि वे इंटरनेट पर हफ्तों पहले से उसके बारे में पढ़ते रहते हैं, सोते हुए उसके सपने देखते हैं, और जागते हुए उसका इंतजार करते हैं।
अमरीकी अर्थव्यवस्था में जो कंपनियां खासा योगदान करती हैं, उनमें से एप्पल भी एक है। इसलिए जब ऐसी कंपनी के नए सामान के लिए लोग हफ्ते भर का डेरा डालकर कतार में लग जाते हैं, तो अमरीकी मीडिया में इस उन्माद को बढ़ावा देने लगता है क्योंकि अमरीका हो या हिन्दुस्तान, बड़ी कंपनियों के इश्तहारों से ही मीडिया का कारोबार चलता है। हो सकता है कि लाखों रूपए लेकर कतार में लगने वाले लोग किसी असली ग्राहक के बिठाए हुए न हों, और खुद एप्पल कंपनी ने उन्हें बिठाया हो, जिस तरह कि रजनीकांत की फिल्मों के लिए दक्षिण भारत में पागलपन दिखाया जाता है। बाजार के कई तरीके रहते हैं अपना कारोबार बढ़ाने के, लेकिन दुनिया के लोगों को यह समझ रखना चाहिए कि हर नया मॉडल कुछ नई खूबियां लेकर तो आ सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि ग्राहकों के लिए तब तक नई जरूरतें भी आकर खड़ी हो गई हों। इसलिए हसरतों और जरूरतों को साथ-साथ मिलाकर, तौलकर ही नई खरीदी का फैसला करना चाहिए। आज हालत यह है कि लोग अपने एक महीने की कमाई से अधिक का फोन खरीदने लगे हैं, जो कि कुछ बरस पहले तक अस्तित्व में ही नहीं था, और जिसके बिना भी काम बढिय़ा चलता था। आज भी काम चलाने के लिए एक दिन की कमाई जितने दाम के फोन भी बाजार में हैं, लेकिन लोग हैं कि हर डेढ़-दो बरस में अपनी माहवारी कमाई फोन पर खर्च करने लगे हैं।
नतीजा यह हो रहा है कि लोग अपनी जिंदगी की दूसरी अधिक जरूरी जरूरतों का खत्म करते जा रहे हैं। अब किताबों पर खर्च खत्म सा हो रहा है, कुछ लोग जो किताबें खरीदते भी हैं, उनमें से कई लोग इन्हें सजाकर रखने से अधिक इस्तेमाल इनका नहीं करते। इसी तरह कला, संगीत, दिल-दिमाग की बातों पर खर्च कम होते जा रहे हैं। बात करने के फोन महंगे लिए जा रहे हैं, और उन पर बातें सस्ती होने लगी हैं। बाजार को ऐसे ही अक्ल के अंधे और गांठ के पूरे कहे जाने वाले ग्राहक सुहाते हैं। इसलिए अपना नया फोन खरीदने के पहले एक बार यह जरूर सोचें कि आपके पिछले फोन से ऐसा कौन सा काम आप नहीं कर पाते हैं जो कि नए फोन से ही हो सकेगा। महज हसरत की वजह से बेचैनी समझदारी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के सीधे कहे बिना भी राज्यों को खुद सुनने की जरूरत

12 सितंबर 2016  

सुप्रीम कोर्ट ने अभी आन्ध्र-तेलंगाना के एक मामले में फैसला दिया है कि वहां के जो शिक्षक मंत्रियों के निजी सचिव जैसे गैरशिक्षकीय कामों में लगे हुए हैं वे वहां से हटाकर तुरंत पढ़ाने के लिए वापिस भेज जाएं। और यह सोच कोई नई नहीं है, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मौजूदा मुख्यसचिव ने कुछ समय पहले यह आदेश निकाला था कि जो शिक्षक दूसरे विभागों या पदों पर काम कर रहे हैं उन्हें तुरंत उनके मूल विभाग में भेजा जाए। लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है।
हम अपने आसपास लगातार यह देखते हैं कि किस तरह शिक्षक अपनी मर्जी से भी कहीं किसी मंत्री के पीए हो जाते हैं, तो कहीं किसी और विभाग में काम करने लगते हैं। इसी तरह का हाल पुलिस का है जो कि अफसरों और मंत्रियों के बंगलों पर फोन उठाते का काम भी करती है, जो मंत्रियों के पीछे खड़े होकर उन्हें मिलने वाले कागज ढोती है, उनकी गर्दनों पर कुछ पलों के लिए शोभा बनने वाली फूल की मालाओं को थामने के लिए पीछे खड़ी रहती है, और बहुत से मामलों में बड़े अफसरों और मंत्रियों के बच्चों और कुत्तों को भी ढोती है। कुछ ऐसा ही हाल डॉक्टरों का भी होता है जो कि स्वास्थ्य विभाग में अफसरों की कुर्सियों पर बैठकर फाइलों की नब्ज देखते हैं, और मरीजों से कट जाते हैं।
अब दूसरी तरफ देखें तो हिन्दुस्तान में आज प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक तमाम ओहदों से यह बात उठती है कि स्किल डेवलपमेंट देश के लिए बहुत जरूरी है, और लोगों को तरह-तरह के हुनर सिखाकर उन्हें अलग-अलग कामों की उत्कृष्टता तक पहुंचाकर ही यह देश आगे बढ़ सकता है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए बहुत बड़ा बजट रखा है और राज्यों में भी ऐसा माना जा रहा है कि कौशल उन्नयन नाम की इस योजना से देश का आर्थिक विकास होगा। इसके तहत लोगों को पकाना सिखाया जा रहा है, छापना सिखाया जा रहा है, कम्प्यूटर चलाना सिखाया जा रहा है, या गाड़ी चलाना सिखाया जा रहा है। एक तरफ तो अकुशल लोगों को हुनर सिखाकर उन्हें कुशल श्रमिक या कारीगर बनाने की कोशिश चल रही है, तो दूसरी तरफ भारी सीखे हुए लोग अपने हुनर से परे का काम कर रहे हैं।
शिक्षकों की बात करें तो पूरे देश में शिक्षक बनने के लिए बीएड जैसे डिग्री कोर्स करना जरूरी रहता है, और कुछ बरस के शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद ही किसी को शिक्षक बनना नसीब होता है। ऐसा ही हाल किसी के पुलिस सिपाही बनने का रहता है, और दो-तीन बरस की ट्रेनिंग के बाद ही कोई सिपाही बन पाते हैं। डॉक्टर बनने के लिए तो और लंबा समय लगता है, और स्कूल के बाद सात-आठ बरस की पढ़ाई और ट्रेनिंग पाकर ही कोई डॉक्टर बनते हैं। और इसके बाद जब ऐसे लोगों को इनके पेशे और इनके हुनर की खूबियों से परे किसी बाबू या किसी अफसर की तरह फाइलों या फोन पर झोंक दिया जाता है, तो वह देश का खासा बड़ा नुकसान भी होता है।
लेकिन बहुत से मामलों में ऐसे लोग ही उन कुर्सियों पर जाना चाहते हैं जहां पर ताकत होती है, या ऊपरी कमाई होती है। इससे परे कुछ लोग यह भी चाहते हैं कि बड़े शहरों में बने रहें, ताकि दूर-दराज के किसी गांव-जंगल में न जाना पड़े। कुछ मामलों में लोग अपने रिश्तेदार मंत्री-सांसद के स्टाफ में चले जाते हैं, और कुछ मामलों में जात-बिरादरी का असर दिखता है। लेकिन जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा है, हमारा ख्याल है कि देश की तमाम राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं को भी इस फैसले को समझते हुए तमाम हुनरमंद लोगों को गैरहुनर वाली कुर्सियों से हटाकर उनके मूल विभागों में वापिस भेजना चाहिए।
ऐसा अगर हो जाता है, तो देश में प्रशिक्षित और शिक्षित लोगों की उत्पादकता सही हो सकेगी। इसके लिए यह भी जरूरी है कि राज्य सरकारें एक नीतिगत आदेश जारी करें कि ऐसी किसी जगह पर किसी चिकित्सक, शिक्षक या पुलिस को तैनात नहीं किया जाएगा जहां पर उनके हुनर की जरूरत न हो। आज किसी मंत्री के बंगले पर फोन उठाने को अगर एक सिपाही तैनात है, तो यह जनता पर इस हिसाब से भी बोझ है कि दस हजार रूपए महीने के काम के लिए एक ऐसा सिपाही लगाया गया है जिसकी सरकार को लागत शायद तीस-चालीस हजार रूपए महीने तक आती है।
लोकतंत्र में जिम्मेदार सरकार वह होती है जो कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के शब्दों से बचकर निकलने की कोशिश न करे, और उसकी भावना को भी समझते हुए उसे लागू करे। भारत में यह एक बड़ी दिक्कत है कि नेता, अफसर, सरकार, या दूसरे ताकतवर तबके अदालत की आंखों में धूल झोंकने के लिए पेशेवर झूठे गवाहों की तरह केस तैयार करते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि उनका कार्यकाल बने रहने तक सुप्रीम कोर्ट से उनकी इस झांसेबाजी पर कोई फैसला आ ही नहीं पाएगा। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि सूचना का अधिकार और जनहित याचिका मिलकर एक इतना बड़ा विस्फोटक हथियार जनसंगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दे चुके हैं कि वे आए दिन देश-प्रदेश की बड़ी अदालतों में कोई न कोई फैसला सरकारों के खिलाफ पा ही जाते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला आज चाहे केवल शिक्षकों के मामले में आया है, चाहे वह केवल आन्ध्र-तेलंगाना के लिए आया है, लेकिन उसकी भावना को पूरे देश पर लागू होती है, और वह फिर छत्तीसगढ़ रहे, या कि मध्यप्रदेश, इनमें कहीं भी कोई जनसंगठन इस फैसले को लेकर राज्य के हाईकोर्ट में जा ही सकते हैं।
एक दूसरी बात इस सिलसिले में यह है कि स्कूल प्रशासन से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन तक, शिक्षा-प्रशासन एक अलग किस्म का हुनर है, और इसके लिए राज्य सरकारों को एक अलग काडर बनाना चाहिए, और उसके लिए एक अलग ट्रेनिंग का भी इंतजाम करना चाहिए। जब किसी शिक्षक या प्राध्यापक को शैक्षणिक संस्था के भीतर भी प्राचार्य बनाया जाता है, तो वह जिम्मेदारी शैक्षणिक जिम्मेदारी से परे प्रशासनिक कामकाज की होती है, और उसके लिए वरिष्ठतम शिक्षक में समझबूझ होना मुश्किल भी होता है। कुछ ऐसा ही हाल सरकारी अस्पतालों में होता है जहां सबसे सीनियर डॉक्टर को डीन या सुपरिटेंडेंट बना दिया जाता है, और उनकी प्रशासनिक समझ सीमित रहती है। इसलिए ऐसी संस्थाओं में मुखिया बनने के लिए अलग से एक ट्रेनिंग का इंतजाम भी रहना चाहिए, और इसमें दिलचस्पी रखने वाले शिक्षक या चिकित्सक इसे पाकर फिर मुखिया की जिम्मेदारी के लिए बेहतर तैयार हो सकें।
फिलहाल जरूरत यह है कि शिक्षक, चिकित्सक, और पुलिस को अपने-अपने काम के लिए वापिस भेजा जाए, और मंत्री-अफसर अपने घर-दफ्तर के लिए, विभाग अपनी प्रशासनिक कुर्सियों के लिए दूसरे लोगों का इंतजाम करें। 

अमरीकी चुनाव से हिंदुस्तान कुछ सीख सके तो बेहतर

संपादकीय
12 सितंबर 2016
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की खबरें थमने का नाम नहीं लेती हैं। अब नई खबर यह है कि रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प को हराने के लिए फेसबुक बनाने वालों में से एक, डस्टिन मोस्कोविट्ज बीस मिलियन डॉलर का चंदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को दे रहे हैं। उन्होंने इसकी खुली घोषणा की है, और सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि डोनाल्ड ट्रम्प अमरीका और बाहर बाकी दुनिया में भी झूठ फैला रहे हैं, वे नीतियों और विचारों के बजाय धु्रवीकरण को बढ़ा रहे हैं, इसलिए इसे देखते हुए वे अपनी पत्नी के साथ मिलकर यह चंदा दे रहे हैं ताकि उन्हें हराया जा सके।
अमरीका का लोकतंत्र अपने खुद के लिए कुछ अलग ही तरह का है। वह बाहर चाहे लोकतंत्र के नाम पर पूरी दुनिया में बम बरसा दे, लेकिन उसका आंतरिक लोकतंत्र उसके लोगों को बड़े अनोखे लोकतांत्रिक अधिकार देता है। वहां की राजनीति, और उसको समर्थन-साथ देने वाले  लोग यह बताते हैं कि वहां किस तरह की आजादी है। भारत में पहली बात तो यह कि चुनाव का अधिकतर खर्च, और तकरीबन पूरा ही चुनावी चंदा दो नंबर के पैसों से आता है, और अगर कड़ाई बरती जाए तो वामपंथी फटेहाल उम्मीदवारों को छोड़कर बाकी में से शायद एक चौथाई भी चुनाव आयोग से पार न हो सकें, और अपात्र घोषित हो जाएं। इस तरह भारतीय चुनावी राजनीति में आने वाला पैसा भी काला होता है, और जाने वाला पैसा भी। इसके अलावा लोग राजनीतिक दलों और नेताओं को बड़े डरते-सहमते, अकेले बंद कमरे में चंदा देते हैं, ताकि उनके विरोधी अगर सत्ता में आ जाएं, तो उन्हें नुकसान न पहुंचा पाएं। अभी हम अमरीकी राजनीति और वहां की सरकारी व्यवस्था की यह बारीकी तो नहीं जानते कि वहां पर विरोधी को साथ देने वाले दानदाताओं या मीडिया मालिकों के साथ क्या सुलूक किया जाता है, लेकिन अमरीका में यह आम बात है कि मीडिया का एक हिस्सा चुनाव के वक्त किसी पार्टी या नेता को अपना समर्थन खुलकर घोषित कर देता है।
अमरीका की बहुत सी बातों को भारतीय राजनीति में लागू करना मुमकिन नहीं है, लेकिन यह बात तो है कि विचारों को लेकर अगर बाजार-कारोबार के लोग इतनी गंभीरता से किसी का साथ देना या किसी का विरोध करना घोषित करते हैं, तो वहां पर सरकार शायद कारोबार का एक सीमा से अधिक नुकसान करने का हक नहीं रखती है। हिंदुस्तान में टैक्स और बाकी तरह की नीतियों का ऐसा फौलादी सरकारी शिकंजा कारोबार पर रहता है कि जब चाहें किसी का टेंटुआ दबा दिया जाए। हम यह भी उम्मीद नहीं करते कि अगली आधी सदी में भी भारत में राजनीतिक दल अपने शिकंजे को कमजोर करने की सोच सकेंगे, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि दुनिया के दूसरे सिरे पर जिस तरह की एक आजादी है, उसे हिंदुस्तान के लोगों को भी देखना चाहिए, और उसके बारे में सोचना चाहिए। भारत में लंबे समय से यह बात ही चलती आ रही है कि चुनाव के खर्च को सरकार उठाए, और राजनीतिक दल चुनावों के नाम पर कालेधन का मनमाना खेल न खेल सकें। लेकिन इस बारे में हमको गहरा शक भी है कि सरकारी खर्च पा लेने के बाद भी हिंदुस्तानी पार्टियां दो नंबर का खर्च जारी रखेंगी, क्योंकि यहां निगरानी रखने वाली एजेंसियां राजनीतिक दहशत तले जीती हैं। फिर भी चर्चा तो जारी रहना चाहिए।

आने वाले वक्त में निराश लोग इंसाफ के लिए चीखने लगेंगे...

संपादकीय
11 सितंबर 2016
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पिछले कुछ महीनों में लगातार सार्वजनिक रूप से अपनी यह निराशा जाहिर करते आए हैं कि केन्द्र सरकार अदालतों में जजों की खाली कुर्सियों को भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है। उन्होंने मंच पर माईक से बोलते हुए इस मुद्दे पर अपने आंसू पोंछकर भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की बदहाली का एक ऐतिहासिक दर्दनाक बखान भी किया। वे देश के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश भी बने हैं जिन्हें प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषण में न्यायपालिका की बदहाली के बारे में कोई जिक्र न होने पर बयान जारी करके अफसोस जाहिर किया। वे अदालत के फैसलों और आदेशों से परे भी न्यायपालिका की सोच को खुलकर सामने रख रहे हैं, और वे अभी छत्तीसगढ़ के दौरे पर भी आज न्यायपालिका की निराशा को दोहराते हुए नजर आए।
उन्होंने अभी कहा कि आज देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। इनके निपटारे में तीस से ज्यादा वर्ष लग जाएंगे। अगर जजों की भर्ती तेज नहीं की गई तो अगले 15-20 बरसों में मुकदमे पांच करोड़ पार कर जाएंगे और लोग चीखने लगेंगे कि उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा। न्यायिक कमीशन की रिपोर्ट में 1987 में कहा गया था कि 40 हजार जजों की जरूरत देश में हैं लेकिन आज इतने सालों बाद भी हमारी कुल संख्या 18 हजार है। उन्होंने कहा प्रधानमंत्री के सामने उन्होंने जजों की कमी की बात इसलिए की थी क्योंकि आप बदलाव और विकास की चाहें जितनी बातें कर लें जब तक न्यायिक प्रक्रिया में सुधार नहीं किया जाएगा, लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इस मुद्दे पर कई बार लिखते रहते हैं, और अदालतों से वक्त रहते फैसले न होने पर इतनी देर से किसी को राहत मिलती है कि वह राहत किसी काम की नहीं रहती है। दूसरी तरफ जो मुजरिम होते हैं वे सजा के पहले दस-बीस बरस और जुर्म करने के लिए आजाद रहते हैं। जो ताकतवर लोग रहते हैं वे अपनी जरूरत के मुताबिक मुकदमों को तेज या धीमा करवाते रहते हैं, और गरीब या कमजोर की कोई जुबान अदालत में रहती नहीं है। इस बीच में जब जजों की कमी रहती है, तो पेशेवर वकील अदालती प्रक्रिया का बेजा इस्तेमाल करते हुए, कहीं गवाही टालते हुए, तो कहीं सुबूतों में देर करवाते हुए, बार-बार पेशी बढ़वाते हुए एक-एक मामले को दस-बीस बरस तक खींचने की कोशिश करते हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में यह बात एक बड़ी सहज समझ की है कि जुर्म तो अमूमन ताकतवर लोग ही अधिक करते हैं, जिनके हाथ सरकार और राजनीतिक दलों की सत्ता है, वे अधिक करते हैं, इसलिए यह उनके वर्गहित में रहता है कि वे अदालतों में जजों की कुर्सियां खाली रहने दें। अगर फैसले ही तेजी से होने लगे तो बहुत से सांसद-विधायक चुनाव खो बैठेंगे, और सरकारी कुर्सियों पर काबिज लोग जेल में होंगे। इसलिए सत्तारूढ़ लोगों को यह माकूल बैठता है कि जजों की कुर्सियां खाली रखी जाएं।
समय-समय पर जब जिन मुद्दों को लेकर चीख-पुकार होती है, उनके लिए तेज रफ्तार अदालतों की बात कही जाती है। लेकिन वक्त निकल जाता है, और अदालतें अपनी उसी रफ्तार से काम करती हैं, और जिन लोगों का अदालतों से वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि अदालत के पूरे अहाते में जो सबसे अधिक आत्मविश्वास से भरे हुए और बेफिक्र लोग रहते हैं, वे मुजरिम ही होते हैं। हिन्दुस्तानी अदालतों में वहां पहुंचने वाले शरीफों और बेकसूरों के लिए भारी हिकारत का बर्ताव रहता है। हमारा ख्याल है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को अदालतों की संस्कृति और अदालतों के अहंकार पर भी कुछ कहना चाहिए, क्योंकि इनकी मार सबसे कमजोर पर सबसे अधिक पड़ती है। कल ही दिल्ली में देश के एक बड़े प्रतिष्ठित इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने एक महत्वपूर्ण भाषण में भारत की आजादी पर आज छाए हुए आठ खतरे गिनाए हैं, इनमें से एक खतरा उन्होंने निचले स्तर पर कर्तव्य से भटकी हुई न्यायपालिका को भी गिनाया है। हमारा ख्याल है कि मुख्य न्यायाधीश को न्यायपालिका में फैले हुए व्यापक भ्रष्टाचार के बारे में भी कुछ सोचना और कहना चाहिए। प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार को उलाहना देना तो जरूरी है ही, लेकिन घर भी सुधारना उतना ही जरूरी है।

कपिल के नए लोकतांत्रिक हक और मुंबई म्युनिसिपल के भी...

संपादकीय
10 सितंबर 2016
देश के आज तक के सबसे मशहूर कॉमेडियन कपिल शर्मा ने कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक ट्वीट करके सनसनी फैला दी कि मुंबई में म्युनिसिपल के किसी अफसर ने उनसे अपना दफ्तर बनाने के लिए पांच लाख रूपए रिश्वत मांगी। बात की बात में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ट्विटर पर ही उनसे नाम पूछा और जांच करवाने की बात कही। दिन भर कपिल शर्मा की नीयत को लेकर सवाल उठते रहे क्योंकि उनके साथी कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा को छोड़कर कल ही अपनी नई पार्टी बना रहे थे, और ऐन उसी मौके पर यह ट्वीट राजनीतिक भी माना गया। लोगों ने कपिल शर्मा की नीयत पर वार किया, और शाम होने तक मुंबई महानगरपालिका  यह जानकारी लेकर आई कि कपिल शर्मा अपने दफ्तर को बनाने में कई तरह के नियम-कायदे तोड़ रहे हैं, अवैध निर्माण कर रहे हैं, और रोकने पर ऐसी शिकायत कर रहे हैं।
दरअसल एक बड़ी पुरानी कहावत है कि जब हम किसी दूसरे की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारे खुद के तरफ मुड़ी रहती हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन में जब कोई किसी दूसरे पर तोहमत लगाते हैं, तो वह मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर चलाने सरीखा रहता है, जिसके बाद घायल मधुमक्खियां हिसाब चुकता करने को टूट भी पड़ती हैं। इसलिए दुनिया में कई तरह की कहावतें और मुहावरे बने हैं कि जो लोग खुद शीशे के घर में रहते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं चलाने चाहिए। कुछ दूसरी जगहों पर यह कहा जाता है कि जिसने खुद ने कोई गलत काम न किया हो, उसे ही पहला पत्थर चलाने का हक रहता है। आज कपिल शर्मा को करोड़ों लोग टीवी पर देखते हैं, और वे मजाक-मजाक में बहुत से लोगों की खिल्ली भी उड़ा लेते हैं क्योंकि मजाक अक्सर ही दूसरों की कीमत पर किया जाता है। लेकिन ट्विटर और टीवी में एक फर्क यह भी है कि टीवी में तो दर्शकों पर बातों को एकतरफा फेंका जाता है, लेकिन ट्विटर तो मधुमक्खियों का छत्ता है, और वहां पर दिग्विजय सिंह से नफरत करने वाले लोग उन्हें डॉगविजय सिंह से लेकर पिगविजय सिंह तक लिखकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। और शायद इसीलिए कुछ लोगों का यह कहना रहता है कि अगर बर्दाश्त न हो तो लोगों को सोशल मीडिया पर नहीं जाना चाहिए।
दुनिया के बाकी देशों में सोशल मीडिया और विकीलीक्स की मेहरबानी से बहुत सी बातें सामने आती हैं, लेकिन भारत में सरकारी गोपनीयता की पुरानी परंपरा के माहौल में अब पिछले कुछ बरसों से सूचना के अधिकार ने भी एक नया लोकतंत्र खड़ा किया है, जो कि भारतीय लोकतंत्र के पुराने अंदाज के संदर्भ में कुछ गैरजिम्मेदार या बागी सा तो लगता है, लेकिन वह अपने मिजाज से बहुत ही लोकतांत्रिक भी है। अब भारत में सरकार की कुछ चुनिंदा गोपनीय बातों के अलावा कुछ भी गोपनीय नहीं रह गया है, और संचार माध्यम, संचार तकनीक की नई संभावनाओं के चलते हुए अब किसी भी जानकारी पर परंपरागत मीडिया का काबू भी नहीं रह गया है। इसलिए आज लोगों को किसी मुद्दे को छूने या छेडऩे के पहले यह भी याद रखना चाहिए कि कल तक जो लोग अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखने का अधिकार ही रखते थे, आज उनके पास इंटरनेट के सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के वॉट्सऐप जैसे बहुत से ऐसे औजार मुफ्त में हासिल हो गए हैं, जिन पर किसी संपादक का कोई काबू नहीं होता। इसलिए कपिल शर्मा मोदी के अच्छे दिनों पर भी हमला कर सकते हैं, और कुछ घंटों में ही मुंबई म्युनिसिपल कपिल के अवैध निर्माण को गिनाते हुए उन पर जवाबी हमला कर सकती है। यह एक नया लोकतंत्रीकरण है, जिसकी संभावनाएं भी हैं, और जिससे कई तरह की आशंकाएं भी लोगों को इसके साथ जीना सीखना चाहिए।

गंदगी में अव्वल दर्जा हासिल है इस राज्य को

संपादकीय
9 सितंबर 2016
केन्द्र सरकार के एक ग्रामीण सर्वे में छत्तीसगढ़ इस बार फिर बहुत ही गंदा प्रदेश साबित हुआ है और साफ-सुथरे शहरों की लिस्ट में इस प्रदेश को कोई जगह नहीं मिली है। हम आंकड़ों पर बहुत जाना नहीं चाहते, लेकिन छत्तीसगढ़ में गंदगी की हालत बहुत ही भयानक है। इसके पहले के कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सर्वे में छत्तीसगढ़ की राजधानी एक बरस पहले सबसे प्रदूषित साबित हो चुकी है। यही राजधानी देश के सबसे गंदे शहरों में से एक गिनी जा चुकी है, और इसके पीछे कोई राजनीति भी नहीं थी, निर्विवाद सरकारी एजेंसियों ने देश भर के सर्वे के मुताबिक यह नतीजा निकाला था। ऐसी लिस्ट और ऐसी आंकड़ों पर गए बिना अपनी आंखों से जो दिखता है उस पर भी भरोसा कर लें, तो भी यह प्रदेश भयानक गंदगी का शिकार है, और आदी भी है।  लोगों की तरफ से इस गंदगी को लेकर कोई शिकायत भी नहीं उठती है, और कोई एक जनसंगठन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में जाकर वहां से सरकार और म्युनिसिपल को तरह-तरह के आदेश-निर्देश दिलवाता है, और म्युनिसिपल ऐसे आदेशों को फिर घूरे के ढेर पर फेंककर कचरे को और बढ़ा देता है।
इसकी एक बुनियादी वजह हमको यह लगती है कि इस प्रदेश में म्युनिसिपल से लेकर पंचायतों तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और अफसरों, इन सबकी मोटी दिलचस्पी गौरव पथ नाम के शाही राजमार्ग बनाने में, कांक्रीट के अधिक से अधिक निर्माण करने में, एक-एक इंच खाली जमीन पर बाजारू इमारतें बनाने में दिखती है। गांवों में गौरव पथ नहीं हैं, लेकिन वहां पर दूसरे निर्माण कार्योँ में पंच-सरपंच लगे रहते हैं, अफसर कमीशन लिए बिना चेक नहीं देते हैं, और किसी जिले में किसी कड़क अफसर के पहुंचने पर बहुत से सरपंचों की गिरफ्तारी के आदेश निकलते हैं, उनके पास से पैसों की वसूली के आदेश निकलते हैं, और पंचायतों का कामकाज शहरी म्युनिसिपलों के मुकाबले और अधिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ दिखता है। नतीजा यह है कि नाली, पानी, रौशनी जैसी बुनियादी जिम्मेदारी से मानो पूरी तरह मुक्त होकर हर कोई अपनी कुर्सी की पूरी ताकत को ऐसे निर्माण में लगा रहे हैं जिनमें अच्छी मोटी कमाई की गुंजाइश रहती है। निर्वाचित नेता, अफसर और ठेकेदार मिलकर एक ऐसा बरमूडा-त्रिकोण बनाते हैं जिनमें स्थानीय संस्थाओं की जिम्मेदारी का डूबना तय हो जाता है। नतीजा यह है कि राजधानी नाम के इस रायपुर शहर में हजारों करोड़ के निर्माण हुए हैं, और इसी दौरान इस शहर को सबसे प्रदूषित और सबसे गंदे शहर का कलंक भी हासिल हुआ है।
जब तक स्थानीय संस्थाएं अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता नहीं समझेंगी, जब तक स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक-एक वार्ड में एक-एक करोड़ रूपए तक खर्चीले होते रहेंगे, जब तक जनता ऐसी गंदगी के खिलाफ उठकर खड़ा होना नहीं सीखेगी, तब तक इस जनता को ऐसी ही गंदगी नसीब रहेगी, वह गंदगी की ही हकदार रहेगी। इस प्रदेश में अपनी राजधानी में दक्षिण भारत की निजी कंपनी को सफाई के नाम पर करोड़ों लेकर जाते देखा है, और तरह-तरह के प्रयोग देखे हैं। पुराने लोगों को यह भी याद है कि जिस समय म्युनिसिपल के पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, जब सड़कों पर ट्यूब लाईट तक लगाने के पैसे नहीं थे, और बल्ब जलते थे, उस वक्त भी ऐसे म्युनिसिपल कमिश्नर हुआ करते थे जो कि सुबह 5 बजे से पैदल पूरे शहर का दौरा करते थे, और शहर को साफ रखते थे। आज म्युनिसिपलों और पंचायतों में पैसा नाली में बह रहा है, अफसर और नेता अपनी निजी गाडिय़ों के लिए झगड़ा कर रहे हैं कि कौन कितनी महंगी गाड़ी हासिल कर सकते हैं, और शहर घूरा बन रहा है। हमारे पास ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि राजधानी से अधिक साफ-सुथरा प्रदेश का कोई और शहर हो सकता है, हालांकि एक सिरे पर बसे हुए एक जिला मुख्यालय अंबिकापुर में पिछली कलेक्टर और म्युनिसिपल ने मिलकर शहर को साफ करने, और साफ रखने की एक मिसाल पेश की है, जिससे बाकी प्रदेश, बाकी शहर नसीहत ले सकते थे, लेकिन उसका असर अंबिकापुर से बाहर और कहीं नहीं दिखा।
स्थानीय संस्थाओं के चुनावों में और लोकतंत्र में लोगों का अच्छा काम करना कोई मुद्दा नहीं रह गया है, अंधाधुंध खर्च से वोट खरीदकर, पार्टी या किसी और आधार पर चुनाव जीतकर जो लोग स्थानीय शासन की कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं, वे अगर शहर को घूरा भी बना दे रहे हैं, तो यह प्रदेश सरकार के सोचने की बात है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तो दो पार्टियों के कब्जे वाले म्युनिसिपल की है। यहां मेयर कांग्रेस का है, और राज्य शासन का मंत्री भाजपा का। और इस राजधानी का तजुर्बा यह है कि यह देश का सबसे बड़ा घूरा बना हुआ है। इस बारे में राज्य सरकार को सोचना चाहिए कि जिस शहर में पूरी सरकार बैठती है, और इस छोटे से राज्य के जिस शहर में बचपन से मुख्य सचिव रहते आए हैं, उस शहर को घूरे का राष्ट्रीय दर्जा मिलने पर इस सरकार को तकलीफ होती है या नहीं, यह तो पता नहीं है।

केजरीवाल ऐसी जुबानी-गंदगी फैलाकर लंबा नहीं चल सकते

संपादकीय
8 सितंबर 2016
दिल्ली और पंजाब में लगातार महिलाओं के आरोप झेलते हुए, कहीं वीडियो तो कहीं ऑडियो रिकॉर्डिंग से बदनामी पाते हुए आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल आज जब पंजाब चुनाव प्रचार पर गए, तो जाते हुए दिल्ली स्टेशन पर ही उन्हें महिलाओं का विरोध झेलना पड़ा, और पंजाब पहुंचने पर भी स्टेशन पर वे पुलिस के घेरे में ही स्टेशन से बाहर निकल पाए। और जैसी कि उम्मीद थी, आम आदमी पार्टी की तरफ से यह कहा गया कि नरेन्द्र मोदी ने यह विरोध करवाया है। दूसरी तरफ गुजरात में लंबा पटेल आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल के भाई का एक स्टिंग ऑपरेशन अभी सामने आया जिसमें वे एक व्यापारी से रूपए ले रहे हैं, तो हार्दिक ने कहा कि इस वीडियो को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के इशारे पर फैलाया जा रहा है।
केजरीवाल काफी अरसे से इस बात के लिए बदनाम हैं कि वे अपने खिलाफ होने वाली हर बात को लेकर मोदी पर हमला करते हैं, उन पर तोहमत लगाते हैं। हो सकता है कि केजरीवाल के खिलाफ हर साजिश के पीछे मोदी हों, क्योंकि राजनीति में कानून तोड़े बिना जितने तरह की साजिशें हो सकती हैं, वे सब तो मान्यता प्राप्त हो ही चुकी हैं, कभी कोई पार्टी स्टिंग ऑपरेशन करती है, तो कभी कोई दूसरी पार्टी। अब सवाल यह है कि केजरीवाल के मंत्री अगर किसी महिला के ऐसे आरोपों के घेरे में हैं कि राशन कार्ड बनवाने के लिए उस मंत्री ने महिला का देह शोषण किया, और खुद ही उसकी खुफिया-रिकॉर्डिंग भी कर ली, तो इसमें मोदी और अमित शाह क्या करें, या राहुल गांधी क्या करें? राजनीतिक विरोध अपनी जगह ठीक है, और राजनीतिक साजिशें भी चलती ही रहती हैं, लेकिन अगर केजरीवाल का कोई मंत्री विदेशी महिलाओं को पीटता है, कोई अपनी बीवी को पीटता है, कोई किसी और तरह का जुर्म करता है, तो क्या इसे आम आदमी पार्टी के विरोधी बंदूक की नोंक पर करवाते हैं? अभी दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश में भाजपा से जुड़े हुए एक ऐसे नेता को सेक्स-रैकेट में गिरफ्तार किया गया है जो कि मोदी-सेना नाम का एक संगठन चलाता था, और जिसकी मोदी और बाकी मंत्रियों, भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरों से उसका फेसबुक पेज पटा हुआ है। तो अब भाजपा की सरकार में भाजपा से जुड़े इस सेक्स-कारोबारी की गिरफ्तारी किसकी साजिश कही जाए? अभी-अभी गुजरात की खबर आई है कि वहां पर भाजपा सरकार के मातहत काम करने वाली सीआईडी ने अदालत में अपनी जांच-रिपोर्ट में कहा है कि वहां ऊना में दलितों पर गोमांस का आरोप लगाकर उनकी जो पिटाई की गई थी, उसमें पुलिस ने अपराध किया था, और कई पुलिसवालों को गिरफ्तार करके सीआईडी ने अदालत में पेश भी कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि मोदी और अमित शाह के राज में वहीं की सीआईडी, वहीं की पुलिस को, गौरक्षकों की हिंसा और उनके जुर्म में भागीदार मानते हुए गिरफ्तार करके अदालत में पेश कर रही है, तो इसे किसके इशारे पर किया हुआ काम माना जाए? अभी महाराष्ट्र खबरों में बना हुआ है जहां पर एक धर्मनिरपेक्ष और कट्टरता विरोधी सामाजिक मुखिया की हत्या में सनातन हिन्दू संगठन के लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और अदालत में उनका जुर्म साबित किया जा रहा है। यह पूरा काम भी वहां पर भाजपा की सरकार के रहते हुए हुआ है।
केजरीवाल भारतीय राजनीति में गैरजिम्मेदारी से बयानबाजी, अतिबड़बोलेपन, और सनसनीखेज आरोपों का एक अभूतपूर्व सिलसिला चला रहे हैं। धीरे-धीरे जनता उनकी ऐसी जुबानी-गैरजिम्मेदारी से थकती जाएगी, और उनसे भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उनके ऐसे आरोपों के पीछे उनकी प्रधानमंत्री बनने की हसरत है, या कि मोदी को बदनाम करने की? हो सकता है कि उनकी ये दोनों हसरतें साथ-साथ चलती हों, लेकिन मीडिया चाहे कितनी ही गैरजिम्मेदारी से ऐसे आरोप दिखाता रहे, देश की जनता ऐसी गंदगी पर बहुत समय तक भरोसा नहीं करती, चाहे उसे किसी पार्टी के, कोई भी नेता फैलाएं। हमारा ख्याल है कि मीडिया को गैरजिम्मेदारी से गंदगी फैलाने के बजाय, ऐसे लोगों से जिम्मेदारी के सवाल करने चाहिए, और इसके बिना अधिकतर पार्टियां महज सनसनीखेज गंदगी बढ़ाते चल रही है।