पाकिस्तान पर भारत की सीमित फौजी कार्रवाई

संपादकीय
29 सितंबर 2016
भारतीय थलसेना की तरफ से यह घोषणा की गई कि उसने पाकिस्तान के साथ सरहद पर एलओसी, नियंत्रण रेखा, पर सर्जिकल हमले किए, और भारत में हमले के लिए घुसने को तैयार बैठे कुछ आतंकियों को मार गिराया। इस घोषणा को भारत के किसी मंत्री की तरफ से नहीं किया गया, और इस पत्रवार्ता में बैठे हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी एक फौजी जनरल को ही सब कुछ कहने दिया। इन तमाम बातों का कूटनीतिक अर्थ यह है कि अभी भारत सरकार इसे भारतीय फौज के किसी बड़े हमले की तरह दिखाना नहीं चाह रही है, और न ही इसे एक राजनीतिक फैसला दिखाना चाह रही है, बल्कि सरहद की हिफाजत के लिए तैनात फौज का स्थानीय स्तर पर लिया गया फैसला और की गई कार्रवाई दिखाना चाह रही है। भारतीय जनरल ने यह भी कहा कि उन्होंने अपने पाकिस्तान के समकक्ष अफसर को भी फोन पर इसके बारे में बता दिया है।
पिछले कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था कि भारत कोई न कोई कार्रवाई करेगा। और यह एक न्यूनतम फौजी कार्रवाई है जिसमें सरहद पर घुसने को तैयार आतंकियों को मारा गया। हालांकि इस घटना को देखने का पाकिस्तानी नजरिया कुछ और भी हो सकता है, और अभी पाकिस्तान में ऐसी किसी हमले से इंकार भी किया है और कहा है कि भारत की तरफ से चलाई गई गोलियों से पाकिस्तान के दो सैनिक मारे गए हैं। लड़ाई के दो पक्षों के बीच नजरिए का यह फर्क हमेशा रहता है, और भारत और पाकिस्तान के बीच आगे भी बना रहेगा, लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि कोई भी कार्रवाई बहुत ही तौल-तौलकर की जाए, और जरूरत से जरा भी अधिक कार्रवाई न की जाए। हम भारत की तरह के किसी देश का आतंकी हमलों से बार-बार जख्मी होने के बाद यह हक भी मानते हैं कि वह ऐसे हमलों की जड़ पर हमला करके उसे खत्म कर सके। दुनिया के बहुत से देशों में सीमित कार्रवाई से एक संदेश भी दिया जाता है, और परेशानी के सबब को घटाया भी जाता है। भारत से लंबे समय से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह सरहद के पार जिन आतंकी कैम्पों का जिक्र करता है, उन पर हमला करके उन्हें खत्म भी करे। जिस तरह पाकिस्तान से ऐसे भड़काऊ बयान आ रहे हैं कि उन्होंने परमाणु हथियार सहेजकर रखने के लिए नहीं बनाए हैं, उसी तरह भारत में भी अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि भारत की फौज भी दिखावे की सजावटी फौज नहीं है, और जरूरत पडऩे पर उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की जरूरतों के बारे में बार-बार कहते हुए भी हमारा यह मानना तो रहता ही है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक सीमा से अधिक बर्दाश्त करके कोई देश अपने को कमजोर ही साबित करता है। और ऐसा करके वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों की तो फिक्र करता है लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों के साथ वह कभी-कभी बेइंसाफी भी कर बैठता है। नेहरू के बारे में भी कई लोगों का ऐसा मानना रहा है कि उन्होंने चीन के साथ सावधानी बरतने के बजाय उस पर एक सीमा से अधिक भरोसा करके अपने अंतरराष्ट्रीय कद का परिचय दिया था, और उसका नुकसान भारत को उठाना पड़ा था। आज भारत-पाक सरहद पर जो नौबत है, उस जटिल स्थिति में बातचीत की सारी कोशिशें भी जारी रखनी चाहिए, कूटनीतिक दबाव डालने की भी कोशिशें जारी रखनी चाहिए, और अगर जरूरत लगती है, तो इस तरह के सीमित फौजी ऑपरेशन से एक मजबूत संदेश भी भेजना चाहिए।

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