इसरो की कामयाबी के बहाने कुछ बातें

संपादकीय
26 सितंबर 2016
भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो ने आज फिर एक बड़ी कामयाबी हासिल की जब उसने अपने एक रॉकेट से कई उपग्रह तो भेजे ही भेजे, उसने एक बार में ही अंतरिक्ष की दो अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रह स्थापित किए। देश में कम ही ऐसे संस्थान हैं जो कि भारत को बार-बार गौरव का मौका देते हैं, और केन्द्र में आती-जाती सरकारों, आती-जाती पार्टियों से प्रभावित हुए बिना लगातार आसमान छूती कामयाबी देश के सामने पेश करते हैं। उधर दूर गुजरात में अमूल नाम का एक ब्रांड सहकारिता क्षेत्र के सबसे बड़े प्रयोग की वजह से देश भर में दूध की नदियां बहा रहा है, और अपने देशी बाहुबल से अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को डेयरी-उत्पादों के मामले में बाजार में लगातार शिकस्त भी दे रहा है। और यह कैसा विचित्र संयोग है कि केरल में केन्द्रित भारत के अंतरिक्ष अभियान में एक समय विक्रम साराभाई गुजरात के थे, और दूसरी तरफ गुजरात में आनंद में अमूल का पूरा साम्राज्य खड़ा करने वाले वर्गीज कुरियन केरल के थे। अब भारत का अंतरिक्ष संस्थान इसरो देश के लिए कमाई भी कर रहा है, और दुनिया भर की सरकारों और निजी कंपनियों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने में लगातार कामयाब हो रहा है, और जिस तरह एक वक्त भारत के मजदूर दुनिया के कई देशों में जाकर खूब मेहनत से कमाते थे, और वहां की अर्थव्यवस्था को बढ़ाते थे, कुछ उसी तरह आज भारत का यह रॉकेट-कुली दुनिया के कई देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचा रहा है, और अपने खुद के रिसर्च के नए-नए रिकॉर्ड बना भी रहा है।
इस मौके पर कुछ बातों को सोचने की जरूरत है। ऐसी क्या वजह है कि इसरो के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों में अधिकतर लोग दक्षिण भारतीय हैं, उत्तर भारत के लोगों में टेक्नालॉजी की समझ और सीख में कमी क्यों हैं? दूसरी तरफ इसरो की कामयाबी में पिछले बरसों में लगातार ऐसी तस्वीरें भी सामने आई हैं कि वहां महिला वैज्ञानिक बड़ी संख्या में हर कामयाबी के पीछे हैं, और इससे भी भारतीय महिला की एक अलग, शानदार, गौरव के लायक तस्वीर बनती है। फिर एक सवाल यह उठता है कि देश में बहुत सारी सरकारी कंपनियां हैं, एजेंसियां हैं, और शिक्षा और शोध के संस्थान भी हैं। इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो भारी नुकसान में चलते हैं, जिन्हें बेचने की बात आती है, जहां पर भ्रष्टाचार हावी रहता है, और जो नाकामयाबी की मिसालें हैं। दूसरी तरफ अमूल और इसरो जैसे कामयाब संस्थान भी इसी देश के हैं। और हम सरकार से जुड़े सहकारिता आंदोलन वाले अमूल-आनंद को न भी देखें, तो भी एक और सहकारिता-प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर एक अविश्वसनीय कामयाबी वाला है। इंडियन कॉफी हाऊस नाम से पूरे देश में खाने-पीने की सबसे विश्वसनीय, और किफायती जगहें देखने को मिलती हैं, और उसमें काम करने वाले कर्मचारी एक सहकारी संस्थान के सदस्यों की तरह उसे चलाते हैं, विश्वसनीयता को जारी रखते हैं, और सरकारी अनुदान के बिना भी वे एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पेश करते हैं।
हम इस बारे में पहले भी लिख चुके हैं कि देश में ऐसे कामयाब तजुर्बों को बाकी जगहों पर भी लागू करने की कोशिश की जानी चाहिए। ऐसा करने पर भारत एक बहुत ही अधिक उत्पादक और सफल अर्थव्यवस्था बन सकेगा, और उसकी अंतरराष्ट्रीय साख भी बढ़ सकेगी। देश में एक से अधिक इसरो की जरूरत तो नहीं है, लेकिन देश के कई हिस्सों में आनंद जैसा सहकारी-डेयरी का प्रयोग जरूर हो सकता है, और सहकारी क्षेत्र में डेयरी से परे भी बहुत से दूसरे कामकाज को सफलता से बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए राजनीतिक दखल और राजनीतिक भ्रष्टाचार से परे रहने देने जितनी सरकारी रियायत की जरूरत रहती है। अगर भ्रष्ट नेता-अफसर अपने हाथ अलग रखें, तो अमूल जैसे कई ब्रांड कई दूसरे सामानों में आ सकते हैं, और इसके लिए ही कोशिश करनी चाहिए। ऐसा एक-एक ब्रांड करोड़ों लोगों को काम भी दे सकता है, और देश की अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ जोड़ भी सकता है।

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