छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के सिंगूर-फैसले की बातों को लागू करके देखने की जरूरत

संपादकीय
17 सितंबर 2016
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा के कारखाने के लिए वामपंथी सरकार द्वारा कई बरस पहले किए गए जमीन अधिग्रहण को गलत ठहराते हुए उसे किसानों को वापिस दे देने का हुक्म दिया है, और चूंकि बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी यही मांग कर भी रही थीं, उन्होंने भूस्वामियों को जमीन लौटाना शुरू कर दिया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या देश के बाकी प्रदेशों में कारखानों के लिए सरकार ने जो जमीनें ली हैं, उनमें यह फैसला लागू होता है, तो क्या वे राज्य खुद होकर इस फैसले की भावना के मुताबिक जमीन लौटाना शुरू करेंगे, या फिर किसी को एक जनहित याचिका लेकर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगानी पड़ेगी? यह बात हम बस्तर में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा टाटा के कारखाने के लिए ली गई जमीन के सिलसिले में कह रहे हैं, और अब टाटा ने भी वहां कारखाना लगाने से खुद होकर मना कर दिया है, इसलिए उस जमीन को लेने का जाहिर मकसद तो खत्म हो चुका है।
किसी एक मिसाल को जब दूसरे मामले पर दिया जाता है, तो दोनों मामलों में फर्क को गिनाना बड़ा आसान हो जाता है। छत्तीसगढ़ में भी सरकार सिंगूर के मामले से बस्तर के मामले को कई मायनों में अलग साबित कर सकती है, लेकिन हमारा यह मानना है कि देश के आदिवासी समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं, बहुत से राजनीतिक दलों की यह मांग चली भी आ रही थी कि आदिवासियों को उजाड़कर, खेतों को खत्म करके कारखाने न लगाए जाएं, और वह मांग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राहत पाती है। इसलिए सरकार को खुद होकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के शब्दों और उसकी भावना को देखते हुए छत्तीसगढ़ के बस्तर की इस जमीन के बारे में फैसला लेना चाहिए जो कि टाटा के कारखाने के लिए सरकार ने लोगों की बांह मरोड़कर हासिल की थी।
इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ में दर्जनों ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें अलग-अलग कारखानेदारों ने आदिवासियों की जमीन को हासिल करने के लिए कानून की आंखों में मिर्च झोंकते हुए अपने गरीब-आदिवासी के नाम से करोड़ों की जमीनों की खरीददारी कर ली, और उस जमीन को कारखाने की जमीन बताते हुए पर्यावरण मंजूरी से लेकर बाकी कई किस्म की मंजूरियां हासिल कर लीं। ऐसे कई मामलों में जिला प्रशासन के सामने जालसाजी स्थापित भी हो चुकी है, लेकिन अभी हम ऐसे किसी कारखानेदार को न तो किसी आदिवासी कानून के तहत गिरफ्तार होते देख रहे हैं, और न ही केन्द्र सरकार के कोई टैक्स विभाग यह छानबीन करते दिख रहे कि गरीब-आदिवासी कर्मचारी के नाम पर इन कंपनियों ने दसियों करोड़ का यह फर्जीवाड़ा कैसे किया?
छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी राज्य के लिए राज्यपाल को भी न सिर्फ विशेष अधिकार दिए गए हैं, बल्कि उन पर विशेष जिम्मेदारी भी डाली गई है। हमने पिछले कई राज्यपाल देख लिए, उनमें से किसी ने भी आदिवासियों के साथ सरकार या कारोबार द्वारा की गई ऐसी किसी ज्यादती के मामले में कोई दखल नहीं दी, बल्कि किसी भी राज्यपाल ने संविधान में की गई इस विशेष व्यवस्था का इस्तेमाल भी नहीं किया। राजभवन अगर हाथ पर हाथ धरे आदिवासियों के हक छिनते हुए देखता रहे, तो संविधान में राज्यपाल की ऐसी अनदेखी के खिलाफ कोई प्रावधान भी नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि देश-प्रदेश का लोकतांत्रिक इतिहास राज्यपालों की सक्रियता या निष्क्रियता को अच्छी तरह दर्ज करते चलता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भ्रष्टाचार, धांधली, और सरकारी जुल्म-जबर्दस्ती के बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें राज्यपाल को दखल देना ही चाहिए था, लेकिन राजभवन महज समारोहों और जलसों का दरबार हाल बनकर रह जाए, तो आदिवासी का बदहाल तो तय है ही।
छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले दिनों एक फैसला लेकर राजधानी की एक विवादास्पद कमल विहार-2 योजना को ताक पर धर दिया है। वैसे तो उसे खारिज ही कर दिया गया है, लेकिन सरकार की बहुत से लोगों को सार्वजनिक असुविधा से बचाने के लिए अभी उसे रोका गया बताया जा रहा है। यह फैसला कमल विहार-1 योजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आए एक बहुत ही लंबे और ऐतिहासिक फैसले के बाद लिया गया। किसी भी समझदार और संवेदनशील सरकार को किसी एक फैसले को लेकर कई तरह के सबक खुद भी लेना चाहिए। सरकारी पैसों से वकील लगाकर वैसे तो कोई सरकार अपने पूरे कार्यकाल तक किसी मामले को लड़ सकती है लेकिन आगे चलकर जब सरकार की किसी नीति या निर्णय के खिलाफ बड़ा फैसला आता है, तो वह उन नेताओं और अफसरों की साख को भी चौपट करता है। छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के सिंगूर-फैसले की बातों को लागू करके देखने की जरूरत है। 

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