मोदी अपने ही कल के कद से बहुत ऊंचे होते हुए दिख रहे

संपादकीय
25 सितंबर 2016
भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के मुद्दे पर हफ्ते भर की अपनी चुप्पी तोड़ी, और भारत पर चल रहे आतंकी हमलों के बीच पाकिस्तान की जनता और वहां की सरकार को एक किस्म से यह चुनौती दी कि पाकिस्तान के नेता हजार साल तक लडऩे की बात करते हैं, तो वह चुनौती वे मंजूर करते हैं लेकिन यह लड़ाई दूसरे मोर्चे पर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सरकार आपको गुमराह करने के लिए हिन्दुस्तान से 1000 साल तक लडऩे की बात करती है। आज दिल्ली में ऐसी सरकार बैठी है कि आपकी इस चुनौती को स्वीकार करती है। भारत लडऩे के लिए तैयार है। आओ लड़ते हैं देखें पहले अपने देश की गरीबी कौन खत्म करता है। पहले बेरोजगारी पहले कौन खत्म करता है। दोनों देश अशिक्षा को खत्म करने के लिए लड़ें, देखें पहले कौन अशिक्षा से पार पाता है। आओ नवजात शिशुओं को बचाने की लड़ाई लड़ें।
पूरा देश मोदी की प्रतिक्रिया की तरफ ध्यान से देख रहा था, और यह देर से आई, लेकिन दुरूस्त आई। आज पाकिस्तान के मोर्चे पर मोदी अगर पल भर को जंग का ऐलान कर देते, तो वे देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के हीरो बन जाते। लेकिन इतिहास उन्हें एक गैरजिम्मेदार के रूप में दर्ज करता। आज मोदी ने अपने पर काबू पाकर, और जनता के लिए एक लुभावने जंग के ऐलान से बचकर अपने को अधिक बड़ा साबित कर दिया है। सोशल मीडिया पर आमतौर पर मोदी के आलोचक रहने वाले लोग और वामपंथी सोच रखने वाले लोग भी मोदी की सहनशीलता और उनके इस बयान की तारीफ कर रहे हैं, जो कि राष्ट्रवादी-हिंदूवादी फतवापरस्ती से परे का है, और एक बहुत जिम्मेदारी की बात करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच इसी एक सोच की गुंजाइश रहनी चाहिए, क्योंकि लड़ाई तो आसान है, और उसकी कीमत भुगतना मुश्किल है। हमने अभी-अभी कुछ अर्थशास्त्रियों का यह अंदाज इसी जगह लिखा भी था कि पाकिस्तान के साथ एक जंग भारत को दस बरस पीछे ले जाएगी। यह जाहिर है कि वह पाकिस्तान को और भी अधिक पीछे ले जाएगी, क्योंकि वह आज भी सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर अपने लोगों को भारत के लोगों के मुकाबले नहीं ला पाया है। पाकिस्तानी जनता न ठीक से पढ़-लिख पाई है, न ही उसकी कमाई का ठिकाना है, और समाज आतंक की दहशत की गिरफ्त में है, कट्टरपंथ की गिरफ्त में है, और देश में लोकतंत्र भारत की तरह मजबूत नहीं हो पाया है। ऐसी ही तमाम कमजोरियों के चलते किसी देश की जनता, वहां की सरकार, और वहां की फौज को जंग सुहाती है। लेकिन हिन्द महासागर के क्षेत्र में एक बड़ा देश और बड़ी ताकत रहते हुए भारत को बड़प्पन दिखाना चाहिए, और एक अधिक मजबूत लोकतंत्र होने के नाते अधिक जिम्मेदारी भी दिखानी चाहिए, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल यही किया है।
सोशल मीडिया पर उनके आलोचक भी यह मानते हैं कि मोदी अगर पाकिस्तान के मोर्चे पर एक कामयाबी पाते हैं, तो वे अकेले, या पाकिस्तानी नेता के साथ मिलकर नोबल शांति पुरस्कार जैसा कुछ पा भी सकते हैं। हम इसे एक भावनात्मक अटकल मानते हुए भी यह मानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री को एक पार्टी के नेता के कद से ऊपर उठकर, एक पार्टी की विचारधारा से ऊपर उठकर, एक धर्म की विचारधारा से ऊपर उठकर विश्व के एक बड़े नेता की तरह की दरियादिली और जिम्मेदारी दोनों ही दिखानी चाहिए, क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री न सिर्फ अपनी साख कायम करते हैं, बल्कि वह देश की साख भी कायम करते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अभी जो बातें कही हैं, वे उनका कद भी बढ़ा गई हैं, और पाकिस्तान की जमीन से भारत पर होने वाले हमलों को लेकर पाकिस्तान को यही मुंहतोड़ जवाब बाकी दुनिया में भारत को एक ऊंची जगह दिलाएगा, और पाकिस्तान को अलग-थलग भी करेगा। आज मोदी की जगह कोई गैरभाजपाई प्रधानमंत्री होते, तो उनकी ऐसी बात पर वह तबका उबल पड़ा होता जो कि आज मोदी की वजह से गम खाकर चुप रह गया है। कोई कांग्रेसी या समाजवादी-वामपंथी मोदी की जगह ऐसी दरियादिली दिखाकर कायर और गद्दार जैसी गालियां भी पा जाते, लेकिन यह अच्छा है कि मोदी ताजा इतिहास में अपनी ही कही हुई हमलावर बातों से उबरकर एक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी दिखा रहे हैं, और आने वाले बरसों में उन्हें जंग से परे के रास्तों को ही तलाशना होगा, उसी में भारत का भी भला है, और पड़ोस के एक छोटे देश, एक कमजोर लोकतंत्र, और भारत से अधिक गरीब आबादी वाले पाकिस्तान का भी भला है।

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