अंबानी अफसोस जाहिर करे और मोदी इससे अपने को अलग करें

संपादकीय
3 सितंबर 2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बड़ी सी तस्वीर के साथ रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी ने अपनी नई टेलीफोन-इंटरनेट सेवा के जो इश्तहार छपवाए, उनसे ऐसा लगा कि वे प्रधानमंत्री से मुफ्त की मॉडलिंग करवा रहे हैं। लेकिन मानो यह काफी नहीं था, तो फिर रिलायंस जियो का जो टीवी इश्तहार आया, उसमें तो प्रधानमंत्री के लालकिले के भाषण सहित उनकी बहुत सी तस्वीरें, वीडियो क्लिप दिखाई गईं, और ऐसा लगने लगा कि यह कंपनी देश की सरकार ही है। इसलिए इसके तुरंत बाद जब विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की जमकर आलोचना की, तो वह स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही थी। कांग्रेस ने तो निजी कंपनी के विज्ञापन में प्रधानमंत्री के ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
भारतीय लोकतंत्र में ही नहीं, अमरीकी लोकतंत्र में भी नेताओं और कारोबारियों के रिश्ते जगजाहिर हैं। नरेन्द्र मोदी के पहले भी, और केन्द्र सरकार से परे राज्यों में भी नेताओं के करीबी कारोबारी रहते हैं, और उनके साथ खास रियायतों वाले रिश्ते भी रहते हैं। आखिर चुनावों के वक्त लंबा-चौड़ा कालाधन कारोबार की दुनिया से ही नेताओं को मिलता है, इसलिए आदर्श की खोखली बातों को हकीकत पर लादने का कोई फायदा तो है नहीं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि राजनीति और कारोबार के बीच के संबंधों में क्या कोई सीमा रेखा हो सकती है? लोगों को याद होगा कि आज के राष्ट्रपति और कांग्रेस पार्टी के एक सबसे लंबे वक्त के सबसे ताकतवर मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की खूबी यही मानी जाती थी कि वे देश के बड़े उद्योगपतियों से पार्टी के लिए मनचाहा चंदा जुटा सकते थे। और आज जिन मुकेश अंबानी की कंपनी के इश्तहारों को लेकर यह बात हो रही है, उस अंबानी का पेट्रोल पंप कर्मचारी से देश के सबसे बड़े कारोबारी तक का पूरा सफर कांग्रेस के राज में ही हुआ था। उस वक्त से यह चर्चा भी रहती थी कि देश की बहुत सी आयात-निर्यात नीतियां, और बहुत सी टैक्स नीतियां धीरूभाई अंबानी के कहे मुताबिक, उनके फायदे के लिए बनती थीं, और उनकी बुलंदी के पीछे कारोबार का योगदान कम था, सरकारी नीतियों का योगदान अधिक था। लोगों को यह भी याद होगा कि अटल सरकार के दौरान जब धीरूभाई अंबानी पर डाक टिकट जारी हुई, तो मंच पर उस वक्त के संचार मंत्री प्रमोद महाजन ने उस टिकट के पोस्टर को थामने के बजाय उसे उठाकर अपने सिर के ऊपर चढ़ाकर तस्वीरें खिंचवाईं थीं। इसलिए मोदी का कुछ कारोबारियों से घरोबा भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि एक राजनीतिक दल, और उसके पदाधिकारियों का किसी से घरोबा, और एक प्रधानमंत्री के ओहदे का किसी से घरोबा, क्या दो अलग-अलग बातें रहनी चाहिए, या फिर इन दोनों में दिखावे के लिए भी किसी फर्क की जरूरत नहीं है? हमारा यह मानना है कि राजनीति और कालेधन के सारे संबंध देखते हुए भी सार्वजनिक जीवन में दिखावे की नैतिकता को अगर कुचलना जरूरी न हो, तो उसे ढो लेना चाहिए। किसी कारोबारी पर मेहरबानी और रियायत के सौ तरीके होते हैं, उनमें से ऐसे सार्वजनिक प्रदर्शन का तरीका अच्छा नहीं माना जा सकता। और ऐसा मानने का हमारे पास कोई कारण नहीं है कि अंबानी ने मोदी की सहमति या अनुमति के बिना उनके नाम, उनके वीडियो, और उनकी तस्वीरें का ऐसा कारोबारी और बाजारू इस्तेमाल किया होगा। किसी टेक्नालॉजी को बढ़ावा देना एक अलग बात है, लेकिन किसी ब्रांड को आगे बढ़ाना सरकारी या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों का काम नहीं होना चाहिए। जो कुछ गलतियां टाली जा सकने लायक होती हैं, यह उनमें से एक थी, और हमारा ऐसा मानना है कि इससे न सिर्फ नरेन्द्र मोदी का नुकसान हुआ है, बल्कि अंबानी का भी नुकसान हुआ है जो कि अपने प्रोडक्ट की खूबियों को बिना प्रधानमंत्री का चेहरा लगाए भी बेच सकते थे, और बाजार की दुनिया में ऐसे चेहरे से ग्राहकों का भरोसा नहीं जीता जा सकता, विवाद की खबरों में जरूर आया जा सकता है, और इस मामले में यही हुआ है। ऐसी नौबत में बेहतर यही है कि अंबानी खुद अपने इन विज्ञापनों को हटाए, इनके लिए अफसोस जाहिर करे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने आपको सार्वजनिक बयान देकर इनसे अलग भी करें। यह उनकी निजी पसंद का मामला नहीं है, यह प्रधानमंत्री पद की सार्वजनिक गरिमा का मामला भी है।

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