हफ्ते में एक दिन दफ्तर में बैठने की पहल ठीक

संपादकीय
27 सितंबर 2016
छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने मंत्रियों और सचिवों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे अपने एक दिन मंत्रालय-सचिवालय में अपने दफ्तर में बैठें और जनता से मिलें। यह पता लगा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर ऐसा हो रहा है कि सरकारी अफसर-मंत्री लोगों के लिए उपलब्ध रहें। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि बहुत साल पहले जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे, उस समय भी हफ्ते में एक दिन, हर सोमवार यह अनिवार्य किया गया था कि सारे लोग बिना किसी दौरे या मीटिंग के लोगों से मिलने के लिए अपने दफ्तर बैठें।
जिन लोगों का सरकार से वास्ता पड़ता है वे जानते हैं कि भारत में प्रचलित यह बात गलत नहीं है कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा-लगाकर जूते-चप्पल घिस जाते हैं। टीवी पर एक हिन्दी सीरियल भी आता था जिसमें दफ्तरों में जाने वाले लोगों की तकलीफ को लेकर बड़ा कड़ा व्यंग्य किया जाता था, और लोग उससे सहमत भी रहते थे। लेकिन अब देश और प्रदेशों मेें चुनावी राजनीति के चलते समझदार राजनीतिक दलों को यह मजबूरी भी लग रही है कि वे जनता की तकलीफों को कुछ हद तक तो दूर करें। हफ्ते में एक दिन दौरे और मीटिंग न रखकर आम लोगों के लिए पूरे वक्त मौजूद रहना इस कोशिश में पहला कदम हो सकता है। हमारा यह मानना है कि जनता को यह मालूम रहना चाहिए कि कौन से अफसर और मंत्री, कौन से सरकारी कर्मचारी किस दिन छुट्टी पर हैं, और आने-जाने में उसका वक्त खराब नहीं होना चाहिए। आज सरकार के हर विभाग इंटरनेट पर मौजूद हैं, और अगर वे अपनी वेबसाइटों पर विभागीय ढांचे के साथ महीने का कैलेंडर डालकर यह लिखने लगें कि कौन-कौन से लोग किस-किस दिन मौजूद नहीं रहेंगे। आज तो हाल यह रहता है कि अफसर बदल जाते हैं, बरसों तक उनके नाम नहीं बदलते, टेलीफोन नंबर बदल जाते हैं लेकिन इंटरनेट पर बरसों पुराने नंबर दिखते रहते हैं।
अभी छत्तीसगढ़ सरकार के बारे में यह पता लगा है कि नया रायपुर मंत्रालय तक लोगों के आने-जाने के लिए सरकार मुफ्त में बस सेवा उपलब्ध करा रही है। यह इसलिए भी जरूरी है कि 25 किमी दूर बसे हुए मंत्रालय तक जाना आम लोगों की जेब से परे की बात होती है। इसके अलावा सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि ऐसे मंगलवार को सुबह से लेकर शाम तक कोई बैठक न रखी जाए, और तमाम लोग मौजूद रहें। लोकतंत्र में अगर जनता को इतनी सहूलियत भी नहीं मिलेगी, तो उसकी नाराजगी निकलती ही रहेगी। लेकिन इससे परे भी कुछ और बातें छत्तीसगढ़ सरकार को तेजी से करनी चाहिए। अलग-अलग विभागों में कौन सी फाईल कहां तक पहुंची है, इसे इंटरनेट पर डालना चाहिए, और इसकी गोपनीयता जहां जरूरी है, वहां पर उसे बनाए रखने के लिए फाईल के नंबर के साथ तलाशने की सहूलियत होनी चाहिए। राज्य सरकार अगर चाहे तो कम्प्यूटर पर अपने खुद के लिए एक ऐसी सुविधा जुटा सकती है जिससे किसी एक टेबिल पर एक फाईल एक सीमा से अधिक समय तक रहने पर उसे खबर लग जाए। ये तमाम बातें प्रशासनिक सुधार के तहत बड़ी छोटी-छोटी और आम समझ वाली बातें हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि भूतपूर्व नौकरशाहों को ही प्रशासनिक सुधार का जिम्मा दिया जाता है। जिन लोगों ने अपनी पूरी सरकारी नौकरी के दौरान किसी सुधार की कोशिश नहीं की, वे अब रिटायर होने के बाद पुनर्वास के लिए सुधार के ऐसे नाटक में लग जाते हैं। सुधार तो दफ्तरों का चक्कर लगाने वाले आम लोगों की राय से हो सकता है, किसी सरकारी अफसर के किए हुए नहीं। 

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