हैवानियत की खबर अगली हैवानियत सामने आने तक

संपादकीय
24 सितंबर 2016
जिंदगी में जिन लोगों को अपनी दुख-तकलीफ से बहुत सी शिकायतें हों, उनका एक इलाज तो मनोचिकित्सक कर सकते हैं। और उनका दूसरा अवैज्ञानिक, गैरमेडिकल इलाज भी है, कि उन्हें किसी सरकारी अस्पताल में कुछ दिन तक रोज चक्कर लगाने के लिए कहा जाए। वहां जब वे लोगों की दुख-तकलीफ को देखेंगे, तो उनका सारा दर्द जाता रहेगा। झारखंड की राजधानी रांची अपने साथ बनी बाकी दोनों प्रदेशों की राजधानियों के मुकाबले अधिक सुविधा-संपन्न थी, क्योंकि वह बिहार में पहले से उपराजधानी का दर्जा पाई हुई थी। लेकिन वहां के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जिस तरह एक जख्मी गरीब मरीज महिला को फर्श पर खाना दे दिया गया कि वहां बर्तनों की कमी है, तो लगता है कि हैवानियत के अच्छे दिन आ गए हैं। इंसानियत के चेहरे से मुखौटा हटा हुआ सा लगता है, और अस्पताल के बड़े-बड़े अफसरों से लेकर खाना बांटने वाले छोटे कर्मचारियों तक का असल चेहरा इससे उजागर हुआ है।
कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह अस्पतालों से लाशों को ले जाने, बीमारों को अस्पताल लाने, और इलाज के लिए दाखिला देने या न देने में जो हैवानियत सामने आती है, उसके बारे में लिखा था। और इतनी जल्दी एक तस्वीर, इस एक मामले की वजह से फिर लिखना पड़ रहा है। झारखंड आदिवासियों की अधिक आबादी वाला एक ऐसा राज्य है जो कि खनिजों की वजह से अमीर होते हुए भी गरीब राज्य है, गरीबों का राज्य है। ऐसा नहीं होता तो यहां के लोग भी इलाज के लिए निजी अस्पतालों में गए होते, और सरकारी अस्पताल में न आए रहते। सरकारी अस्पताल चाहे वे झारखंड के हों, या कि छत्तीसगढ़ के, उनकी बदहाली से एक बात साफ है कि सत्ता पर बैठे हुए लोग कभी भी इन अस्पतालों में एक आम मरीज की तरह पांव भी नहीं रखते। छत्तीसगढ़ में तो हमने कई राज्यपालों और मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी इलाज या जांच के लिए राजधानी के, प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचते देखा है। और कभी-कभी हो सकता है कि कोई मंत्री या अफसर भी यहां पहुंचे हों। लेकिन उनके लिए जिस तरह का इंतजाम पहले से किया जाता है, उससे इसकी गारंटी हो जाती है कि उन्हें आम मरीज जैसा कुछ भी न भुगतना पड़े। इसका यह नतीजा होता है कि सरकारी अस्पताल कभी नहीं सुधर पाते।
देश के सरकारी अस्पतालों में अमूमन गरीब ही जाते हैं, न तो उनकी राजनीतिक पहुंच होती है, और न ही वे आसानी से सरकारी अस्पतालों में प्रचलित रिश्वत दे पाते हैं। नतीजा यह होता है कि वे हर जांच के लिए, इलाज के लिए, और ऑपरेशन के लिए ऐसी अंतहीन कतार में लग जाते हैं, कि जो इंसानियत से परे की होती है। आमतौर पर न्याय व्यवस्था को लेकर यह बात कही जाती है कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता है। लेकिन क्या देर से मिला इलाज, इलाज कहा जा सकता है? यह जाहिर है कि जब वक्त पर इलाज नहीं मिलता है, तो मर्ज बेकाबू हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में हम कई बार यह सुनते हैं कि एड्स जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी के मरीजों को भी समय पर दवा नहीं मिल पाती है क्योंकि उसकी खरीदी समय पर नहीं हो पाई है। ये बीमारियां ऐसी हैं कि जिनमें समय पर दवा न मिले तो बदन में बीमारी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेती है। अब रांची के अस्पताल में फर्श पर महिला को खाना दिया गया है, उसे खाने के साथ-साथ किस तरह की गंदगी, और किस तरह की बीमारी और मिल जाएगी, इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। हमको तो लगता है कि ऐसी नौबत आने पर बड़े-बड़े मंत्रियों और अफसरों को शर्म खाकर इस्तीफा दे देना चाहिए, और अदालतों को खुद होकर मुकदमा दर्ज करके ऐसे अस्पतालों के इंतजाम देख रहे मंत्री-अफसर की तनख्वाह भी काटनी चाहिए, उन्हें प्रतीकात्मक सजा भी देनी चाहिए।
फिलहाल दो दिनों तक मीडिया इन खबरों से भरा हुआ है, तब तक ही भरा रहेगा जब तक कि इंसान कहे जाने वाले लोगों की हैवानियत कही जाने वाली कोई अगली हरकत सामने नहीं आएगी, और हमारा तजुर्बा कहता है कि उसमें अधिक देर नहीं है।

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