दिल्ली के इतने विधायकों पर कार्रवाई, गलती कहां पर है?

संपादकीय
22 सितंबर 2016
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विधायक संसदीय सचिव बनकर सहूलियतें पाने के मामले में वैसे भी विधानसभा सदस्यता से अपात्र होने की कगार पर हैं, दूसरी तरफ वे अलग-अलग किस्म के मामलों में पुलिस में भी फंस रहे हैं, और गिरफ्तार भी हो रहे हैं। यह बात तय है कि केजरीवाल-सरकार जिस तरह से मोदी सरकार से सांप-नेवले जैसे संबंध रख रही है, और दोनों के बीच अंतहीन-स्थायी टकराव दिन में चार बार होने का सिलसिला चल रहा है, उसके चलते केन्द्र सरकार के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस से केजरीवाल के विधायक किसी रियायत की उम्मीद नहीं कर सकते। बहुत से मामलों में राजनीतिक बदला लेने की तोहमत न लगे इसलिए कई सरकारें विपक्षी नेताओं के साथ भी रियायत बरतती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली में मोदी सरकार की पुलिस को ऐसी कोई फिक्र नहीं है। ऐसा भी नहीं कि हम ऐसी रियायत के हिमायती हों, हमारे हिसाब से तो राजनीतिक या सरकारी, या संवैधानिक, या कारोबारी, जैसी भी ताकतवाले लोग हों, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, और हम तो इसी जगह कई बार ऐसे लोगों के लिए अधिक कड़ी सजा का इंतजाम करने की मांग कर चुके हैं। लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी के इतने अधिक विधायकों पर कानूनी कार्रवाई से दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि आम आदमी पार्टी के विधायक राजनीति में पहली बार चुनकर आए हैं, और ऐतिहासिक बहुमत के साथ जीत और सरकार में उनके दिमाग आसमान पर कर दिए हैं। और दूसरी बात यह कि मोदी सरकार इनको निपटाने का कोई मौका छोडऩा नहीं चाहती है।
अब सवाल यह है कि अगर कोई मौका खड़ा ही नहीं होगा, तो क्या मोदी सरकार की पुलिस किसी के घर घुसकर झूठा मुकदमा खड़ा कर रही है? अभी दो दिन पहले एक आप विधायक गिरफ्तार किया गया जिस पर उसकी एक रिश्तेदार महिला ने ही किसी यौन अपराध की शिकायत दर्ज कराई थी। आज एक दूसरे विधायक सोमनाथ भारती की गिरफ्तारी की खबर है जिन पर एम्स के सुरक्षा कर्मचारी से बदसलूकी का आरोप है। इसी तरह बहुत से आप विधायकों पर अलग-अलग तबकों के लोगों ने आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। सोमनाथ भारती जब मंत्री थे तब उन्होंने दिल्ली में रह रहीं अफ्रीकी महिलाओं के साथ बदसलूकी की थी, और तब तो शायद दिल्ली पुलिस यूपीए सरकार के मातहत थी, और मोदी सरकार सत्ता में आई भी नहीं थी। मोदी बदला लेने के लिए कुछ नहीं कर सकते, ऐसा हमारा बिल्कुल भी मानना नहीं है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनको अपना खुद का बर्ताव, और चाल-चलन ऐसा रखना चाहिए कि वह किसी जुर्म के दायरे में न आए। अब दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल अभी एक दूसरे मामले में अदालत के कटघरे में हैं कि उन्होंने दिल्ली पुलिस को एक अपमानजनक शब्द, ठुल्ला, कहा था, और अब अदालत में उनसे यह जवाब देते नहीं बन रहा कि इस शब्द का मतलब क्या है, और उन्होंने पुलिस के लिए इसका इस्तेमाल क्यों किया?
अभी दिल्ली महिला आयोग में आम आदमी पार्टी की एक महिला नेता के खिलाफ पुलिस ने बहुत सी नौकरियां देने में गड़बड़ी के आरोप में जुर्म दर्ज किया है, और इस मामले में केजरीवाल का नाम भी जोड़ दिया गया है। पल भर में केजरीवाल की प्रतिक्रिया थी कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहने से किया गया है। हमारा यह मानना है कि सरकारी या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को आरोप बाद में लगाना चाहिए, पहले खुद पर लगे हुए आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। तथ्य तो धरे रह जाते हैं, विशेषणों में बात होने लगती है। अगर कोई तथ्य या सुबूत आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ नहीं हैं, तो भारत की अदालतें बहुत से मामलों में पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों के खिलाफ भी बहुत कड़ी बातें कहते आई हैं, और हो सकता है कि दिल्ली पुलिस भी अदालत की ऐसी फटकार पाए, अगर उसने आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे गढ़े हैं। लेकिन फिलहाल केजरीवाल और उनके साथियों को यह सोचना चाहिए कि क्या उनके लोगों में कोई ऐसी कमियां या खामियां हैं कि जिनके चलते उनके खिलाफ ऐसी शिकायतें हो रही हैं, और मामले मुकदमे की नौबत आ रही है? ऐसा न करके सिर्फ राजनीतिक बदले का आरोप लगाकर केजरीवाल अपने लोगों को और लापरवाह बना रहे हैं, वे खुद भी ऐसे आरोपों के साए में अपनी लापरवाही के साथ चैन से बैठे हैं। लेकिन पूरे पांच बरस रात-दिन आरोपों से किसी भी पार्टी की सरकार, या राजनीति नहीं चलती। इस सोच और सिलसिले का नुकसान ऐसे लोगों को होता ही है।

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