भारत के चीन से पीछे रहने में मच्छर और नेता दोनों का हाथ

संपादकीय
15 सितंबर 2016
भारत और चीन की अर्थव्यवस्था और इन दोनों देशों के भविष्य को लेकर कई तरह की तुलना होती है। लेकिन पिछले दिनों भारत की यात्रा पर आए सिंगापुर के उपप्रधानमंत्री ने भारत की पूरी केन्द्र सरकार की मौजूदगी में इस देश की जिन कमियों को गिनाया, उनमें एक यह भी था कि चीन सहित भारत के पड़ोसी देश मलेरिया पर काबू पा चुके हैं, यहां तक कि श्रीलंका भी इससे आजाद हो चुका है लेकिन भारत इससे जूझ रहा है और ऐसी नौबत इस देश की तरक्की में आड़े आ सकती है। उन्होंने और भी बहुत सी बातें कही, जिनमें भारत के सामाजिक ढांचे पर कम खर्च करना और उसे उपेक्षित रखना भी शामिल है। अब दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ के भिलाई तक की खबरें हैं कि डेंगू और चिकनगुनिया से मौतें हो रही हैं। छत्तीसगढ़ में तो बस्तर में खतरे के बीच तैनात राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवान भी मलेरिया में मारे जा रहे हैं, और गरीबों की बहुत सी मौत तो मलेरिया के नाम के साथ दर्ज भी नहीं हो पाती है।
लेकिन एक तरफ तो छत्तीसगढ़, या देश के ऐसे बहुत से प्रदेश और शहर काफी महंगी और खर्चीली शहरी विकास योजनाओं को देख रहे हैं, और दूसरी तरफ इतने खर्च के बावजूद जब इन जगहों पर गंदगी इतनी अधिक रहती है, मच्छर इतने अधिक रहते हैं, तो मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियां सरकार के लिए एक चुनौती बनी रहती हैं, और लोगों की जिंदगियां ले जाती हैं। जो लोग भी यह मानकर चलते हैं कि शहरों का गौरव बढ़ाने के लिए चौड़ी सड़कें और फ्लाईओवर जैसे महंगे खर्च काफी हैं, उन्हें सबसे पहले इंसान की सफाई की बुनियादी जरूरत के बारे में सोचना चाहिए कि कांक्रीट के ऊपर गंदगी और अधिक गंदी दिखती है। देश हो, प्रदेश हो, या शहर और गांव हो, योजनाओं पर खर्च में यह ध्यान रखना चाहिए कि नेता, अफसर, ठेकेदार के पसंदीदा कांक्रीट के साथ-साथ सफाई की बुनियादी जरूरत भी पूरी कर ली जाए।
दुनिया का अंदाज यह है कि आने वाले वक्त में मलेरिया एक और जानलेवा बीमारी के रूप में आगे बढ़ सकता है, और मच्छरों का सीधा रिश्ता गंदगी से है, जिसे कि काबू में किया जा सकता है। भारत के सभी हिस्सों को यह भी सोचना चाहिए कि सरकार के जिम्मे ही सफाई का काम भी रहता है, और सरकार के जिम्मे ही गरीबों के इलाज का काम भी रहता है। अगर गंदगी को घटाया जाएगा, तो सरकार का इलाज का खर्च सीधे-सीधे घट जाएगा। लेकिन चूंकि सत्ता पर बैठा ताकतवर तबका और समाज का संपन्न तबका, अपने बंद घरों के भीतर मच्छरों के बिना रहते हुए अपने को बड़ा महफूज समझता है, इसलिए गरीबी के साथ जुड़े रहने वाली गंदगी से उपजी बीमारियों को लेकर सरकार से लेकर मीडिया तक में एक बेफिक्री रहती है। अब जनता की बहुत सी दिक्कतों को लेकर जिस तरह जनहित याचिकाएं लेकर लोग अलग-अलग हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं, तो क्या मलेरिया से बचने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा? सफाई करवाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा? और गंदगी से दूर रहने वाले जजों को क्या इसकी अधिक फिक्र होगी? भारतीय लोकतंत्र में वर्गहित और वर्गचिंता से जुड़े हुए ऐसे बहुत से सवाल हैं।
भारत दुनिया के उन देशों में से है जहां अब तक कुष्ठ रोग बाकी है। और यह बीमारी भी गरीबों तक सीमित है, इसलिए सरकार को इसकी एक सीमित फिक्र है। हमारा यह भी सोचना है कि जिस तरह देश की संसद, लोकसभा और राज्यसभा दोनों, और राज्यों की विधानसभाओं से लेकर म्युनिसिपलों तक निर्वाचित और मनोनीत लोगों में करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं, उससे भी गरीबों की फिक्र खत्म होती जा रही है। आज बड़े शहरों के छोटे-छोटे वार्डों में पार्षद बनने के लिए करोड़ों रूपए भी खर्च करते हुए लोग दिखते हैं। उनसे भला यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे गरीबों की फिक्र करेंगे? और सरकारें यह भी नहीं समझ पा रही हैं कि गरीबों की बदहाली के साथ किसी देश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। और आने वाले दशकों में भारत चीन से जिन वजहों से पीछे रहेगा, उसमें मच्छरों का भी योगदान रहेगा, और भारत के नेताओं का भी। इन दोनों में से अधिक योगदान किसका रहेगा, यह अंदाज लगाना नामुमकिन होगा।

1 टिप्पणी:

  1. एक मच्छर आदमी को ... बना देता है... शायद देश के राजनेता यही चाहते भी होंगे। बहुत सुंदर प्रस्तुति सर.

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