फोन-इंटरनेट ग्राहकों की जिंदगी में एक बड़ा फर्क

संपादकीय
2 सितंबर 2016
भारत के टेलीफोन-इंटरनेट उद्योग में बड़े अम्बानी ने कल जो धमाका किया है, वह देश भर के कोने-कोने में पूरी-पूरी रात लोगों की गैरजरूरी बातचीत की शक्ल में आगे जिंदगी भर गूंज सकता है। दरअसल दुनिया में खुले कारोबार में ऐसा ही होता कि कोई कारोबारी धंधे के सारे तौर-तरीके एक पल में बदल सकते हैं, और लोगों की जिंदगी भी। कल तक लोग फोन पर बात करते हुए यह सोचते थे कि महीने का बिल कितना आएगा, आज मुकेश अम्बानी की कंपनी ने इस कारोबार में टेलीफोन पर बातचीत को मुफ्त कर दिया है, बस इंटरनेट से डाटा इस्तेमाल करने का एक पैकेज लेना होगा। इससे हिन्दुस्तानी मोबाइल-ग्राहकों या इंटरनेट-ग्राहकों के खर्च पर जो फर्क पडऩा है, वह तो आने वाले दिनों में सामने आएगा, लेकिन अगर रिलायंस के इस दावे की तरह बातचीत सस्ती हो जाती है, तो सामाजिक अंतरसंबंधों में भी एक बड़ा फर्क आएगा। अभी तो महज प्रेमी-प्रेमिका या मां-बेटी के बीच ऐसी लंबी बातचीत होती हैं, लेकिन बातचीत पूरी तरह से मुफ्त हो जाने से लोग क्या करेंगे यह अंदाज लगाना मुश्किल है।
दरअसल टेक्नालॉजी ने दुनिया के समाज पर जितने किस्म के फर्क डाले हैं, उतने तरह के फर्क समाज अपने नियम-कायदों से भी नहीं डाल पाता। लोगों का मिजाज टेक्नालॉजी और उसके कारोबार से तय होता है, और हाल के दस-बीस बरसों को देखें तो लोगों के सामाजिक संबंध, दोस्तों का दायरा, यह सब कुछ इस बात पर आ टिका है कि लोगों की फोनबुक मेंं किनके नाम हैं, किनके नहीं, किनको एसएमएस किया जा सकता था, वहां से बात अब इस पर आ टिकी है कि किसको वॉट्सऐप किया जा सकता है, और किसको नहीं। कौन लोग फेसबुक पर दोस्त हैं, और कौन नहीं, इस पर भी लोगों के दोस्तों का दायरा तय होने लगा है। कुछ-कुछ ऐसा हो गया है कि जो लोग आपके वॉट्सऐप की लिस्ट में नहीं हैं, वे मानो आपकी असल जिंदगी में भी अब आपके दोस्त नहीं रह गए हैं, और ऐसी लिस्ट में जो लोग हैं, उनके साथ बातचीत, हंसी-मजाक, इन सबका बढ़ते चलना देखने लायक है।
अब इससे परे जिस दूसरी बात को बड़े अम्बानी की कंपनी भुना रही है, वह है लोगों की जिंदगी के शौक से लेकर, कारोबार तक, और पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक इंटरनेट की जरूरत। मुकेश अम्बानी ने यह एक नया फार्मूला निकाला है कि लोग डाटा के लिए भुगतान करें, और बातचीत मुफ्त में करें। बाजार में कभी-कभी पहले भी ऐसा हुआ है कि टायर खरीदो, और उसके साथ पेजर मुफ्त। अखबार खरीदो और उसके साथ हीरों का हार या कुर्सी मुफ्त। लोगों को यह समझ नहीं पड़ता था कि पांच सौ रूपए सालाना खर्च करके एक पत्रिका खरीदने पर पन्द्रह सौ रूपए का बैग कैसे मुफ्त मिल सकता है। लेकिन अब मुकेश अम्बानी बाजार में चिटफंड कंपनी की तरह धोखा देकर भाग जाने वाले कारोबारी नहीं हैं, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उनकी यह नई तरकीब शायद लंबी जिंदगी जिए, और कारोबार के तौर-तरीकों को बदल ही दे। इंटरनेट की जरूरत, और इंटरनेट का शौक, ये इतनी रफ्तार से हिन्दुस्तानी लोगों पर भी हावी होते चल रहे हैं कि अम्बानी को इसमें एक टकसाल दिख रही है।
इंटरनेट के साथ एक यह बात तो है ही कि उसने सूचना पाने के संपन्न तबके के एकाधिकार को तोड़कर इसे एक लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में दुनिया के सामने रखा है। अब भारत में संचार कंपनियां अगर इस नई कारोबारी चुनौती को देखते हुए अगर रेट गिराती हैं, अपनी सेवाओं को सुधारती हैं, तो देश के लोगों का फायदा हो सकता है। फिलहाल हम न तो रिलायंस कंपनी के प्रचार के लिए यह लिख रहे हैं, और न ही भारत के फोन-इंटरनेट ग्राहकों की जिंदगी में आने वाले एक बड़े फर्क को अनदेखा करना चाहते हैं, इसलिए इस पर लिखना तो है ही। लेकिन यह सिलसिला बाजार और ग्राहक को कहां तक पहुंचाता है, लोगों की जिंदगी में इससे क्या फर्क पड़ता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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