बिना तालमेल का लोकतंत्र मुर्दा विपक्ष से फिर भी बेहतर

संपादकीय
18 सितंबर 2016
चुनाव के दो-ढाई बरस पहले छत्तीसगढ़ एक बहुत ही सक्रिय, तेज रफ्तार, और संवेदनशील राजनीति देख रहा है। कांग्रेस से अलग होने के बाद अजीत जोगी और उनके बेटे अमित जोगी को अपनी हाईवोल्टेज राजनीति को और तेज करने की एक मजबूरी है, और दूसरी तरफ जोगीमुक्त कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने की चुनौती पर खरा उतरने का बोझ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल पर है। नतीजा यह है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार के हर काम को लेकर, हर फैसले को लेकर, राज्य की हर बड़ी घटना को लेकर इन दोनों पार्टियों के बीच अपना वजूद साबित करने का जो अंतहीन मुकाबला चल रहा है, उसने राज्य की जिंदगी को बुरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
हम लोकतंत्र में ऐसी सक्रियता के खिलाफ भी नहीं हैं, और एक मुर्दा और बेअसर विपक्ष के मुकाबले ओवरटाईम करता हुआ विपक्ष बेहतर होता है, लेकिन प्रदेश की जिंदगी पर इसके कुछ दूसरे असर भी देखने मिल रहे हैं। किसी घटना के मौके पर, उसके पहले या उसके बाद, स्थानीय प्रशासन और पुलिस के जिम्मे कई किस्म की बातें आती हैं, और उस इंतजाम के बीच आज जिस तरह से इन दोनों पार्टियों के विरोध-प्रदर्शन को भी झेलना पड़ रहा है, वह पुलिस और प्रशासन के रोजमर्रा के काम को पीछे छोड़ देगा। एक अतिसक्रिय विपक्ष की वजह से सरकारी अमला अधिक चौकन्ना होने पर मजबूर तो होता है, लेकिन आम जनता की पुलिस में जो शिकायतें दर्ज रहती हैं, प्रशासन के पास जो मामले पड़े रहते हैं, वे ऐसे विरोध-प्रदर्शन के चलते हुए और पीछे छूट जाते हैं।
ऐसे में प्रदेश की डॉ. रमन सिंह सरकार पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि इन दो विपक्षों को वे कम से कम मौके दें। भारतीय जनता पार्टी को भी बहुत चौकन्ना होकर सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए अपने लोगों के बर्ताव, उनकी जुबान, उनके फैसलों, और उनकी जनछवि के बारे में सोचना होगा कि एक-एक गलत हरकत, एक-एक गलत बात का चुनाव के वक्त किस तरह का भारी चुकारा करना पड़ सकता है। वैसे तो यह बात सारी ही राजनीतिक पार्टियों पर लागू होती है, लेकिन प्रदेश में चूंकि भाजपा तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद चुनाव में जाएगी, इसलिए यह जाहिर है कि उसके मंत्री, विधायक, और दूसरे सत्तारूढ़ नेताओं की गलत हरकतें भी सामने अधिक रहेंगी, और बड़ा चुनावी मुद्दा भी बनेंगी। वैसे अतिसक्रिय विपक्ष के चलते भाजपा सरकार और उसके प्रशासन को एक मौका भी मिल रहा है कि कमर कसकर काम को सुधारे, और चुनाव के पहले के ये दो-ढाई बरस अगर सरकार-भाजपा ने अपना घर सुधारने में लगाए, तो चुनाव के वक्त उस पर मुसीबत कम रहेगी।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी देश में कांग्रेस पार्टी की बदहाली से दूर, अधिक संभावनाओं वाली है, और देश में शायद ही किसी दूसरे राज्य में कांग्रेस इतनी सक्रिय है। लगातार सत्ता से बाहर रहने के बारह से अधिक बरस के बनवास के बावजूद पार्टी आज दमखम के साथ डटी हुई है, यह एक बड़ी बात है। और जोगीमुक्त होने के बाद कांग्रेस अब एक संगठन के रूप में अधिक संभावनाओं और अधिक चुनौती दोनों के साथ काम कर रही है। अब अपनी हार के लिए न तो उसे जोगी का डर रहेगा, और न ही हार के लिए तोहमत लगाने को जोगी हासिल ही रहेंगे। ऐसे राजनीतिक माहौल में यह प्रदेश एक ऐसे लोकतांत्रिक टकराव के अगले दो-ढाई बरस देखने जा रहा है जिसमें ये तीनों ही पक्ष एक-दूसरे से किसी भी तालमेल के बिना महज टकराव से राजनीति करने वाले हैं। बिना तालमेल का लोकतंत्र नुकसानदेह होता है, लेकिन वह मुर्दा विपक्ष से फिर भी बेहतर होता है।

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