कंधों पर बीमार और लाश की अनगिनत कहानियां...

संपादकीय
21 सितंबर 2016
एक बार मीडिया में किसी किस्म की खबरें आना शुरू होती हैं, तो बाकी जगहों पर मीडिया के बाकी लोगों का ध्यान भी उस तरह जाता है, और फिर वैसे मामलों का सैलाब सा आ जाता है। पिछले एक महीने में देश के अलग-अलग बहुत से हिस्सों से ऐसी खबरें आईं कि एम्बुलेंस न मिलने पर किस तरह टांगकर पहुंचाया गया, रास्ते में कैसे मौत हो गई, और किस तरह लाश को घर ले जाने के लिए कोई गाड़ी न मिली, तो कंधे पर लादकर पति किस तरह रोती हुई बेटी के साथ निकल पड़ा। ऐसे मामले दिल हिला देते हैं, लेकिन अकेली सरकार को तोहमत देना जायज नहीं है।
यह न सिर्फ ओडिशा की बात है, या बस्तर और सरगुजा की बात है, बल्कि देश के बहुत से हिस्सों में ऐसा होता है कि बीमार को, सड़कों पर जख्मी पड़े लोगों को अस्पताल पहुंचाने में लोग नहीं मिलते। कई जगह के सड़कों के कैमरे बताते हैं कि कैसे जख्मी के पड़े-पड़े बगल से दर्जनों गाडिय़ां निकल गईं, और लोग रूके नहीं। किसी भी जगह सरकार अकेले सारा इंतजाम नहीं कर सकती। और समाज की अपनी एक जिम्मेदारी भी होती है, क्योंकि समाज के लोग सरकार से अपने अधिकारों की मांग भी करते हैं, और उम्मीद भी रखते हैं। जब सरकार से हक चाहिए, तो वे बिना किसी जिम्मेदारी के नहीं मिल सकते। इसलिए सरकारी एम्बुलेंस आ रही है तब तो ठीक है, लेकिन अगर सरकारी एम्बुलेंस नहीं पहुंच रही है, तो हर नागरिक की यह कानूनी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे जख्मी को अस्पताल पहुंचाएं। भारत के कानून में भी जंगल की आग को बुझाना हर नागरिक की कानूनी जिम्मेदारी तय की गई है, और कानून के मुताबिक जंगल कर्मचारी लोगों को इसके लिए शायद बेबस भी कर सकते हैं। हमारा यह मानना है कि जख्मी को छोड़कर आगे निकलने वाले लोगों पर एक बड़े जुर्माने और उनका ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित करने का एक कानून बनना चाहिए। किसी भी लोकतंत्र और सभ्य समाज में ऐसे लोग बिना जुर्माने नहीं रहने चाहिए।
छत्तीसगढ़ में यह देखा हुआ है कि सरकारी एम्बुलेंस सेवा ने धीरे-धीरे काफी फर्क दिखाया है। अब जख्मी या बीमार के लिए अधिकतर मामलों में गाडिय़ां समय पर पहुंच जाती हैं। लेकिन एम्बुलेंस से जुड़ा हुआ ही मामला इलाज का भी है। सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पतालों, दोनों ही जगहों पर पहुंचने वाले जख्मी और बीमार के साथ तरह-तरह की बदसलूकी बहुत ही आम बात है। और यह जाहिर है कि बीमार या जख्मी के साथ पहुंचने वाले लोग भी मानसिक यातना से गुजरते हुए परेशान लोग रहते हैं, और ऐसे में एक गर्भवती को अस्पताल से भगा दिया जाए, जैसा कि कोरबा में दो दिन पहले हुआ है, तो उसके बाद लोग अस्पतालों में मारपीट न करें तो क्या करें? और छत्तीसगढ़ में अस्पतालों में तोडफ़ोड़ या मारपीट करने के खिलाफ एक बड़ा कड़ा कानून भी बनाया हुआ है, इसे कहते हैं कि जबरा मारे भी और रोने भी न दे।
सरकार को अपने और निजी क्षेत्र के अस्पतालों के तौर-तरीकों में सुधार लाने के लिए स्वास्थ्य विभाग से परे के लोगों को भी लगाना चाहिए, जो कि बाहरी निरीक्षकों की तरह वहां जाकर निगरानी रख सकें। इसके लिए जरूरत हो तो आसपास के महिला मंडलों, रिटायर्ड बुजुर्ग लोगों को भी अधिकृत निरीक्षक का एक अवैतनिक दर्जा दिया जा सकता है, और उनकी रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है। किसी भी देश-प्रदेश का विकास वहां पर कांक्रीट के निर्माण से तय नहीं होता, वह इससे तय होता है कि वहां सरकार सबसे कमजोर, सबसे गरीब, सबसे जरूरतमंद के अधिकारों की कितनी गारंटी कर सकती है। इस बारे में राज्य सरकारों को तुरंत सोचकर सामाजिक तबकों के साथ मिलकर योजना बनानी चाहिए, और समाज को भी हाथ बंटाने के लिए कहना चाहिए।

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