कपिल के नए लोकतांत्रिक हक और मुंबई म्युनिसिपल के भी...

संपादकीय
10 सितंबर 2016
देश के आज तक के सबसे मशहूर कॉमेडियन कपिल शर्मा ने कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक ट्वीट करके सनसनी फैला दी कि मुंबई में म्युनिसिपल के किसी अफसर ने उनसे अपना दफ्तर बनाने के लिए पांच लाख रूपए रिश्वत मांगी। बात की बात में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ट्विटर पर ही उनसे नाम पूछा और जांच करवाने की बात कही। दिन भर कपिल शर्मा की नीयत को लेकर सवाल उठते रहे क्योंकि उनके साथी कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा को छोड़कर कल ही अपनी नई पार्टी बना रहे थे, और ऐन उसी मौके पर यह ट्वीट राजनीतिक भी माना गया। लोगों ने कपिल शर्मा की नीयत पर वार किया, और शाम होने तक मुंबई महानगरपालिका  यह जानकारी लेकर आई कि कपिल शर्मा अपने दफ्तर को बनाने में कई तरह के नियम-कायदे तोड़ रहे हैं, अवैध निर्माण कर रहे हैं, और रोकने पर ऐसी शिकायत कर रहे हैं।
दरअसल एक बड़ी पुरानी कहावत है कि जब हम किसी दूसरे की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारे खुद के तरफ मुड़ी रहती हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन में जब कोई किसी दूसरे पर तोहमत लगाते हैं, तो वह मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर चलाने सरीखा रहता है, जिसके बाद घायल मधुमक्खियां हिसाब चुकता करने को टूट भी पड़ती हैं। इसलिए दुनिया में कई तरह की कहावतें और मुहावरे बने हैं कि जो लोग खुद शीशे के घर में रहते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं चलाने चाहिए। कुछ दूसरी जगहों पर यह कहा जाता है कि जिसने खुद ने कोई गलत काम न किया हो, उसे ही पहला पत्थर चलाने का हक रहता है। आज कपिल शर्मा को करोड़ों लोग टीवी पर देखते हैं, और वे मजाक-मजाक में बहुत से लोगों की खिल्ली भी उड़ा लेते हैं क्योंकि मजाक अक्सर ही दूसरों की कीमत पर किया जाता है। लेकिन ट्विटर और टीवी में एक फर्क यह भी है कि टीवी में तो दर्शकों पर बातों को एकतरफा फेंका जाता है, लेकिन ट्विटर तो मधुमक्खियों का छत्ता है, और वहां पर दिग्विजय सिंह से नफरत करने वाले लोग उन्हें डॉगविजय सिंह से लेकर पिगविजय सिंह तक लिखकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। और शायद इसीलिए कुछ लोगों का यह कहना रहता है कि अगर बर्दाश्त न हो तो लोगों को सोशल मीडिया पर नहीं जाना चाहिए।
दुनिया के बाकी देशों में सोशल मीडिया और विकीलीक्स की मेहरबानी से बहुत सी बातें सामने आती हैं, लेकिन भारत में सरकारी गोपनीयता की पुरानी परंपरा के माहौल में अब पिछले कुछ बरसों से सूचना के अधिकार ने भी एक नया लोकतंत्र खड़ा किया है, जो कि भारतीय लोकतंत्र के पुराने अंदाज के संदर्भ में कुछ गैरजिम्मेदार या बागी सा तो लगता है, लेकिन वह अपने मिजाज से बहुत ही लोकतांत्रिक भी है। अब भारत में सरकार की कुछ चुनिंदा गोपनीय बातों के अलावा कुछ भी गोपनीय नहीं रह गया है, और संचार माध्यम, संचार तकनीक की नई संभावनाओं के चलते हुए अब किसी भी जानकारी पर परंपरागत मीडिया का काबू भी नहीं रह गया है। इसलिए आज लोगों को किसी मुद्दे को छूने या छेडऩे के पहले यह भी याद रखना चाहिए कि कल तक जो लोग अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखने का अधिकार ही रखते थे, आज उनके पास इंटरनेट के सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के वॉट्सऐप जैसे बहुत से ऐसे औजार मुफ्त में हासिल हो गए हैं, जिन पर किसी संपादक का कोई काबू नहीं होता। इसलिए कपिल शर्मा मोदी के अच्छे दिनों पर भी हमला कर सकते हैं, और कुछ घंटों में ही मुंबई म्युनिसिपल कपिल के अवैध निर्माण को गिनाते हुए उन पर जवाबी हमला कर सकती है। यह एक नया लोकतंत्रीकरण है, जिसकी संभावनाएं भी हैं, और जिससे कई तरह की आशंकाएं भी लोगों को इसके साथ जीना सीखना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें