अमरीकी चुनाव से हिंदुस्तान कुछ सीख सके तो बेहतर

संपादकीय
12 सितंबर 2016
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की खबरें थमने का नाम नहीं लेती हैं। अब नई खबर यह है कि रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प को हराने के लिए फेसबुक बनाने वालों में से एक, डस्टिन मोस्कोविट्ज बीस मिलियन डॉलर का चंदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को दे रहे हैं। उन्होंने इसकी खुली घोषणा की है, और सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि डोनाल्ड ट्रम्प अमरीका और बाहर बाकी दुनिया में भी झूठ फैला रहे हैं, वे नीतियों और विचारों के बजाय धु्रवीकरण को बढ़ा रहे हैं, इसलिए इसे देखते हुए वे अपनी पत्नी के साथ मिलकर यह चंदा दे रहे हैं ताकि उन्हें हराया जा सके।
अमरीका का लोकतंत्र अपने खुद के लिए कुछ अलग ही तरह का है। वह बाहर चाहे लोकतंत्र के नाम पर पूरी दुनिया में बम बरसा दे, लेकिन उसका आंतरिक लोकतंत्र उसके लोगों को बड़े अनोखे लोकतांत्रिक अधिकार देता है। वहां की राजनीति, और उसको समर्थन-साथ देने वाले  लोग यह बताते हैं कि वहां किस तरह की आजादी है। भारत में पहली बात तो यह कि चुनाव का अधिकतर खर्च, और तकरीबन पूरा ही चुनावी चंदा दो नंबर के पैसों से आता है, और अगर कड़ाई बरती जाए तो वामपंथी फटेहाल उम्मीदवारों को छोड़कर बाकी में से शायद एक चौथाई भी चुनाव आयोग से पार न हो सकें, और अपात्र घोषित हो जाएं। इस तरह भारतीय चुनावी राजनीति में आने वाला पैसा भी काला होता है, और जाने वाला पैसा भी। इसके अलावा लोग राजनीतिक दलों और नेताओं को बड़े डरते-सहमते, अकेले बंद कमरे में चंदा देते हैं, ताकि उनके विरोधी अगर सत्ता में आ जाएं, तो उन्हें नुकसान न पहुंचा पाएं। अभी हम अमरीकी राजनीति और वहां की सरकारी व्यवस्था की यह बारीकी तो नहीं जानते कि वहां पर विरोधी को साथ देने वाले दानदाताओं या मीडिया मालिकों के साथ क्या सुलूक किया जाता है, लेकिन अमरीका में यह आम बात है कि मीडिया का एक हिस्सा चुनाव के वक्त किसी पार्टी या नेता को अपना समर्थन खुलकर घोषित कर देता है।
अमरीका की बहुत सी बातों को भारतीय राजनीति में लागू करना मुमकिन नहीं है, लेकिन यह बात तो है कि विचारों को लेकर अगर बाजार-कारोबार के लोग इतनी गंभीरता से किसी का साथ देना या किसी का विरोध करना घोषित करते हैं, तो वहां पर सरकार शायद कारोबार का एक सीमा से अधिक नुकसान करने का हक नहीं रखती है। हिंदुस्तान में टैक्स और बाकी तरह की नीतियों का ऐसा फौलादी सरकारी शिकंजा कारोबार पर रहता है कि जब चाहें किसी का टेंटुआ दबा दिया जाए। हम यह भी उम्मीद नहीं करते कि अगली आधी सदी में भी भारत में राजनीतिक दल अपने शिकंजे को कमजोर करने की सोच सकेंगे, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि दुनिया के दूसरे सिरे पर जिस तरह की एक आजादी है, उसे हिंदुस्तान के लोगों को भी देखना चाहिए, और उसके बारे में सोचना चाहिए। भारत में लंबे समय से यह बात ही चलती आ रही है कि चुनाव के खर्च को सरकार उठाए, और राजनीतिक दल चुनावों के नाम पर कालेधन का मनमाना खेल न खेल सकें। लेकिन इस बारे में हमको गहरा शक भी है कि सरकारी खर्च पा लेने के बाद भी हिंदुस्तानी पार्टियां दो नंबर का खर्च जारी रखेंगी, क्योंकि यहां निगरानी रखने वाली एजेंसियां राजनीतिक दहशत तले जीती हैं। फिर भी चर्चा तो जारी रहना चाहिए।

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