मदर टेरेसा तो चमत्कार के पहले से भारत की एक सबसे बड़ी संत बन चुकी थीं

संपादकीय
4 सितंबर 2016
अभी कुछ देर में रोमन कैथोलिक चर्च के साम्राज्य, पोप के मुख्यालय वैटिकन में मदर टेरेसा को संत की उपाधि दी जाएगी। हिंदुस्तान के सबसे गौरवशाली इंसानों में से एक, मदर टेरेसा ने पूर्वी योरप के अपने जन्म के देश से यहां आकर जिस तरह सबसे गरीब, बदहाल-फटेहाल बंगाल में भूख से मरते लोगों, बीमार लोगों और बेसहारा बच्चों की सेवा करने में अपनी जिंदगी लगाई, उसे लेकर आलोचना करने वाले भी हमेशा ही मौजूद रहे, लेकिन वे किसी भी दूसरे हिंदुस्तानी के मुकाबले अपने किस्म से सेवा करने में सबसे आगे ही रहीं। इसलिए आज जब उन्हें संत घोषित किया जा रहा है, तब संत की पदवी या उपाधि पर भरोसा करने वाले लोगों का खुश होना जायज है। बाकी लोग तो मदर टेरेसा को भारतरत्न मिलने के पहले से भी उन्हें धरती पर ईश्वर का एक रूप मानकर खुश रहते ही थे। लेकिन उनके आलोचक हमेशा यह मानते रहे कि वे लोगों को दुखी और गरीब बनाए रखने में लगी रहती थीं, और अपने कामों के लिए वे दुनिया के कुख्यात या बदनाम लोगों से भी दान लेने में परहेज नहीं करती थीं। फिर ईसाई विरोधी एक छोटा तबका ऐसा भी है जो मदर टेरेसा के सारे काम को लोगों के ईसाईकरण के आरोप के साथ ही देखता था, हालांकि ऐसे तबके के पास भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज में ऐसी सेवा करने वाले कोई हिंदूवादी विकल्प कभी नहीं रहे भी या बाबा आमटे की तरह रहे भी, तो वे हिंदूवादियों में कभी नहीं रहे। मदर टेरेसा की एक-दो और बातों के लिए उनकी आलोचना दुनिया भर के उदारवादी लोग करते रहे। वे गर्भपात और गर्भनिरोधकों के खिलाफ रहीं। लोगों का यह मानना है कि गर्भनिरोधकों के बिना दुनिया में गरीब आबादी बढ़कर एक बदहाली में जीने को मजबूर रहती है, और ऐसी आबादी के बीच जीते हुए भी मदर टेरेसा इस बात के महत्व को नकारती रहीं।
लेकिन आज उनके संत बनने के मौके पर उनके ईसाई धर्म की इस प्रथा को समझना भी जरूरी है कि जब तक किसी के करिश्मे स्थापित नहीं होते हैं, जब तक किसी के किए हुए चमत्कारों को वैटिकन अपनी छानबीन और जांच के बाद सही नहीं पाता है, तब तक उन्हें संत नहीं बनाया जाता। लेकिन हिंदुस्तान में मदर टेरेसा का किया हुआ काम जमीनी काम की एक हकीकत रहा, किसी तरह का कोई चमत्कार उसके लिए उन्हें नहीं लगा। सबसे गरीब और सबसे बेहाल लोगों की जितनी मदद उनकी संस्था ने देश भर में की है, और यह जाहिर है कि इनमें से अधिकतर जरूरतमंद देश के दूसरी धर्मों में भी पैदा हुए होंगे, और उन धर्मों ने अपने इन जरूरतमंदों को फुटपाथ या नाली-गटर में मरने के लिए फेंक दिया था। ऐसे अवांछित बच्चों को उठा-उठाकर मदर टेरेसा और उनके साथ की दूसरी नन्स ने जिंदगी दी, तो इसमें कोई करिश्मा नहीं था, महज सेवा और समर्पण से यह काम हुआ। दूसरी तरफ संत की उपाधि देने के पहले वैटिकन ने खूब लंबी-चौड़ी तलाश करके दो ऐसे मरीज ढूंढ निकाले जिनका यह दावा है, या जिनका यह मानना है कि वे मदर टेरेसा के चमत्कार से ठीक हुए, और इसके आधार पर मदर टेरेसा को संत बनाया जा रहा है। हमारी सोच वैटिकन की सोच से बिल्कुल अलग है, और हमारी नजर में, हमारी जुबान में हम जिसे संत मानते हैं, उनके साथ किसी तरह का चमत्कार जुड़ा होना कहीं जरूरी नहीं होता है। इस देश में गांधी को भी साबरमति का संत माना गया, और गांधी के साथ कोई चमत्कार भी जुड़ा हुआ नहीं था। लेकिन ईसाई धर्म-संगठन की अपनी मान्यताएं हैं, और धर्म का कारोबार तो चमत्कारों के बिना चल नहीं सकता। लेकिन हिंदुस्तान और बाकी दुनिया की नजर में मदर टेरेसा की महानता किसी चमत्कार की मोहताज नहीं रही, और यह देश वैटिकन के इस संतई-सर्टिफिकेट के बिना भी उनको भारतरत्न मान चुका था, और उनकी सेवा देखकर देश के तकरीबन सारे लोगों के बदन में सिहरन सी दौड़ जाती थी। अपने जन्म के देश को छोड़कर वे जिस तरह इस गरीब देश में आकर यहां के सबसे गरीब, और सबसे ही जरूरतमंद लोगों के बीच पूरी जिंदगी काम करती रहीं, उससे वे भारत की एक सबसे बड़ी संत पहले ही बन चुकी हैं, आज शायद वैटिकन उनका सम्मान करके खुद सम्मान पाने का काम ही कर रहा है।

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