कश्मीर पर बातचीत सबसे, और बिना शर्त की जाए...

संपादकीय
7 सितंबर 2016
कश्मीर में सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल से वहां के अलगाववादी नेताओं ने मुलाकात नहीं की, और इसके साथ ही भारत सरकार, कश्मीर सरकार, और कश्मीर के इन अलगाववादियों के बीच मतभेद की एक खाई सामने आई है, और इसके चलते कोई कारगर बातचीत होते नहीं दिख रही है। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी चुनी हुई शब्दावली में यह बात बार-बार दुहराई कि कश्मीर में अमन-चैन चाहने वाले लोगों से ही बात होगी, और जब यह प्रतिनिधि मंडल कश्मीर गया, उस वक्त भी सीपीएम ने इसमें शामिल होने के साथ-साथ यह खुली मांग की थी कि इसे बिना किसी शर्त के कश्मीर विवाद के सभी संबंधित पहलुओं से बात करनी चाहिए। लेकिन कश्मीर के अलगाववादियों से बात करने का उनका कोई इरादा नहीं था। दूसरी तरफ अलगाववादियों ने यह साफ कर दिया था कि कश्मीर को विवादित इलाका माने बिना वे किसी बात को किसी काम का नहीं समझते। और भारत सरकार, राजनाथ सिंह, मोदी, बार-बार यह कह चुके हैं कि पूरा कश्मीर भारत का निर्विवाद हिस्सा है, और उस पर कोई बात नहीं हो सकती। वामपंथी सोच यह है कि बातचीत बिना शर्त होनी चाहिए, और हर किसी से होनी चाहिए।
दरअसल दुनिया में हथियारबंद लड़ाई, या राजनीतिक मतभेद को लेकर जब कभी सरकार और बागियों या अलगाववादियों के बीच बातचीत होती है, तो जो बुनियादी मतभेद बातचीत में आड़े आते हैं, उनमें यही दो-तीन बातें खास रहती हैं। एक तो यह कि बातचीत कुछ शर्तों के साथ हो, या बिना शर्तों के। दूसरी बात यह रहती है कि हथियारबंद आंदोलन में लोग पहले हथियार छोड़ें, और उसके बाद फिर बातचीत शुरू हो। हमें जितना याद पड़ रहा है भारत में ऐसे कई मौके आए जब हथियारबंद आतंक भी चलते रहा, और उस बीच भी सरकार ने लोगों से बात की। ऐसा उत्तर-पूर्व से लेकर पंजाब तक कई जगहों पर हुआ, और जब कोई लोकतांत्रिक समाधान ढूंढना होता है, तो जिस पक्ष का लोकतंत्र पर भरोसा अधिक है, उसी पर जिम्मेदारी भी अधिक आती है। हथियारबंद बागी, आतंकी, या नक्सलियों से लोग तो अपनी मांगों पर अड़े रह सकते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हमने कुछ बरस पहले यह देखा है कि एक कलेक्टर को अगुवा करके नक्सलियों ने सरकार को बातचीत की टेबिल पर आने के लिए मजबूर किया था, और मोटे तौर पर बिना किसी सरकारी शर्त के, और महज नक्सल-शर्तों के साथ वह बातचीत हुई थी, और उसके तहत तय की गई कई बातों पर अमल भी हुआ था।
 इसलिए लोकतांत्रिक सरकार चलाने वाले लोगों को शर्तों को लेकर अडऩा नहीं चाहिए। जो बागी हैं, आतंकी हैं, जो अलग देश या प्रदेश चाहते हैं, जिनका लोकतंत्र को खत्म करने का खुला एजेंडा है, उनसे तो लोकतांत्रिक-समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन केन्द्र सरकार को कश्मीर के मामले में बिना किसी हिचक के हर किसी से बात करनी चाहिए, जो कि इस देश के नागरिक हैं। बहुत से मामलों में तो दुनिया के दो देश भी किसी विवाद पर एक-दूसरे से बात करते ही हैं। कश्मीर के मामले में भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें एक-दूसरे से बहुत बातें कर चुकी हैं, और फिलहाल सरहद पर एक अस्थायी इंतजाम करके दोनों देश इस मुद्दे को टालते आ रहे हैं, क्योंकि इसी एक मुद्दे को लेकर बखेड़ा इतना है कि दोनों देशों के बाकी मामलात धरे रह जाते हैं। हमारा तो यह मानना है कि भारत और पाकिस्तान को कश्मीर सहित तमाम मुद्दों पर बात करना चाहिए। यह बहुत ताजा इतिहास है कि किस तरह बांग्लादेश के साथ भारत की बातचीत से दोनों देशों के बीच कुछ गांवों और जमीन की अदला-बदली भी हो गई, और उन जगहों के नागरिक दूसरे देश के नागरिक हो गए। योरप का इतिहास और वर्तमान इस बात का गवाह है कि किस तरह देशों के बीच की सरहदों को मानो पेंसिल की लकीर की तरह मिटा दिया गया, और तकरीबन पूरा योरप बिना भीतरी सरहदों का एक इलाका हो गया है।
भारत सरकार को या भारत के राज्यों को किसी भी बागी या आतंकी संगठन से बात करते हुए किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि उनके खिलाफ पुलिस या फौजी कार्रवाई करने का विकल्प तो सरकारों के पास हमेशा रहता ही है। न तो सरकार अपने इस हक को छोड़े, और न ही दूसरे पक्ष से उनकी किसी जिद को छोडऩे की शर्त रखे। ऐसी उदारता अगर कश्मीर में दिखाई जाएगी, तो ही कश्मीर का कोई हल निकल सकेगा। वरना फौज और पुलिस के बल पर किसी इलाके को देश में जोड़े रखना न सिर्फ खर्चीला है, बल्कि ऐसा करते हुए बहुत सी अलोकतांत्रिक कार्रवाई भी करनी पड़ती है, जिसका नुकसान इतिहास में दर्ज होते चल रहा है। और किसी इलाके को लोकतंत्र की मूलधारा से बहुत समय तक कटे रहने देना भी देश के व्यापक लोकतांत्रिक हित में नहीं है। ऐसे में उस इलाके के लोगों को लोकतंत्र, और उसमें अपनी भूमिका, दोनों ही गैरजरूरी लगने लगते हैं।

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