अपने पुराने जुमलों को भूलकर पाक पर ठंडे दिल से सोचा जाए

संपादकीय
19 सितंबर 2016
कश्मीर में भारतीय सेना पर आतंकी हमले में अब तक 20 लोगों की शहादत की खबर आ चुकी है और दिल्ली में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बैठकें चल रही हैं। पहली नजर में इस हमले के पीछे सरहद पार पाकिस्तान की जमीन से आए हुए हमलावरों का हाथ दिखता है, और इसके पीछे पाकिस्तान की सरकार है, वहां की फौज है, या कि वहां के आतंकी संगठन हैं, यह अभी साफ नहीं हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच इस बात को लेकर एक लंबा मतभेद चलते रहता है कि मुंबई हमलों से लेकर पठानकोट के हमलों तक, और अब कश्मीर के उरी में हुए इस ताजा हमले तक के पीछे पाकिस्तान का सरकारी हाथ है, या कि वहां की जमीन से काम करने वाले और गैर-स्टेट कहलाने वाले कुछ और संगठनों का हाथ है। सवाल यह है कि जब किसी एक देश की जमीन से पड़ोस की जमीन पर लगातार ऐसे हमले होते हैं, तो वह जख्मी देश क्या करे?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए विपक्ष में रहते हुए ऐसी नौबत से जूझना अधिक आसान था। उन्होंने अनगिनत बार एक के बदले दस सिर काटकर लाने की घोषणा की थी, और उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ऐसे हमलों के बारे में देश की जनता को यकीन दिलाया था कि मोदी प्रधानमंत्री रहेंगे तो भारत ऐसे हमलों के जवाब में पाकिस्तान में घुसकर हिन्दुस्तानी झंडा फहराकर आएगा। ऐसी बहुत सी बातें युद्धोन्माद के चलते होती हैं, और किसी सरकार के खिलाफ चुनाव में जनभावनाओं को भड़काने के लिए भी की जाती हैं। हम ऐसे मौके पर मोदी सरकार को उनके विपक्ष-कॉल के नारों की याद दिलाकर उकसाना नहीं चाहते हैं क्योंकि बहुत से मामलों में यह सरकार बार-बार यह भी बोल रही है कि उसकी कही बातें महज जुमला थीं, और उनका कोई खास मतलब नहीं था। ऐसे जुमले की तरह पाकिस्तान के खिलाफ कही गईं हमलावर बातें याद दिलाने का यह मौका इसलिए नहीं है कि लोकतंत्र में जब विपक्ष सत्ता में आता है, तो सत्ता की जिम्मेदारियों से उसके तेवर बदल जाते हैं, और बदल भी जाने चाहिए।
आज भारत में आम जनता के बीच यह सोच अपने आप भी हो सकती है, और लोग भड़काकर ऐसी सोच को बढ़ाना भी चाह सकते हैं कि भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए। यह बात अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों को देखते हुए तर्कसंगत और न्यायसंगत भी लग सकती है क्योंकि अमरीका जैसे देश अपने पर हुए आतंकी हमले के जवाब में दुनिया के बेकसूर देशों को भी तबाह करते हुए संयुक्त राष्ट्र की बात भी अनसुनी करते रहे। भारत भी पाकिस्तान की जमीन पर चल रहे आतंक के ट्रेनिंग कैम्प तबाह करने के लिए एक हमला करने का हक इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन ऐसा करने के पहले यह भी याद रखना पड़ेगा कि 20 मौतों के ऐसे बदले लेते हुए हो सकता है कि 20 हजार और लोगों की मौत की नौबत आ जाए। और ये मौतें सरहद के एक तरफ हों, ऐसा भी नहीं है, वे दोनों तरफ हो सकती हैं, होगी, और किसी भी जंग को एक आखिरी रास्ता ही मानना चाहिए।
भारत में पिछले कुछ बरसों में अमरीका के साथ अपना जिस तरह का घरोबा बढ़ाया है, उसके चलते आज उसे एक ऐसी नौबत हासिल है कि वह अमरीका पर जोर डालकर पाकिस्तान को मिलने वाली मदद को घटवाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि जो बात हम कह रहे हैं वह उतनी आसान इसलिए नहीं है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमरीका को यह भी देखना होगा कि पाकिस्तान की मदद से अगर उसने हाथ खींचा, तो पाकिस्तान चीन की गोद में ही पहुंच जाएगा। लेकिन आज भारत के सामने कई किस्म की दुविधाएं हैं। पाकिस्तान के साथ अमरीका और चीन के अलग-अलग रिश्तों को अनदेखा करके भारत अपनी आबादी के युद्धोन्मादी हिस्से को खुश करने के लिए हमले के विकल्प को आसानी से नहीं चुन सकता। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है और वहां की फौज सरकार के काबू के बाहर है, खुद सरकार लाचार है, और सरकार-फौज का कुछ हिस्सा आतंकियों का मददगार है। ऐसे में वहां के परमाणु हथियारों को देखते हुए किसी भी तरह की जंग में कैसे खतरे हो सकते हैं, यह समझना बहुत आसान नहीं है। इसलिए भारत को ऐसे मौके पर अपने ही पुराने नारों और जुमलों को अनदेखा करते हुए इस पूरे इलाके की भलाई के लिए फैसला लेना होगा, और हमारा ख्याल है कि वह युद्ध से परे का ही रहना चाहिए। जब तक बिना जंग के नौबत सुधर सकती है, या काबू में आ सकती है, तब तक जंग की बात नहीं करनी चाहिए। सरहद के दोनों तरफ फौजी विकल्प पर अपार भरोसा करने वाले जंगखोर लोग हैं, और उनके लिए ऐसा कोई भी हमला एक नया जोश लेकर आता है।
लेकिन इस मौके पर पाकिस्तान को यह समझने की जरूरत है कि भारत के साथ उसकी जमीन से इस तरह के हमले पाकिस्तान का कोई भला नहीं करने वाले। किसी जंग की नौबत लाने में हथियारों के कारखानेदारों की बड़ी दिलचस्पी हो सकती है, और दोनों देशों में मीडिया से लेकर राजनीति तक, और रिटायर्ड फौजियों से लेकर आतंकियों तक कई बड़बोले बकवासी ऐसे हथियार-कारखानों से महीना भी पाते हो सकते हैं। इसलिए ऐसा कोई हमला भाड़े के हमलावर भी कर सकते हैं, और इसे सोचते हुए भी फैसला लेना चाहिए। फिलहाल भारत बहुत ही विचलित है, और भड़की हुई जनभावनाओं को देखते हुए भारत कोई असंतुलित फैसला भी ले सकता है।

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