कुनबापरस्त-लोकतंत्र से लदी पार्टियों वाला भारत

संपादकीय
14 सितंबर 2016
उत्तर भारत और हिंदी इलाकों की खबरें उत्तरप्रदेश पर काबिज मुलायक कुनबे के भीतरी झगड़ों से भरी हुई हैं। सतह पर जो तैर रहा है उससे लगता है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्री बेटे से कुछ खफा चल रहे हैं। और इस नौजवान मुख्यमंत्री का अपने चाचा, उसकी सरकार के मंत्री से तनातनी चल रही है, और चाचा के कुछ विभाग भतीजे ने छीन लिए हैं। दूसरी तरफ चाचा के पसंदीदा मुख्य सचिव को भतीजे ने हटा दिया है, और अभी इन सब पर नेताजी, यानी मुलायम सिंह यादव का फैसला और फतवा आना बाकी है।
यह कुनबा भारतीय लोकतंत्र के भीतर के बड़े अजीब अलोकतांत्रिक विरोधाभासों का एक प्रतीक है। यह कहने के लिए समाजवादी पार्टी कहलाता है, लेकिन इसका समाजवाद से शायद कोई संबंध नहीं रह गया है। दूसरी तरफ इस कुनबे की रिश्तेदारी बगल के बिहार के ऐसे ही दूसरे कुनबे से हो गई है, और लालू यादव भी अपनी पार्टी को निजी भैंस की तरह हांकते हैं, और वे भी लोहिया और समाजवाद का नाम लेकर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाते हैं। भारत की राजनीति में एक समय कांग्रेस के परिवारवाद के खिलाफ जो समाजवादी राम मनोहर लोहिया खड़े होते थे, उनके खड़ाऊ उठाकर नेता बने हुए बहुत से लोग आज अपने परिवारवाद को ढो भी रहे हैं, और समाजवाद उनको ढो रहा है। लेकिन समाजवाद से परे भी मालिकाना हक वाली बहुत सी पार्टियां इस देश में हैं। उधर ऊपर कश्मीर से शुरू करें तो पिछले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तीसरी पीढ़ी के लगातार मुख्यमंत्री रहे, और राज्य की राजनीति में अब उनका जिन महबूबा मुफ्ती से मुकाबला है, वह खुद दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं। थोड़ा नीचे उतरें तो पंजाब कुनबापरस्ती या नशा, इनमें से किससे अधिक लदा हुआ है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। फिर पड़ोस के हरियाणा में तो दोनों-तीनों पार्टियां दो-तीन पीढिय़ों से कुनबापरस्ती को ढो रही हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार का हाल हम गिना ही चुके हैं।
ऐसी ही कुनबापरस्ती कुछ और राज्यों में भी है, लेकिन उनसे भी आगे बढ़कर एक अकेले नेता की सनक पर चलने वाली पार्टियां भी कम नहीं हैं। कई पार्टियों में नेताओं की अगली पीढ़ी अभी हावी नहीं हो पाई है, या है नहीं, और ऐसे में उनकी अपनी मर्जी ही पार्टी की रीति-नीति होती है। इसकी एक बड़ी मिसाल मायावती हैं जो कि बसपा बनाने वाले कांशीराम की सबसे करीबी रहीं, और उनके जाने के बाद अब विरासत की वसीयत में उन्हें पार्टी का मालिकाना हक मिला है। इस पार्टी में मायावती से परे किसी और का नाम भी नहीं है, और वे अकेले ही पार्टी हैं। ऐसा ही हाल बंगाल में ममता बैनर्जी का है, जो कि एक तानाशाह के अंदाज में अपने राज्य के साथ-साथ अपनी पार्टी भी अकेले ही चलाती हैं। उधर दक्षिण में जयललिता को देखें तो वे अपनी पार्टी के नेता एम जी रामचंद्रन की सबसे करीबी रहीं, और उनके गुजरने के बाद उनकी पत्नी तो कहीं टिक नहीं पाईं, और जयललिता ने ही विरासत संभाली। आज उनकी पार्टी और उनका प्रदेश यूगांडा के तानाशाह ईदी अमीन के इतिहास की तरह का वर्तमान है, और भारतीय लोकतंत्र के भीतर वे अलोकतांत्रिक मिसालों में सबसे ऊपर के दो-चार लोगों में हैं। आंध्र में एन टी रामाराव के गुजरने के बाद उनके दामाद चंद्राबाबू नायडू उनकी राजनीति के हकदार बने, और उनके तेवर चाहे अधिक तानाशाह न हों लेकिन उनके बेटे ने भी अब राजनीति में आकर पिता की पार्टी को संभालना शुरू कर दिया है। आज जो राजनीतिक इतिहास नहीं रह गया है, उस इतिहास को देखें तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाके में कांग्रेस की राजनीति हालांकि राष्ट्रीय पार्टी के मातहत रही, लेकिन इन इलाकों में रविशंकर शुक्ल से लेकर श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल का जो दबदबा 1980 के पहले तक रहा, वह अर्जुन सिंह के आने के बाद कमजोर पड़ा और खत्म हुआ।
आज अगर कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता है, तो यह आरोप अब एक कमजोर इतिहास बनकर रह गया है। इस पार्टी के दो मुखिया और दो प्रधानमंत्री जिस तरह आतंक के हाथों मारे गए, उसके चलते हुए भी परिवार के और लोगों को परिस्थितियों ने पार्टी का नेता बना दिया, और अगर अकेले कुनबे की राजनीति करने वाली दूसरी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों को देखें तो लगता है कि कांग्रेस बड़ी ही लोकतांत्रिक-कुनबापरस्त पार्टी है। फिलहाल जिस उत्तरप्रदेश को लेकर यह लिखने की नौबत आई है, वह एक बहुत ही बेहूदी कुनबापरस्ती का शिकार प्रदेश है, और भारत के लोकतंत्र के इससे उबरना सीखना चाहिए।

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