क्षमायाचना की जरूरत तो धर्म से परे राजनीति और सरकारों के लिए भी जरूरी

संपादकीय
6 सितंबर 2016
जैन समाज के लोग आज एक सालाना रिवाज के मुताबिक उन सभी लोगों से क्षमायाचना कर रहे हैं जिनसे उनका कोई वास्ता पड़ा हो, और शायद उनसे कोई तकलीफ पहुंची हो। हर बरस ऐसे संदेश भेजे जाते हैं, और कुछ विज्ञापन छपते हैं, कुछ लोग फोन भी करते हैं। क्या ऐसी क्षमायाचना का कोई महत्व होता है? या फिर लोग एक सालाना रिवाज की तरह इसे करते हैं और भूल जाते हैं?
दरअसल बहुत से धर्मों में क्षमायाचना या प्रायश्चित का प्रावधान रहता है, और ईसाई चर्चों में तो कन्फेशन रूम रहते हैं जहां एक तरफ लोग अपने पाप मंजूर करने के लिए बैठते हैं, और दूसरी तरफ बैठे हुए पादरी को अपने गलत कामों का ब्यौरा देते हैं। इसमें पादरी पापी को देख नहीं पाते, और इस प्रायश्चित के बाद माना जाता है कि लोग पापमुक्त हो जाते हैं। अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग तरह से प्रायश्चित का इंतजाम किया गया है, और हिंदू धर्म में किसी बिल्ली के मर जाने पर सोने की बिल्ली बनाकर चढ़ाने का रिवाज भी सुनने में आता है, फिर इसे माना जाता है, या नहीं, यह तो पता नहीं।
लेकिन इस मुद्दे पर लिखने का आज हमारा दूसरा मकसद है। धर्म से परे भी दुनिया की सरकारें, और राजनीतिक दल, धर्म और जाति के संगठन, और बड़े-बड़े लोग अपनी ऐतिहासिक गलतियों के लिए देश या दुनिया से, किसी समाज या कुछ लोगों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हैं, और वह इतिहास में दर्ज भी हो जाती है। जर्मनी के हिटलर ने बाकी दुनिया के साथ जो किया था, और जिस तरह दसियों लाख यहूदियों को मारा था, उसके लिए जर्मन लोग बहुत माफी मांग चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने वहां के आदिवासियों को संसद के भीतर आमंत्रित करके सदन के बीच खड़े होकर उनसे माफी मांगी क्योंकि कोई एक सदी पहले ऑस्ट्रेलिया के गोरे शासकों ने वहां के मूल निवासी आदिवासियों के बच्चों को उनसे छीन लिया था, और उन्हें शहरी, संपन्न, शिक्षित, ईसाई घरों और संस्थाओं में रखकर बड़ा किया था, और यह माना था कि वे अशिक्षित-गरीब, जंगल के रहने वाले लोगों के बच्चों पर एक एहसान कर रहे हैं। बाद में जब दुनिया संवेदनशील हुई, तो यह माना गया कि यह मूल निवासियों के बच्चों की पूरी पीढिय़ों की चोरी थी, और ऐसी चोरी की पीढ़ी के लिए गोरों ने अपने-आपको चोर मानते हुए देश की संसद में मूल निवासियों से माफी मांगी। यह घटना इसलिए भी अधिक सोचने लायक है कि आज भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से हिंदू संगठन आदिवासी बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, और उन्हें हिंदू बनाने के लिए देश के अलग-अलग प्रदेशों में उन्हें रख रहे हैं, और ऐसे बच्चे अपने मां-बाप, परिवार, संस्कृति, समाज, रीति-रिवाज, बोली और कला, इन सबसे कट जा रहे हैं, और सवर्ण, शहरी, हिंदूवादी लोग अपनी ऐसी पहल को उन बच्चों पर एहसान भी मान रहे हैं। हो सकता है कि सौ-पचास बरस बाद इस देश में संवेदनशीलता आए, और आदिवासी हकों का सम्मान करते हुए इस देश की संसद भी आदिवासियों के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होगी और माफी मांगेगी। लेकिन फिलहाल सवर्ण हिंदू यह एहसान करते हुए अपने-आप पर गौरव भी कर रहे हैं, और अपनी यह नासमझी भी बता रहे हैं कि आदिवासियों को समझदार बनने के लिए उनकी जमीन से उखाडऩा जरूरी नहीं है, वे अपनी जमीन पर रहते हुए भी, किताबें पढ़े बिना भी ऐसी शहरी-हिंदूवादी लोगों से अधिक समझदार हैं।
लेकिन दुनिया के बाकी इतिहास को देखें, और भारत में पिछले कुछ दशकों की बहस को देखें, तो यह सोचने की जरूरत है कि कौन से नेता और कौन सी पार्टियां, कौन से धर्म और कौन से संगठन किस-किस ऐतिहासिक अपराध या पाप के लिए माफी मांगने के लिए एकदम फिट केस हैं? गांधी के कत्ल को लेकर बहस चल रही है, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांगे्रस के नेताओं के खुले भड़कावे के बाद विशाल वृक्ष गिरने से हिलती हुई धरती पर हजारों सिखों का कत्ल हुआ, उसके लिए कौन लोग माफी मांगेंगे? लेकिन इसके पहले जिस तरह स्वर्ण मंदिर को आतंकियों का ठिकाना बन जाने दिया गया, और पंजाब में गैर सिखों को छांट-छांटकर मारा गया, और सिख पार्टियां, सिख संगठन चुप रहे, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई, और उसकी प्रतिक्रिया में सैकड़ों लोग मारे गए, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? गोधरा में और गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा में सैकड़ों या हजारों लोग मारे गए, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे? कश्मीर से जिस तरह हिंदू पंडितों को हत्या और बलात्कार की धमकी देकर बेदखल किया गया, और उसमें जिस तरह से वहां के मुस्लिम बिरादरी और मस्जिदें इस्तेमाल हुईं, उसके लिए कौन माफी मांगेंगे?
इसलिए जब हम धार्मिक प्रथा के तहत ऐसी माफी सुनते हैं तो लगता है कि धर्म से परे भी राजनीति और समाज को, संगठनों और नेताओं को सालाना माफी मांगनी चाहिए, और अपने कुकर्मों की फेहरिस्त भी जारी करनी चाहिए कि इन बातों के लिए वे माफी चाहते हैं। अब ऐसा कलेजा कितने लोगों का होगा, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन अगर ऐसा होगा, तो हो सकता है कि एक दिन बस्तर के आदिवासियों से भी खादी और खाकी मिलकर सामूहिक क्षमायाचना करें।

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