अमिताभ का दिमाग सचमुच खाली है...

संपादकीय
20 सितंबर 2016
महिला अधिकारों पर बनी हुई एक फिल्म के प्रमोशन के दौरान अमिताभ बच्चन कभी अपनी नातिन और पोती को खुली चिट्ठी लिखकर परोक्ष रूप से अपनी आने वाली फिल्म का प्रचार करते हैं, तो कभी टीवी चैनलों पर जाकर प्रत्यक्ष रूप से फिल्म को बढ़ावा देते हैं। अब अभी अमिताभ ने कहा कि कुछ मामलों में महिलाएं भी उन कानूनों का गलत इस्तेमाल करती हैं जो उनकी हिफाजत के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि कई ऐसे मामले होते हैं जहां महिलाएं उन कानूनों का बेजा इस्तेमाल करती हैं जो बलात्कारियों या छेडख़ानी करने वालों की सजा के लिए बने हैं। उन्होंने कहा कि उनके कई दोस्तों ने भी उन्हें बताया है कि उन्हें किस तरह ऐसे बेजा इस्तेमाल का सामना करना पड़ा।
अभी दो दिन पहले ही बड़बोले जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अमिताभ के बारे में कहा था कि उनका दिमाग खाली है। और आज बेमौके की ऐसी बात को करते हुए लगता है कि सचमुच ही अमिताभ का दिमाग खाली है। उनका दिल खाली है यह बात तो हम बरसों से लिखते आ रहे हैं क्योंकि अपनी ससुराल के शहर भोपाल में चौथाई सदी पहले जो यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी हुई थी, उसकी हजारों मौतों, और लाखों मुश्किल जिंदगियों के लिए अमिताभ बच्चन ने न कभी कुछ किया, न ही मुंह खोला। जबकि वे बीच के कुछ बरसों में राजनीति में भी आ चुके थे, और उनकी एक सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बनती थी। इसके बाद उत्तरप्रदेश से लेकर गुजरात तक बहुत से ऐसे सार्वजनिक मामले रहे जिनमें सरकारें कटघरों में खड़ी रहीं, लेकिन अमिताभ इन प्रदेशों के ब्रांड एम्बेसडर बने हुए इनका प्रचार करते रहे, यहां के जख्मी लोगों के बारे में उनका मुंह नहीं खुला। आज जब एक फिल्म के प्रचार के लिए वे आयोजित और प्रायोजित कार्यक्रमों में बोल रहे हैं, तब भी उन्होंने महिला रक्षा कानूनों के बेजा इस्तेमाल का एक ऐसा मुद्दा छेड़ा है जो कि अपवाद की तरह होता है। जब हजारों महिलाएं जुल्म का शिकार हो चुकी रहती हैं, तो शायद कोई दो-चार महिलाएं ऐसे कानून का बेजा इस्तेमाल करती होंगी, और उसे इस तरह से गिनाने का मतलब देश की महिलाओं की बदहाली को कम करके दिखाना है। महिला को ऐसे मौके पर एक साजिश में भागीदार बताकर अमिताभ बच्चन खुद भी महिला पर ज्यादती के कुसूरवार बने हैं।
यह बात सही है जो जस्टिस काटजू ने कही है कि एक वक्त राजा अपनी प्रजा को मुगालते में रखने के लिए, झांसे में रखने के लिए और बेचैनी से दूर रखने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते थे। अब आज के वक्त में भारत जैसे लोकतंत्र में लोग अपनी तकलीफों को भूल जाएं, इसके लिए फिल्म, क्रिकेट, टीवी सीरियल, और सेक्स स्कैंडलों का इस्तेमाल किया जाता है। देश की जनता आधे पेट खाकर पूरे-पूरे घंटे के टीवी सीरियल देख लेती है, अखबारों में फिल्म अभिनेत्रियों के उघड़े हुए बदन और उनके सेक्स संबंधों को पढ़ लेती है, और टीवी के कई-कई चैनलों पर दिन-दिन भर क्रिकेट भी देख लेती है। अमिताभ बच्चन एक ऐसे ही कारोबार का हिस्सा हैं जो कि अफीम की तरह समाज को एक झांसे में रखता है, उसे हकीकत का एहसास नहीं होने देता। जो आदमी अपने परिवार की निजी जिंदगी के लिए लोगों पर नाराज भी हो जाता है, वही आदमी अपनी एक फिल्म के प्रमोशन के लिए अपनी नातिन और अपनी पोती को लिखी गई निजी चिट्ठी को वीडियो कैमरों के सामने सार्वजनिक भी करता है। इससे जस्टिस काटजू की बात सही साबित होती है कि अमिताभ खाली दिमाग वाले इंसान हैं, कम से कम सामाजिक सरोकारों के लिए। हमने उनका दिल तो पहले ही खाली पाया है, और उनकी जेब कितनी भरी हुई है, यह सभी लोग जानते हैं। इसलिए ऐसे कारोबारी को जब राष्ट्रपति बनाने की चर्चा होती है, तो लगता है कि पहले ये सार्वजनिक सवाल किए जाने चाहिए कि देश के जलते-सुलगते मुद्दों पर इतनी पहाड़ सी जिंदगी में अमिताभ बच्चन ने कब मुंह खोला, और क्या कहा, क्या किया?

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