यह वक्त वीर रस का युद्धोन्माद फैलाने का नहीं, गरीब देशों में जंग का खतरा समझने का है..

संपादकीय
23 सितंबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कुछ तो बढ़ रहा है और कुछ बढ़ाने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान के एक अखबारनवीस ने यह लिखा कि वहां के आसमान पर बीती रात लड़ाकू विमान उड़ते हुए दिखे। इसे लेकर भारत में भी तनाव खड़ा हुआ है, और मीडिया के कुछ भरोसेमंद और जिम्मेदार तबकों की भी यह खबर है कि भारत में सरहद की तरफ तोपखाने तैनात करना शुरू कर दिया है। उधर महाराष्ट्र से खबर है कि घोर साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पाकिस्तानी कलाकारों को धमकी दी है कि वे भारत छोड़कर चले जाएं वरना उन्हें मार-मारकर भगा दिया जाएगा।
भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकी और फौजी तनाव खड़ा करने में सरहद के दोनों तरफ के कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक, आतंकी, युद्धोन्मादी, और कुछ फौजी अफसरों को हमेशा ही मजा आता है। इनमें से कोई भी सरहद पर जाकर जंग लडऩे वाले लोगों में से नहीं हैं। और दोनों तरफ के टीवी चैनलों पर जो बुढ़ा चुके फौजी जनरल युद्ध के लिए चीखते हैं, उन्होंने भी कभी अपनी जिंदगी में सरहद का खतरा नहीं झेला है, और कम से कम आज तो उस खतरे से दूर ही हैं। ऐसे में पाकिस्तान का एक पोस्टर सामने आया है जो वहां के एक रेस्त्रां पर लगा है, और जिस पर लिखा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव घटाने के लिए पाकिस्तान आए हुए हिन्दुस्तानियों को उनका वीजा दिखाने पर तोहफे में खाना खिलाया जाएगा। जब जंग की बातें होती हैं तो दोनों तरह के लोग दोनों तरफ सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में अगर अमन-पसंद लोग घर बैठ जाएंगे, तो गुंडाई और आतंकियों की बन पड़ेगी। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि अखबारों से लेकर बाकी मीडिया तक और राजनीति से लेकर अर्थशास्त्र तक के लोगों तक यह समझने की जरूरत है कि कोई भी जंग मुफ्त में नहीं होती है, और भारत और पाकिस्तान में अनगिनत आबादी कुपोषण के शिकार ऐसे बच्चों की है, इलाज के बिना दम तोड़ते ऐसे गरीबों की है, जो किसी भी जंग का सबसे बड़ा शिकार होंगे, और जिनसे रोटी, कपड़ा, मकान, इलाज, पढ़ाई यह सब कुछ छिन जाएगा। आज ही एक अर्थशास्त्री का यह विश्लेषण आया है कि अगर यह जंग होती है तो भारत की अर्थव्यवस्था दस बरस पीछे चली जाएगी।
जंग की बात वे लोग करते हैं जो पांच सितारा अस्पतालों में अपना इलाज कराते हैं, वे लोग करते हैं जो करोड़ों का काला धन चुनाव में खर्च करते हैं, वे लोग करते हैं जो हथियारों के कारखानेदारों से दलाली पाते हैं। दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान जैसे कल तक के भाई-भाई देशों में तमाम गरीब और तमाम अमन-पसंद लोग किसी भी जंग की बात का खतरा और नुकसान अच्छी तरह जानते हैं, और अच्छी तरह समझते हैं। आज भी दोनों देशों में बहुत से समझदार लोग लगातार यह दिख रहे हैं कि फौजी हमले या जंग से परे कौन सी ऐसी तरकीबें हैं जिनसे दोनों देशों के बीच बातचीत हो सकती है, या कि भारत पाकिस्तान पर दबाव बना सकता है। यह समय है जब जिम्मेदार तबका अपनी बातचीत में भी सावधान रहे, और लोकतंत्र की समझ से परे वीर रस की जो कविताएं लिखी गई हैं उन कविताओं को चारों तरफ फैलाकर एक उग्र राष्ट्रवादी युद्धोन्माद न फैलाएं। 

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