शहाबुद्दीन का फिर जेल जाना लोकतंत्र की साख के लिए अच्छा

संपादकीय
30 सितंबर 2016
बिहार के सबसे अधिक कुख्यात और तरह-तरह के जुर्म में फंसे हुए बाहुबली कहे जाने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन को पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे वापिस जेल भेजने को कहा है। एक तो बिहार लंबे समय तक वैसे भी राजनीति से जुड़े हुए मुजरिमों की वजह से बदनाम राज्य था, जिसे कि नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में काफी हद तक ठीक किया है। लेकिन आज नीतीश की सत्ता में लालू यादव भी भागीदार हैं, और शहाबुद्दीन लालू यादव की पार्टी का ही एक कुख्यात नेता है। उस पर एक पूरे परिवार के लोगों को तेजाब से जलाकर मार डालने, हत्या करवाने जैसे कई आरोपों के मामले चले हैं, और चल रहे हैं। ऐसे में जब उसे बिहार हाईकोर्ट से जमानत मिली, तो उसके इलाके में बसे हुए उसके शिकार ऐसे परिवार सहम गए थे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के एक नामी-गिरामी वकील प्रशांत भूषण सामने आए, और उन्होंने शहाबुद्दीन को जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां जमानत खारिज करने के पहले कोर्ट ने बिहार सरकार को भी लताड़ लगाई कि जब पटना हाईकोर्ट में शहाबुद्दीन की जमानत का मामला चल रहा था, तब राज्य सरकार ने वहां पर इसका विरोध क्यों नहीं किया? अभी इस जमानत को रद्द करवाने के लिए राज्य सरकार भी अलग से सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
भारत की न्याय व्यवस्था में बहुत बड़े-बड़े मुजरिमों में से  कुछ गिने-चुने लोगों को ही अदालत से दिक्कत होती है, बाकी अपनी जमानत या रिहाई खरीदने, या उसका कानूनी इंतजाम करने की ताकत रखते हैं। फिर इस शहाबुद्दीन को देखें तो बरसों की जेल के बाद निकलकर बाहर आया, और मीडिया के पूछने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ बयान दिया कि वे परिस्थितियों के बने हुए मुख्यमंत्री हैं। उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री, कई विधायक, कई फरार हत्यारे, और सैकड़ों गाडिय़ां जेल पहुंचे थे। खुद लालू यादव से जब उनकी पार्टी के नेता शहाबुद्दीन के बयान के बारे में पूछा गया तो वे पूरी तरह भड़क गए थे, लेकिन शहाबुद्दीन के खिलाफ कहने को उनके पास दो शब्द भी नहीं थे। ऐसे में सत्तारूढ़ गठबंधन की एक पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने जब इस जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना तय किया, तो इसे गठबंधन के भीतर उनकी अपनी इज्जत बचाने की कोशिश भी माना गया।
शहाबुद्दीन दरअसल एक प्रतीक है कि भारतीय राजनीति में किस तरह भयानक मुजरिमों की जगह भी राजनीति में निकल आती है, पार्टियां उन्हें मंजूर करके नेता बनाती हैं, वे खुद चुनाव खरीद लेते हैं या जीत जाते हैं, और फिर अदालत से लडऩे की ताकत तो ऐसे लोगों के पास रहती ही है। ऐसे में इस आदमी की जमानत खारिज होना, और उसका जेल जाना भारत के लोकतंत्र और भारत की न्याय व्यवस्था की साख के लिए एक अच्छी बात है। भारत की राजनीति को ऐसी गंदगी से साफ करना भी बहुत जरूरी है। इसका क्या रास्ता निकल सकता है, इसके लिए समाज के जागरूक लोगों को आगे आना पड़ेगा, क्योंकि देश में शायद ही कोई ऐसी पार्टी है जिसे मुजरिमों से परहेज हो।

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