पाकिस्तान के मोर्चे पर अब तक भारत का रूख समझदारी का है

संपादकीय
28 सितंबर 2016
पाकिस्तान के साथ चल रही तनातनी के बीच भारत का यह फैसला एक अच्छा और अहिंसक, शांतिप्रिय फैसला है कि वह पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। भारत की इस घोषणा के बाद सार्क के दो सदस्य देशों ने भी वहां न जाने का फैसला घोषित किया है, हालांकि बांग्लादेश ने यह कहा है कि वह कुछ घरेलू कारणों से वहां नहीं जा रहा, और बांग्लादेश के अलावा अफगानिस्तान ने वहां न जाने की बात कही है। आज जब सरहद पर पाकिस्तान की फौजें कवायद करते दिखने की खबरें आ रही हैं, तब भारत का यह कूटनीतिक फैसला सही लगता है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए बने हिन्द महासागर के इन देशों के संगठन सार्क का काम और भारत पर हुए आतंकी हमले साथ-साथ नहीं चल सकते। यह एक अच्छा संकेत है कि अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के लोगों की जख्मी भावनाओं के मुताबिक नहीं चल रहे हैं, और एक देश के प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी से संतुलित और सीमित कार्रवाई ही कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान पर देश की तरफ से खासा तगड़ा हमला किया है, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को किनारे करने, अकेले करने की भारत की पहल ही आज की जरूरत दिख रही है।
भारत और पाकिस्तान में एक बुनियादी फर्क है कि भारत एक विकसित और स्थिर लोकतंत्र है, और कुछ मामलों को छोड़ दें, तो यहां पर संगठित आतंंक धार्मिक कट्टरवाद के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं कर पाया है। दूसरी तरफ भारत में फौज का न तो ऐसा कोई इतिहास है, और न ही ऐसा कोई भविष्य है कि वह निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार पर हावी हो सके। इसलिए भारत को पाकिस्तान के साथ ऐसी तनातनी के दौर में भी अपने इतिहास, अपने वर्तमान, और अपने भविष्य उन सबका ख्याल रखना चाहिए। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का ओहदा कई जिम्मेदारियों को लेकर आता है, और नरेन्द्र मोदी जैसे कल तक जंग के फतवे देने वाले नेता भी प्रधानमंत्री की हैसियत से बहुत शांत हैं, और एक नई जिम्मेदारी का परिचय दे रहे हैं। हम इस बात की हिमायती नहीं हैं कि बीते बरसों में किसी ने अगर कोई भड़काऊ बात कही है, तो आज उसे गिना-गिनाकर यह कहा जाए कि आज तुम भड़क क्यों नहीं रहे हो, आज शांत क्यों हो। विपक्ष के नेता के चुनावी तेवर, और प्रधानमंत्री की विदेश या अंतरराष्ट्रीय नीति में अगर जमीन-आसमान का फर्क है तो हम उसमें कुछ बुराई नहीं मानते। हर किसी को हालात देखते हुए खयालात बदलने की छूट रहनी चाहिए, और लोकतंत्र ऐसी छूट की मांग करता भी है।
आज कई लोगों को यह भी लग रहा है कि भारत से जिस सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान जाता है, उसे रोक देना चाहिए। लेकिन पानी और नदी के जानकार लोगों का यह भी कहना है कि किसी नदी के पानी को चाहकर भी इस तरह नहीं रोका जा सकता, और इस रोके हुए पानी को किसी बाल्टी में भरकर नहीं रखा जा सकता। इसलिए ऐसे तमाम मामलों को राजनीति से परे जमीनी हकीकत और तकनीकी सलाह देखते हुए भी तय किया जाना चाहिए। फिलहाल हमारा यह मानना है कि अमरीका जैसे देशों के दबाव में पाकिस्तान से होने वाले आतंकी हमले काबू में किए जा सकते हैं, और भारत को उस मोर्चे पर भी अधिक कोशिश करनी चाहिए। साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि जहां अमरीकी दखल से कोई बात होती है, तो वह चीनी और रूस को भी बहुत दूर तक खींचती है, और आज भारत इन दोनों बातों को भी अनदेखा नहीं कर सकता।

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