रामदेव का कारोबार कोई समाजसेवा नहीं अकेले बालकृष्ण का मालिकाना हक है

26 सितंबर 2016   

इन दिनों हिन्दुस्तान के टीवी समाचार चैनलों पर टीवी के अपने समाचार पढऩे वाले लोगों के अलावा जो चेहरा सबसे अधिक दिखाई देता है, वह बाबा रामदेव, और उनके सहयोगी बालकृष्ण का है, जो कि अपने अनगिनत सामानों के अनगिनत इश्तहारों की मॉडलिंग करते हुए दिखते हैं, और रामदेव अपने सुपरिचित गैरजिम्मेदार अंदाज में देश के बाकी सभी सामानों, सभी कंपनियों को कोसते हुए, उन्हें विदेशी कंपनी या घटिया सामान बताते हुए पतंजलि ब्रांड के अपने सामानों को बढ़ावा देते दिखते हैं। एक समय वे योग बेचते थे, फिर वे कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जागरूकता बेचते थे, फिर वे कालेधन को देश में लाने की मांग बेचते थे, फिर वे मोदी के अच्छे दिन बेचने लगे, और अब वे अपने सामानों को बनाने वाली तमाम कंपनियों की साख को बेचते हैं, और अपना बाजार बढ़ाते हैं।
ये तमाम बाजारू हथकंडे हैं, और इनको लेकर हमें कोई खास शिकायत उनसे नहीं है। जो बाजार में उतरते हैं, वे दूसरों के सामान को घटिया बताकर ही अपने सामान को बेहतर साबित करने का काम करते हैं। वही काम आज देश के सबसे बड़े बाजारू योगी-सन्यासी भगवा रामदेव भी कर रहे हैं, यहां तक भी कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन दिक्कत इस बात पर है कि जब वे बार-बार अपने सामानों को लेकर स्वदेशी का नारा, देशप्रेम या राष्ट्रप्रेम का नारा लगाते हैं, जब-जब वे दूसरी कंपनियों को विदेशी, बहुराष्ट्रीय, या मुनाफाखोर कंपनियां कहते हैं, तब-तब वे बाजार की आम बेईमानी को इस्तेमाल करते हुए इन हथकंडों की वजह से भगवा कपड़ों, योग, आध्यात्म, ध्यान, और आयुर्वेद, इन सभी को साख को चौपट करते हैं। योग और आयुर्वेद ऐसे हथकंडों पर जिंदा बातें नहीं हैं, और हजारों बरस से इनकी साख चली आ रही थी, और आज इनके नाम पर यह बाबा नूडल्स से लेकर जींस तक बनाकर बेचने चला है।
लेकिन इन बातों से भी बड़ी दिक्कत एक दूसरी है। जब बाबा दूसरों को मुनाफाखोर कहता है, बाजारू कहता है, तब ऐसा आभास होता है कि पतंजलि एक ट्रस्ट है जिसका मुनाफे से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि पतंजलि सामानों का कारोबार बाबा के सहयोगी बालकृष्ण के हाथ में है, और अभी-अभी कारोबार की दुनिया की एक सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका, फोब्र्स का जो सर्वे सामने आया है, उसमें भारत के सबसे संपन्न सौ खरबपतियों में इस बालकृष्ण का नाम भी है जिसके नाम पर 25 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति लिखाई हुई है। और यह एक निजी हैसियत से पाई हुई संपत्ति है, किसी ट्रस्ट की संपत्ति नहीं है। इस पत्रिका के आंकड़े बताते हैं कि पतंजलि कारोबार का 94 फीसदी शेयर अकेले बालकृष्ण के नाम पर है।
किसी के नाम पर कारोबार रहने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब इसके लिए भगवा कपड़े और योगी का चोला पहनकर, अपने को राष्ट्रवादी और स्वदेशी बताकर और दूसरों को लुटेरा और मिलावटी बताकर जब यह कारोबार खड़ा किया जाता है, जब यह झांसा खड़ा किया जाता है कि मानो यह कारोबार कोई समाजसेवक ट्रस्ट कर रहा है जिसका मुनाफा किसी के नाम पर नहीं रहेगा, तो वह झांसा बुरा है।
और फिर यह देखें कि बालकृष्ण कौन है, तो बालकृष्ण की नागरिकता को लेकर बरसों से विवाद चले आ रहा है कि वह नेपाली मूल का है, और भारतीय नागरिकता पाने के लिए उसने जिन संस्थानों से पढ़-लिखकर सर्टिफिकेट पाने की बात सरकारी अर्जी में लिखी थी, उन संस्थानों का ही या तो खुद का अस्तित्व नहीं है, या फिर वहां पर बालकृष्ण नाम के ऐसे किसी शख्स का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इसके अलावा अखबारों की कतरनों में यह अच्छी तरह दर्ज है कि केन्द्र सरकार की बहुत सी जांच एजेंसियों ने किस तरह बालकृष्ण को मनी लॉड्रिंग की जांच के घेरे में लिया था, बहुत से नोटिस भी दिए थे, फाईलें भी बनी थीं, लेकिन फिर भी मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह रामदेव एक राजयोगी का दर्जा पा गए, उसी तरह बालकृष्ण एक राजमाफी का दर्जा पा गया, और सारी जांच बंद हो गई।
रामदेव दूसरी कंपनियों के सामानों में जिस मिलावट की बात करते हैं, और अपने सामान को बढ़ावा देते हैं, वही मिलावट वे अपने कारोबार और अपनी लफ्फाजी में कर रहे हैं, जब वे अपने आपको अकेली स्वदेशी कंपनी की तरह पेश करते हैं। हकीकत तो यह है कि जिन सौ सबसे बड़े खरबपतियों की लिस्ट में उनके सहयोगी बालकृष्ण बीचोंबीच हैं, उस लिस्ट के शायद सारे ही लोग भारत के ही उद्योगपति हैं, और उनका काम और कारोबार भी हिन्दुस्तानी ही है। उन्होंने कभी कालेधन को लेकर असंभव किस्म के गैरजिम्मेदार नारे भी नहीं लगाए, और अपने कारोबार को एक कारोबारी की तरह बढ़ाया है।
रामदेव अपने धंधे को बढ़ाने के लिए सरकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं, सार्वजनिक जगहों और कार्यक्रमों का इस्तेमाल कर रहे हैं, टैक्स रियायतों और जांच एजेंसियों की अनदेखी का इस्तेमाल कर रहे हैं, सस्ती सरकारी जमीन पा रहे हैं, मध्यप्रदेश में तो सरकार सरकारी राशन दुकानों से पतंजलि के सामान बेचने जा रही है, और रामदेव आज देश के सबसे रफ्तार से बढ़ते हुए ऐसे कारोबार हैं, जिसका 94 फीसदी मालिक बालकृष्ण है।
दरअसल सार्वजनिक जीवन में लोगों को कारोबार और समाजसेवा, इन दोनों को अलग-अलग करके ही चलना चाहिए। खासकर जो लोग नैतिकता और ईमानदारी, देशभक्ति और राष्ट्रसेवा के नारे कुछ अधिक ही लगाते हैं, उन्हें यह भी साफ करना चाहिए कि उनका कारोबार जो मुनाफा करता है, उसका मालिक कोई ट्रस्ट है, या कि कोई एक व्यक्ति है? उस मुनाफे का क्या इस्तेमाल होता है, और अगर यह निजी कारोबार है तो इसकी तस्वीर एक समाजसेवा की तरह, देशसेवा की तरह पेश करके बाकी कारोबारियों को खलनायक और मुजरिम की तरह पेश करना कहां की नैतिकता है?

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