हसरतें और जरूरतें मिलाकर ही नई खरीदी का फैसला करें

संपादकीय
13 सितंबर 2016
दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक एप्पल का नया आईफोन बाजार में आ रहा है, और उसके कई दिन पहले से अमरीका और जर्मनी जैसे देशों में इसके शोरूम के बाहर लोग कतार में लग गए हैं। कुछ ने टेंट लगा लिए हैं, कुछ ने मच्छरदानियां, और कुछ लोग आराम कुर्सी लगाकर जम गए हैं। एक खबर यह भी है कि कतार में लगने वाले कुछ लोग भाड़े पर यह काम करते हैं और ऐसे हफ्ते भर के इंतजार के लिए उन्हें दो लाख रूपए से अधिक का भुगतान होता है, जितना कि फोन का दाम भी नहीं होता।
दरअसल बाजार ने लोगों की जिंदगी को इस तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि जिन लोगों के पास ऐसे सबसे महंगे सामान सबसे जल्दी नहीं पहुंचते हैं, वे हताश-निराश हो जाते हैं, और दूसरों के मुकाबले अपने को कम या कमजोर समझने लगते हैं। छोटे-छोटे सामानों ने लोगों की जिंदगी पर ऐसा कब्जा किया है, और ऐसा असर डाला है कि लोग अपनी जरूरत से सौ गुना अधिक रफ्तार से काम करने वाले फोन खरीद लेते हैं, ऐसे कैमरे खरीद लेते हैं जिनकी उनको कोई जरूरत नहीं होती है, जिन सड़कों पर सौ किलोमीटर घंटे की रफ्तार से गाड़ी नहीं चलाई जा सकती, उन सड़कों के लिए लोग ढाई-तीन सौ किलोमीटर की रफ्तार वाली गाडिय़ां ले लेते हैं। यह सिलसिला बाजार का पैदा किया हुआ एक ऐसा झांसा रहता है, जिसके असर से लोग अपने पास की चीजों की खुशी तो खो बैठते हैं, लेकिन वे उन चीजों की हसरत में स्थायी रूप से बेचैन रहते हैं, जो उनके पास नहीं है, लेकिन बाजार में है, या कुछ दूसरों के पास है। किसी ब्रांड की चाह, नए से नए मॉडल की चाह, और दूसरों से पहले पाने की चाह लोगों की खुशी पूरी तरह छीन लेती है, और उनको यह समझ ही नहीं पड़ता कि उन्हें किसी नए सामान की जरूरत क्यों है, और वे उस मृगतृष्णा के पीछे लग लेते हैं। इन दिनों संपन्न तबका अपने पास के सामानों के पिछले मॉडलों को ठीक से समझ भी नहीं पाता है, उनको सारी बटनों के काम का पता नहीं लगता है, और वे नए मॉडल को लेने के लिए ऐसे उतारू हो जाते हैं कि वे इंटरनेट पर हफ्तों पहले से उसके बारे में पढ़ते रहते हैं, सोते हुए उसके सपने देखते हैं, और जागते हुए उसका इंतजार करते हैं।
अमरीकी अर्थव्यवस्था में जो कंपनियां खासा योगदान करती हैं, उनमें से एप्पल भी एक है। इसलिए जब ऐसी कंपनी के नए सामान के लिए लोग हफ्ते भर का डेरा डालकर कतार में लग जाते हैं, तो अमरीकी मीडिया में इस उन्माद को बढ़ावा देने लगता है क्योंकि अमरीका हो या हिन्दुस्तान, बड़ी कंपनियों के इश्तहारों से ही मीडिया का कारोबार चलता है। हो सकता है कि लाखों रूपए लेकर कतार में लगने वाले लोग किसी असली ग्राहक के बिठाए हुए न हों, और खुद एप्पल कंपनी ने उन्हें बिठाया हो, जिस तरह कि रजनीकांत की फिल्मों के लिए दक्षिण भारत में पागलपन दिखाया जाता है। बाजार के कई तरीके रहते हैं अपना कारोबार बढ़ाने के, लेकिन दुनिया के लोगों को यह समझ रखना चाहिए कि हर नया मॉडल कुछ नई खूबियां लेकर तो आ सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि ग्राहकों के लिए तब तक नई जरूरतें भी आकर खड़ी हो गई हों। इसलिए हसरतों और जरूरतों को साथ-साथ मिलाकर, तौलकर ही नई खरीदी का फैसला करना चाहिए। आज हालत यह है कि लोग अपने एक महीने की कमाई से अधिक का फोन खरीदने लगे हैं, जो कि कुछ बरस पहले तक अस्तित्व में ही नहीं था, और जिसके बिना भी काम बढिय़ा चलता था। आज भी काम चलाने के लिए एक दिन की कमाई जितने दाम के फोन भी बाजार में हैं, लेकिन लोग हैं कि हर डेढ़-दो बरस में अपनी माहवारी कमाई फोन पर खर्च करने लगे हैं।
नतीजा यह हो रहा है कि लोग अपनी जिंदगी की दूसरी अधिक जरूरी जरूरतों का खत्म करते जा रहे हैं। अब किताबों पर खर्च खत्म सा हो रहा है, कुछ लोग जो किताबें खरीदते भी हैं, उनमें से कई लोग इन्हें सजाकर रखने से अधिक इस्तेमाल इनका नहीं करते। इसी तरह कला, संगीत, दिल-दिमाग की बातों पर खर्च कम होते जा रहे हैं। बात करने के फोन महंगे लिए जा रहे हैं, और उन पर बातें सस्ती होने लगी हैं। बाजार को ऐसे ही अक्ल के अंधे और गांठ के पूरे कहे जाने वाले ग्राहक सुहाते हैं। इसलिए अपना नया फोन खरीदने के पहले एक बार यह जरूर सोचें कि आपके पिछले फोन से ऐसा कौन सा काम आप नहीं कर पाते हैं जो कि नए फोन से ही हो सकेगा। महज हसरत की वजह से बेचैनी समझदारी नहीं है।

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