आने वाले वक्त में निराश लोग इंसाफ के लिए चीखने लगेंगे...

संपादकीय
11 सितंबर 2016
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पिछले कुछ महीनों में लगातार सार्वजनिक रूप से अपनी यह निराशा जाहिर करते आए हैं कि केन्द्र सरकार अदालतों में जजों की खाली कुर्सियों को भरने के लिए कुछ नहीं कर रही है। उन्होंने मंच पर माईक से बोलते हुए इस मुद्दे पर अपने आंसू पोंछकर भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की बदहाली का एक ऐतिहासिक दर्दनाक बखान भी किया। वे देश के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश भी बने हैं जिन्हें प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषण में न्यायपालिका की बदहाली के बारे में कोई जिक्र न होने पर बयान जारी करके अफसोस जाहिर किया। वे अदालत के फैसलों और आदेशों से परे भी न्यायपालिका की सोच को खुलकर सामने रख रहे हैं, और वे अभी छत्तीसगढ़ के दौरे पर भी आज न्यायपालिका की निराशा को दोहराते हुए नजर आए।
उन्होंने अभी कहा कि आज देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। इनके निपटारे में तीस से ज्यादा वर्ष लग जाएंगे। अगर जजों की भर्ती तेज नहीं की गई तो अगले 15-20 बरसों में मुकदमे पांच करोड़ पार कर जाएंगे और लोग चीखने लगेंगे कि उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा। न्यायिक कमीशन की रिपोर्ट में 1987 में कहा गया था कि 40 हजार जजों की जरूरत देश में हैं लेकिन आज इतने सालों बाद भी हमारी कुल संख्या 18 हजार है। उन्होंने कहा प्रधानमंत्री के सामने उन्होंने जजों की कमी की बात इसलिए की थी क्योंकि आप बदलाव और विकास की चाहें जितनी बातें कर लें जब तक न्यायिक प्रक्रिया में सुधार नहीं किया जाएगा, लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इस मुद्दे पर कई बार लिखते रहते हैं, और अदालतों से वक्त रहते फैसले न होने पर इतनी देर से किसी को राहत मिलती है कि वह राहत किसी काम की नहीं रहती है। दूसरी तरफ जो मुजरिम होते हैं वे सजा के पहले दस-बीस बरस और जुर्म करने के लिए आजाद रहते हैं। जो ताकतवर लोग रहते हैं वे अपनी जरूरत के मुताबिक मुकदमों को तेज या धीमा करवाते रहते हैं, और गरीब या कमजोर की कोई जुबान अदालत में रहती नहीं है। इस बीच में जब जजों की कमी रहती है, तो पेशेवर वकील अदालती प्रक्रिया का बेजा इस्तेमाल करते हुए, कहीं गवाही टालते हुए, तो कहीं सुबूतों में देर करवाते हुए, बार-बार पेशी बढ़वाते हुए एक-एक मामले को दस-बीस बरस तक खींचने की कोशिश करते हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में यह बात एक बड़ी सहज समझ की है कि जुर्म तो अमूमन ताकतवर लोग ही अधिक करते हैं, जिनके हाथ सरकार और राजनीतिक दलों की सत्ता है, वे अधिक करते हैं, इसलिए यह उनके वर्गहित में रहता है कि वे अदालतों में जजों की कुर्सियां खाली रहने दें। अगर फैसले ही तेजी से होने लगे तो बहुत से सांसद-विधायक चुनाव खो बैठेंगे, और सरकारी कुर्सियों पर काबिज लोग जेल में होंगे। इसलिए सत्तारूढ़ लोगों को यह माकूल बैठता है कि जजों की कुर्सियां खाली रखी जाएं।
समय-समय पर जब जिन मुद्दों को लेकर चीख-पुकार होती है, उनके लिए तेज रफ्तार अदालतों की बात कही जाती है। लेकिन वक्त निकल जाता है, और अदालतें अपनी उसी रफ्तार से काम करती हैं, और जिन लोगों का अदालतों से वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि अदालत के पूरे अहाते में जो सबसे अधिक आत्मविश्वास से भरे हुए और बेफिक्र लोग रहते हैं, वे मुजरिम ही होते हैं। हिन्दुस्तानी अदालतों में वहां पहुंचने वाले शरीफों और बेकसूरों के लिए भारी हिकारत का बर्ताव रहता है। हमारा ख्याल है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को अदालतों की संस्कृति और अदालतों के अहंकार पर भी कुछ कहना चाहिए, क्योंकि इनकी मार सबसे कमजोर पर सबसे अधिक पड़ती है। कल ही दिल्ली में देश के एक बड़े प्रतिष्ठित इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने एक महत्वपूर्ण भाषण में भारत की आजादी पर आज छाए हुए आठ खतरे गिनाए हैं, इनमें से एक खतरा उन्होंने निचले स्तर पर कर्तव्य से भटकी हुई न्यायपालिका को भी गिनाया है। हमारा ख्याल है कि मुख्य न्यायाधीश को न्यायपालिका में फैले हुए व्यापक भ्रष्टाचार के बारे में भी कुछ सोचना और कहना चाहिए। प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार को उलाहना देना तो जरूरी है ही, लेकिन घर भी सुधारना उतना ही जरूरी है।

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