अपने राज्य से गैरहाजिर गैरजिम्मेदार सरकार...

संपादकीय
16 सितंबर 2016
दिल्ली की सरकार अपने आपको एक मजाक बनाकर वहां के वोटरों को निराश कर रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू करके अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह आम आदमी पार्टी बनाई, और दिल्ली की परंपरागत दोनों पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा को शिकस्त दी, उसके बाद दिल्ली की राजनीति में एक नई ताजगी की उम्मीद की जा रही थी। और केजरीवाल ने कई तरह की नई उम्मीदें बंधाते हुए राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बड़े ऊंचे पैमाने घोषित भी किए। नतीजा यह हुआ कि जब उनके विधायक एक-एक करके किसी जुर्म में फंसने लगे, उनके मंत्री गलत काम करते पकड़ाने लगे, तो लोगों का मोहभंग होने लगा। फिर उन्होंने केन्द्र सरकार के साथ एक स्थायी टकराव शुरू किया और जारी रखा कि दिल्ली के उपराज्यपाल के अधिकार क्या हैं, और मुख्यमंत्री के अधिकार क्या हैं।
हम इस बात को बुरा नहीं मानते कि एक मुख्यमंत्री दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करे, और निर्वाचित सरकार को अधिक हक देने की मांग करे। इसलिए उस टकराव को भी हम बहुत बुरा नहीं मानते। लेकिन आज दिल्ली की जो हालत है, उसमें केजरीवाल और उनकी पार्टी, उनके मंत्री बहुत ही परले दर्जे के गैरजिम्मेदार साबित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री खुद कर्नाटक में ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों के लिए काम से बाहर हैं, और उनके उपमुख्यमंत्री सहित बाकी कई मंत्री अलग-अलग वजहों से अलग-अलग प्रदेशों में हैं, एक शायद हज करने को देश के बाहर हैं। एक मंत्री बिना किसी इमरजेंसी के छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं, और दिल्ली में चिकनगुनिया और डेंगू से लोग मारे जा रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जनता के बीच जिंदगी की ऐसी मुसीबत के चलते हुए अगर केजरीवाल के मंत्री वहां नहीं हैं, और हर बात के लिए केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल को कोसना जारी है, तो यह दिल्ली की जनता के चुने हुए एक विकल्प की आत्महत्या भी है। केजरीवाल दिल्ली में गैरजिम्मेदारी दिखाकर पंजाब में चुनाव नहीं जीत सकते। पंजाब में बादल कुनबे ने जो बदहाली कर रखी है, उसे देखते हुए वहां की जनता एक नया विकल्प छांट भी सकती थी, लेकिन वह विकल्प ऐसा तो नहीं हो सकता जो कि दिल्ली में गैरजिम्मेदारी दिखाए, मुसीबत के वक्त गायब रहे, और पंजाब में बड़े-बड़े वायदे करे। आज पंजाब और दिल्ली अगल-बगल बसे हुए मीडिया से जुड़े हुए ऐसे राज्य हैं जहां कि दसियों लाख लोगों की रिश्तेदारियां भी हैं। इसलिए केजरीवाल न सिर्फ अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि इस देश में कांग्रेस-भाजपा से परे की एक वैकल्पिक राजनीतिक-संभावना को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। पिछले इन बरसों में केजरीवाल ने सरकार चलाने के साथ-साथ ऐसी भयानक बकवास भी की है, और ऐसी बड़ी-बड़ी गलतियां की हैं, जिनमें से किसी की भी जरूरत नहीं थी, ये सारे के सारे गलत काम अवांछित थे, और ये किसी तजुर्बे की कमी से नहीं हुए थे, ये चुनावी कामयाबी से पैदा अहंकार से उपजे थे, और केजरीवाल इसका लंबा दाम भी चुकाएंगे। फिलहाल आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल कोई सबक लेते नहीं दिख रहे हैं, और यह देश के लोकतंत्र का भी एक नुकसान है।
फिलहाल इसी बहाने दिल्ली को पूर्ण राज्य देने के दर्जे पर भी बात होनी चाहिए, और हम इस कुतर्क को मानने से इंकार करते हैं कि दुनिया के किसी देश में राजधानी की पुलिस स्थानीय सरकार के हाथ में नहीं रहती, और केन्द्र सरकार के हाथ में रहती है। हमको भारत की राजधानी और भारत की संघीय व्यवस्था को देखते हुए यह बात साफ समझ आती है कि यहां तो किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है, और आज चाहे दिल्ली पर जिस पार्टी का राज हो, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर राजधानी-राज्य की सरकार और देश की सरकार के बीच का टकराव खत्म हो, और निर्वाचित सरकार अपना राज्य चला सके।

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