हुनर और उसके ग्राहक को मिलाने में सरकारी भूमिका

संपादकीय
5 सितंबर 2016
हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया में टेक्नालॉजी के करवट लेने से बहुत से लोगों की नौकरी एकाएक खत्म होती है। एक वक्त था जब एक-एक निगेटिव से एक-एक प्रिंट एक बार में  बनते थे, आज न निगेटिव रह गए, और न ही प्रिंट करने के लिए उतने लोगों की जरूरत पड़ती। यही हाल बहुत से कारोबारों का हो गया है और ऐसा लगता है कि मशीनें रफ्तार से लोगों को बेरोजगार करने लगेंगी। लेकिन दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान जैसे देश को देखें तो यहां आज भी बहुत से ऐसे कामकाज हैं जिनके लिए हुनरमंद कारीगर आसानी से मिलते नहीं हैं, और दूसरी तरफ ऐसे कारीगरों को काम भी आसानी से नहीं मिलते। पिछले दिनों भारत सरकार ने ऐसी कुछ वेबसाइटें बनाई है जिनमें कारीगर और उनकी सेवाओं के ग्राहक एक-दूसरे को आसानी से पा सकें। कुछ शहरों में ऐसी एजेंसियां भी हैं जो कि कुछ तरह की मरम्मत, रख-रखाव, या नए काम के लिए कारीगर जुटाकर देती हैं। इसमें लोगों के काम होते हैं, एक एजेंसी को बीच का काम मिल जाता है, और हुनरमंद कारीगर घर बैठे या फोन पर काम पा जाते हैं।
आज अगर भारत के किसी देश-प्रदेश को तरक्की करनी है, तो उसे अपने मानव संसाधन का बेहतर इस्तेमाल करना पड़ेगा। लोग घर बैठे रहें, और कारीगर तलाशते रहें, दूसरी तरफ कारीगर मजदूरों के बाजार में खड़े रहकर काम तलाशे, तो इसमें देश का बड़ा नुकसान है। हर प्रदेश को यह चाहिए कि वह कम दाम वाली ऐसी सेवाओं के लिए जरूरत के मुताबिक कारीगर भी तैयार करे, और उनसे ग्राहकों के मिलने को मुमकिन और आसान भी बनाए। आज इंटरनेट, मोबाइल एप्लीकेशन, और फोन के चलते यह काम आसान भी हो गया है। टेक्नालॉजी एक तरफ काम कम कर रही है, तो दूसरी तरह वह काम बढ़ा भी सकती है। जब इस देश मेें एटीएम शुरू हुए थे, तो लोगों को लगता था कि एक-एक मशीन बैंक के एक-एक कैशियर की नौकरी खा जाएगी। कुछ नौकरियां कम भी हुई हैं तो बहुत सी नौकरियों की संभावना बढ़ती भी जा रही हैं, हर एटीएम की चौकीदारी के लिए एक-दो गार्ड रखे जाने लगे, और कम पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार का यह एक नया मौका निकला। आज शहरों में दुपहियों पर खाने-पीने के सामान पहुंचाने वाले लोग लगातार दौड़-भाग करते दिखते हैं और अब तो दवा घर पहुंचाने की सर्विस भी शुरू हो गई है, किराना घर पहुंचाया जाने लगा है, और छोटे-छोटे दूसरे सामानों की बिक्री भी घर पहुंचकर होने लगी है। तो टेक्नालॉजी जहां नौकरियां घटा रही है, वहीं बढ़ा भी रही है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को चाहिए कि स्किल डेवलपमेंट को कागजों तक न रखकर उसे तेजी से हकीकत में बदले, और हर कुछ महीनों में यह अंदाज लगाए कि किस तरह के हुनर की जरूरत बढ़ती जा रही है, और उसके मुताबिक लोगों का प्रशिक्षण होना चाहिए। सरकार को यह भी चाहिए कि वह एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करे जिससे कि कारीगरों को बाजार में न खड़ा होना पड़े, उनकी तलाश आसान रहे, और उन्हें फोन पर बुलाया जा सके। आज मोबाइल फोन की टेक्नालॉजी ने बहुत से काम आसान कर दिए हैं। इन दिनों बड़े शहरों में जो मोबाइल-टैक्सियां चलती हैं, उनके मोबाइल-एप्लीकेशन पर जाते ही यह दिखने लगता है कि सबसे करीब की टैक्सी कितने मिनट में पहुंच सकती है, और उसे बुलाने पर उस करीब के टैक्सी वाले को भी बहुत कम समय में ही तुरंत सवारी मिल जाती है। आज सरकार में बैठे लोगों को तकनीक की कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करना चाहिए, और अपने प्रदेश के लोगों को इंटरनेट-फोन से जोड़कर उनका कारोबार भी बढ़ाना चाहिए, और ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक हुनर की तैयारी भी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ खनिजों पर आधारित कमाई पर टिका राज्य है, और इसकी अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर का योगदान न के बराबर है। इसी क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं भी रहती हैं, और यह राज्य इसमें अभी बहुत कुछ कर सकता है।

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