गंदगी में अव्वल दर्जा हासिल है इस राज्य को

संपादकीय
9 सितंबर 2016
केन्द्र सरकार के एक ग्रामीण सर्वे में छत्तीसगढ़ इस बार फिर बहुत ही गंदा प्रदेश साबित हुआ है और साफ-सुथरे शहरों की लिस्ट में इस प्रदेश को कोई जगह नहीं मिली है। हम आंकड़ों पर बहुत जाना नहीं चाहते, लेकिन छत्तीसगढ़ में गंदगी की हालत बहुत ही भयानक है। इसके पहले के कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सर्वे में छत्तीसगढ़ की राजधानी एक बरस पहले सबसे प्रदूषित साबित हो चुकी है। यही राजधानी देश के सबसे गंदे शहरों में से एक गिनी जा चुकी है, और इसके पीछे कोई राजनीति भी नहीं थी, निर्विवाद सरकारी एजेंसियों ने देश भर के सर्वे के मुताबिक यह नतीजा निकाला था। ऐसी लिस्ट और ऐसी आंकड़ों पर गए बिना अपनी आंखों से जो दिखता है उस पर भी भरोसा कर लें, तो भी यह प्रदेश भयानक गंदगी का शिकार है, और आदी भी है।  लोगों की तरफ से इस गंदगी को लेकर कोई शिकायत भी नहीं उठती है, और कोई एक जनसंगठन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में जाकर वहां से सरकार और म्युनिसिपल को तरह-तरह के आदेश-निर्देश दिलवाता है, और म्युनिसिपल ऐसे आदेशों को फिर घूरे के ढेर पर फेंककर कचरे को और बढ़ा देता है।
इसकी एक बुनियादी वजह हमको यह लगती है कि इस प्रदेश में म्युनिसिपल से लेकर पंचायतों तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और अफसरों, इन सबकी मोटी दिलचस्पी गौरव पथ नाम के शाही राजमार्ग बनाने में, कांक्रीट के अधिक से अधिक निर्माण करने में, एक-एक इंच खाली जमीन पर बाजारू इमारतें बनाने में दिखती है। गांवों में गौरव पथ नहीं हैं, लेकिन वहां पर दूसरे निर्माण कार्योँ में पंच-सरपंच लगे रहते हैं, अफसर कमीशन लिए बिना चेक नहीं देते हैं, और किसी जिले में किसी कड़क अफसर के पहुंचने पर बहुत से सरपंचों की गिरफ्तारी के आदेश निकलते हैं, उनके पास से पैसों की वसूली के आदेश निकलते हैं, और पंचायतों का कामकाज शहरी म्युनिसिपलों के मुकाबले और अधिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ दिखता है। नतीजा यह है कि नाली, पानी, रौशनी जैसी बुनियादी जिम्मेदारी से मानो पूरी तरह मुक्त होकर हर कोई अपनी कुर्सी की पूरी ताकत को ऐसे निर्माण में लगा रहे हैं जिनमें अच्छी मोटी कमाई की गुंजाइश रहती है। निर्वाचित नेता, अफसर और ठेकेदार मिलकर एक ऐसा बरमूडा-त्रिकोण बनाते हैं जिनमें स्थानीय संस्थाओं की जिम्मेदारी का डूबना तय हो जाता है। नतीजा यह है कि राजधानी नाम के इस रायपुर शहर में हजारों करोड़ के निर्माण हुए हैं, और इसी दौरान इस शहर को सबसे प्रदूषित और सबसे गंदे शहर का कलंक भी हासिल हुआ है।
जब तक स्थानीय संस्थाएं अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता नहीं समझेंगी, जब तक स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक-एक वार्ड में एक-एक करोड़ रूपए तक खर्चीले होते रहेंगे, जब तक जनता ऐसी गंदगी के खिलाफ उठकर खड़ा होना नहीं सीखेगी, तब तक इस जनता को ऐसी ही गंदगी नसीब रहेगी, वह गंदगी की ही हकदार रहेगी। इस प्रदेश में अपनी राजधानी में दक्षिण भारत की निजी कंपनी को सफाई के नाम पर करोड़ों लेकर जाते देखा है, और तरह-तरह के प्रयोग देखे हैं। पुराने लोगों को यह भी याद है कि जिस समय म्युनिसिपल के पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, जब सड़कों पर ट्यूब लाईट तक लगाने के पैसे नहीं थे, और बल्ब जलते थे, उस वक्त भी ऐसे म्युनिसिपल कमिश्नर हुआ करते थे जो कि सुबह 5 बजे से पैदल पूरे शहर का दौरा करते थे, और शहर को साफ रखते थे। आज म्युनिसिपलों और पंचायतों में पैसा नाली में बह रहा है, अफसर और नेता अपनी निजी गाडिय़ों के लिए झगड़ा कर रहे हैं कि कौन कितनी महंगी गाड़ी हासिल कर सकते हैं, और शहर घूरा बन रहा है। हमारे पास ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि राजधानी से अधिक साफ-सुथरा प्रदेश का कोई और शहर हो सकता है, हालांकि एक सिरे पर बसे हुए एक जिला मुख्यालय अंबिकापुर में पिछली कलेक्टर और म्युनिसिपल ने मिलकर शहर को साफ करने, और साफ रखने की एक मिसाल पेश की है, जिससे बाकी प्रदेश, बाकी शहर नसीहत ले सकते थे, लेकिन उसका असर अंबिकापुर से बाहर और कहीं नहीं दिखा।
स्थानीय संस्थाओं के चुनावों में और लोकतंत्र में लोगों का अच्छा काम करना कोई मुद्दा नहीं रह गया है, अंधाधुंध खर्च से वोट खरीदकर, पार्टी या किसी और आधार पर चुनाव जीतकर जो लोग स्थानीय शासन की कुर्सियों पर पहुंच जाते हैं, वे अगर शहर को घूरा भी बना दे रहे हैं, तो यह प्रदेश सरकार के सोचने की बात है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तो दो पार्टियों के कब्जे वाले म्युनिसिपल की है। यहां मेयर कांग्रेस का है, और राज्य शासन का मंत्री भाजपा का। और इस राजधानी का तजुर्बा यह है कि यह देश का सबसे बड़ा घूरा बना हुआ है। इस बारे में राज्य सरकार को सोचना चाहिए कि जिस शहर में पूरी सरकार बैठती है, और इस छोटे से राज्य के जिस शहर में बचपन से मुख्य सचिव रहते आए हैं, उस शहर को घूरे का राष्ट्रीय दर्जा मिलने पर इस सरकार को तकलीफ होती है या नहीं, यह तो पता नहीं है।

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