सरकार हो या अखबार, सभी नजरियों की भागीदारी जरूरी..

संपादकीय
29 अक्टूबर 2016
मध्यप्रदेश के मंदसौर की एक खबर है कि वहां सरकारी कॉलेज में दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को सरकार की एक योजना के तहत पीठ के जो बैग बांटे गए, उन पर पीछे एसटी-एससी योजना के तहत छपा हुआ है। जब इस पर हंगामा हुआ तो प्रिंसिपल का कहना था कि अगर किसी को इससे आपत्ति है तो वे बैग पर से इसे मिटवा देंगे। ऐसा ही हाल गरीब बस्तियों में कई जगह घरों के बाहर दीवारों पर दिखता है जहां सरकार मकानों पर गरीबी की रेखा के नीचे, या जाति का जिक्र लिखवा देती है। समाज और सरकार में जगह-जगह ऐसी कई बातें नजर आती हैं, और उनसे यह लगता है कि ताकत और अहमियत के बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को भी कुछ समझ पाने की जरूरत बाकी है।
यह लिखने का मकसद कहीं भी दूसरों की आलोचना करना नहीं है, खुद मीडिया में समझ की कमी की ऐसी हालत है कि उसकी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को सामाजिक हकीकत का अंदाज भी नहीं रहता। भारत के काफी बड़े हिस्से के, कम से कम हिन्दी मीडिया को देखते हुए ऐसा लगता है कि अखबारों में लिखने का हक रखने वाले अखबारनवीसों के बीच सवर्णों का बोलबाला है। बहुत ही कम पत्रकार अल्पसंख्यक तबकों से आते हैं, या कि दलित-आदिवासी रहते हैं। संपादकों के नाम भी देखें तो शायद ही कोई ऐसे तबकों में से आया हुआ हो। नतीजा यह होता है कि जब सामाजिक मुद्दों पर बातचीत होती है, तो सबसे दबे-कुचले लोगों की बात कहने वाले लोग वहां पर नहीं रहते। और हिन्दुस्तान के ऐसे हाल को जब अमरीका या ब्रिटेन के मीडिया से देखें, तो फर्क समझ आता है कि किस तरह पश्चिम के प्रतिष्ठित अखबार या टीवी समाचार चैनलों में काम करने वाले प्रेस या मीडियाकर्मियों को उनके धर्म, या उनके रंग के आधार पर भी चुना जाता है ताकि संपादक मंडल में हर नजरिए की मौजूदगी हो, और हर किस्म के तजुर्बे वहां सामने आ सकें।
कुछ ऐसी ही नौबत सरकारों में रहती है जहां फैसले लेने वाले ऊंचे तबकों में कई ऐसे मौके रहते हैं जब कोई दलित-आदिवासी नहीं रहते, या अल्पसंख्यक नहीं रहते, या जाति या धर्म से परे की भी बात करें, तो गरीबों के मुद्दों की समझ रखने वाले लोग ऐसे फैसलों की कुर्सियों पर नहीं रहते। नतीजा यह होता है कि करोड़पतियों और अरबपतियों से भर चली संसद और विधानसभाओं से लेकर मंत्रियों और अफसरों तक के बीच कुछ नजरिए गायब रहते हैं। जब गाय के बारे में फैसला लिया जाता है, तो गाय की पूजा करने वाले लोग तो उन टेबिलों पर रहते हैं, लेकिन गाय के मरने के बाद उसे ठिकाने लगाने वाले तबके, और उससे जुड़े दूसरे रोजगारों की समझ रखने वाले कोई लोग ऐसे ताकतवर फैसलों के वक्त नहीं रहते। ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं, और इनके बीच देश की सामाजिक हकीकत के इतिहास के जानकार भी नहीं रहते, या रहते भी हैं, तो वे इतिहास के साथ खड़े रहने का हौसला नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि कुछ चुनिंदा ताकतवर तबकों के लोग अपनी पसंद को एक काल्पनिक इतिहास मानकर फैसले ले लेते हैं, और अपने से असहमति रखने वाले कमजोर लोगों के सिर पर थोप देते हैं।
धीरे-धीरे सरकार और राजनीति, संसद और अदालत, मीडिया और बाकी कारोबार, इन सभी जगहों के सीमित संपन्न तबकों के लोग मिलकर एक किस्म का नया तथाकथित लोकतांत्रिक शासक वर्ग बन जाते हैं, और बाकी कमजोर बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों की अपने नजरिए से व्याख्या करने लगते हैं। यह नौबत कुछ उसी तरह की है जैसी आज अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में दुनिया के एक सबसे कुख्यात उम्मीदवार साबित हो चुके रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प ने खड़ी कर दी है। परले दर्जे की मूर्खता के साथ जब दौलत का अहंकार जुड़कर मैदान में उतरता है, तो वह एक डोनाल्ड ट्रम्प बना पाता है। हिन्दुस्तान में भी देश-प्रदेश के अनगिनत फैसले ऐसे ही अज्ञान के साथ लिए जा रहे हैं, और दूसरों पर थोपे जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि एक जिम्मेदार अखबार से लेकर एक जिम्मेदार सरकार तक हर कहीं फैसले लेने में समाज के सभी तबकों, पृष्ठभूमियों की भागीदारी होनी चाहिए, और जहां पर ऐसी जाहिर हिस्सेदारी निभाने के लिए लोग मौजूद न हों, वहां पर सरकार, समाज, या अखबार को कुछ थिंकटैंक बनाकर अपने खुद के शिक्षण-प्रशिक्षण का इंतजाम करना चाहिए, अपनी खुद की परिपक्वता की कोशिश करनी चाहिए। दिक्कत यही होती है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सक्षम तबकों का अहंकार उन्हें यह एहसास नहीं होने देता कि उन्हें भी कुछ जानने और सीखने की जरूरत है। अपने आपके सर्वज्ञ होने की खुशफहमी लोगों को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने नहीं देती, और ऐसे अहंकार को पूरा समाज भुगतता है। मंदसौर के जिस सरकारी कॉलेज ने एसटी-एससी लिखे हुए ऐसे बैग तैयार करवाए हैं, वहां के प्राचार्य को निश्चित ही इस सामाजिक हकीकत की समझ नहीं होगी कि लोगों की पीठ पर उनकी जात की तख्ती टांग देने से वे किस तरह के सामाजिक भेदभाव का शिकार और अधिक होते चलेंगे।

लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार

संपादकीय
28 अक्टूबर 2016
भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के साथ देश के कुछ प्रमुख लोग अभी कश्मीर गए और वहां करीब दो दर्जन प्रमुख लोगों, तबकों से बात करके यह तलाशने की कोशिश की कि कश्मीर में कैसे अमन-चैन लौट सकता है। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि यह उनकी निजी पहल है और उनके पास पार्टी या केन्द्र सरकार का कहा हुआ कुछ नहीं है, और यह एक गैरसरकारी पहल है। जिन लोगों ने कश्मीर को ध्यान से देखना जारी रखा है, उन्हें यह देखकर खुशी हुई होगी कि वहां के जिन अलगाववादियों से बात करने में केन्द्रीय गृहमंत्री ने अपने कश्मीर प्रवास के दौरान परहेज किया था, और जिन अलगाववादियों ने राजनाथ सिंह के साथ गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के गैरसरकारी, गैरभाजपाई सदस्यों से भी बात करने से इंकार कर दिया था, उन अलगाववादियों से भी यशवंत सिन्हा वाले प्रतिनिधिमंडल की बातचीत हुई। और यह बात उभरकर सामने आई कि अलगाववादी कश्मीर-समस्या का एक अपरिहार्य हिस्सा हैं, और उनसे बात किए बिना समाधान की पूरी कोशिश नहीं हो सकती। दूसरी बात यह भी उभरकर सामने आई कि बातचीत बिना किसी शर्त के ही हो सकती है।
हम दूर कश्मीर से हटकर थोड़ा करीब आएं तो बस्तर के बारे में अभी सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह सुझाया कि वह नक्सलियों से बातचीत करें। ऐसी शांतिवार्ता की यह सलाह कोई आदेश तो नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की बात वजनदार रहती है, और बस्तर के बहुत से मोर्चों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में इतने किस्म के मुकदमे चल रहे हैं कि राज्य सरकार भी शायद सुप्रीम कोर्ट से उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस करने के बजाय बातचीत की एक और कोशिश को बेहतर समझे, और वही लोकतंत्र के लिए बेहतर भी होगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आने के हफ्ते-दस दिन पहले ही हमने इसी जगह संपादकीय में यह बात राज्य सरकार को सुझाई थी, और ऐसे मध्यस्थ के रूप में हमने एक पिछले मुख्य सचिव सुनील कुमार का नाम भी लिखा था जो कि बस्तर के एक कलेक्टर के अपहरण के बाद रिहाई की समझौता-वार्ता में शामिल रह चुके हैं।
कश्मीर हो या बस्तर हो, बातचीत के बिना लोकतंत्र का कोई गुजारा नहीं हो सकता। ब्रिटेन में उत्तरी आयरलैंड का सशस्त्र आंदोलन एक सदी से भी अधिक वक्त से चले आ रहा था। आए दिन इसमें कत्ल होते थे, और धमाके होते थे। वह सशस्त्र आंदोलन राजनीतिक विचारधारा वाला भी था। और जब कई दौर की शांतिवार्ताएं असफल साबित हो चुकी थीं, तो अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बरस 2000 में उत्तरी आयरलैंड पहुंचे और सभी तबकों को बिठाकर मध्यस्थता की, उस वक्त समझौते के बाद हथियार डाले गए, और तब कायम हुई शांति आज तक चली आ रही है। इसलिए समझौते में हथियार रखे-रखे भी वार्ता होती है, दोनों तबकों को अपने पिछले कड़े रूख को छोड़कर कुछ-कुछ कदम आगे बढऩा पड़ता है, ऐसे मध्यस्थ स्वीकार करने पड़ते हैं जो कि दोनों पक्षों को मान्य हों, और जब नीयत अमनवापिसी की हो, तो फिर अहंकार को परे रखकर बातचीत करके अमन की कोशिश की जानी चाहिए और वैसी कोशिश ही कामयाब भी होती है। पिछली कई वार्ताओं की असफलता को देखकर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए, और पूरी शांति कायम होने तक बातचीत जारी रखनी चाहिए। हमारा यह मानना है कि बातचीत के पहले कोई शर्त नहीं होनी चाहिए, और किसी मुद्दे से जुड़े हुए तमाम लोगों से बिना किसी परहेज के बातचीत होनी चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास गवाह है कि अर्जुन सिंह ने डाकुओं से बात करके उनका आत्मसमर्पण करवाया था, और मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश सीमा के करीब दशकों से आतंक बने हुए डाकू घर बैठ गए थे। अब उस वक्त कोई ऐसी शर्त रखी जाती कि पहले हथियार डाले जाएं, फिर बातचीत शुरू होगी, तो वह बात किसी किनारे पहुंचती ही नहीं। और ऐसी तमाम बातचीत की अधिक जिम्मेदारी उन लोकतांत्रिक सरकारों की होती है जो कि लोकतंत्र के आधार पर चुनकर आईं हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की शपथ ली है, और जिनका लोकतंत्र पर भरोसा है। ऐसी सरकारों की जीत तो उसी दिन हो जाती है, जब ये सरकारें लोकतंत्र पर भरोसा न रखने वाले लोगों, अलगाववादी लोगों, हिंसक और हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले लोगों को बातचीत की मेज पर ले आती हैं। इस जीत के बाद की समझौते की जीत तो छोटी होती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जो सुझाया है, या निर्देश दिया है, हम उसे सही मानते हैं, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक, उत्तर-पूर्व से लेकर पाकिस्तान तक, देश के भीतर और बाहर, बातचीत की हर कोशिश होनी चाहिए क्योंकि तमाम हथियारों और बुलेटप्रूफ जैकेटों के रहते हुए भी, लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार है।

आतंक के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े आतंकी की नसीहत

संपादकीय
27 अक्टूबर 2016
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने अभी एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुलकर काम करने की जरूरत है। यह बात कहने और सुनने में अच्छी लगती है, और यह बात दक्षिण एशिया से परे भी दुनिया के तमाम देशों पर लागू होती है। लेकिन अमरीका का कहा हुआ और उसका किया हुआ, इन दोनों में बड़ा फर्क रहता है। खुद अमरीका दुनिया के अनगिनत देशों में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए के मार्फत गृहयुद्ध छिड़वाते आया है, तख्तापलट करवाते आया है, और इराक के मामले में उसने हद ही पार कर दी थी जब उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे किस्सों को सुबूत की तरह पेश करके जनसंहार के हथियारों को खत्म करने के नाम पर इराक पर फौजी हमला किया, और लाखों लोगों को मार डाला। इस पूरी कार्रवाई के बाद वहां से एक हथियार भी बरामद नहीं हुआ है। इसलिए यह मानना गलत है कि आतंकी सिर्फ कोई संगठन या गिरोह होते हैं, दुनिया में अमरीका सरीखी सरकार अपने आपमें आतंकी संगठन है, और वह हथियारों के बिना तो सारे वक्त आर्थिक प्रतिबंधों की नाकेबंदी से आतंक फैलाती है, गरीब मुल्कों से उनका छीनती है, और लोकतंत्र लाने के नाम पर देशों को तबाह करके वहां अपनी पि_ू तानाशाह सरकारें बिठाती है। अमरीका का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने कहीं तालिबानों को बढ़ावा दिया, तो कहीं किसी और आतंकी संगठन को। आज अमरीका पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के सिलसिले में मसीहाई अंदाज में यह नसीहत देता है कि आतंक के खिलाफ मिलजुलकर काम करने की जरूरत है, तो यह एक बड़े पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है।
दरअसल अमरीका अपनी कारोबारी और फौजी नीयत के चलते हुए दक्षिण एशिया के इस इलाके में जिस तरह से पाकिस्तान में तानाशाही, फौजी मनमानी, और आतंकियों को बढ़ावा देते आया है, और एक कमजोर लोकतंत्र को अपने पर आश्रित मुल्क बनाकर रखते आया है, उसके चलते ही इस इलाके में आतंक पनपा है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते शायद इतने खराब न हुए होते, अगर पाकिस्तान के पास अमरीका से आई हुई बहुत बड़ी आर्थिक मदद न होती। अगर महज अपने पैसों से पाकिस्तान को फौजी और आतंकी तैयारी करनी होती, तो उसके लोग भूखे मर गए होते। इसलिए अमरीका के लिए नसीहत देने के लिए ज्यादा आसान बात हो सकती थी, पाकिस्तान की फौजी और आतंकी नीयत और हरकत पर रोक लगाना। और ऐसा भी नहीं है कि हम यहां हिन्दुस्तान में बैठकर यह बात कह रहे हैं, खुद अमरीकी संसद में समय-समय पर कई लोग इस बात को उठाते आए हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोकी जाए। लेकिन अमरीका की एक मजबूरी यह भी है कि अगर वह पाकिस्तान को बेआसरा, बेसहारा छोड़ दे, तो पाकिस्तान पल भर में चीन की गोद में जाकर बैठ जाएगा, और यह बात अमरीका की विस्तारवादी फौजी नीति और नीयत के खिलाफ जाएगी। इसलिए अमरीका इस इलाके में आतंक फैलने देने की कीमत पर भी पाकिस्तान को पाल रहा है, और बाकी लोगों को नसीहत दे रहा है कि वे लोग मिलजुलकर आतंक से लड़ें।
आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था महज बहस और कागजी फैसलों का दफ्तर बनकर रह गई है, और जिस अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी जमीन पर जगह दी थी, वह अमरीका इस अंतरराष्ट्रीय संस्था को एक पांवपोंछने की तरह मानता है, और इसके दर्जन भर बयानों के बावजूद उसके खिलाफ जाकर अमरीका ने इराक पर हमला किया था। दुनिया चाहे लोकतांत्रिक रूप से कितनी भी विकसित होने की खुशफहमी न पाल ले, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और फैसलों में एक पुरानी कहावत ही लागू होती है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। इसलिए अमरीका दुनिया भर में आतंक को बढ़ावा देकर भी यह नसीहत बांट रहा है कि लोग आतंक के खिलाफ मिलजुलकर लड़ें।

टाटा के मुखिया की बर्खास्तगी से निकलने वाले सबक

संपादकीय
26 अक्टूबर 2016
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक, टाटा को परिवार से बाहर का एक आदमी संभाल रहा था, लेकिन उसके तौरतरीकों से खफा होकर टाटा के डायरेक्टरों ने एक मिनट में उसे बाहर कर दिया, और पिछले मुखिया रतन टाटा को चार महीनों के लिए वापिस बुलाकर कंपनी संभालने का जिम्मा दिया है। रतन टाटा इस कंपनी के संस्थापक परिवार के थे, और कंपनी के शेयर होल्डर भी थे। वे अपनी मर्जी से कुछ समय पहले रिटायर हुए थे, और घर बैठकर अपनी पूंजी को नए-नए कारोबारियों के साथ लगा रहे थे, और समाजसेवा के कुछ काम कर रहे थे। उनकी जगह साइरस मिस्त्री नाम के जिस नौजवान को यह विशाल साम्राज्य दिया गया था, वह कारोबार को भी शायद ठीक से नहीं संभाल पाया था, और कंपनी से जुड़े हुए समाजसेवा के काम भी वह शायद ठीक से नहीं देख पा रहा था।
अब देश के निजी क्षेत्र के इस एक सबसे बड़े ओहदे को संभाल रहे आदमी को जिस तरह पलभर में निकाल कर बाहर कर दिया गया है, उसे देखते हुए सोशल मीडिया पर यह मजाक किया जा रहा है कि सुरक्षित तो सरकारी नौकरी ही होती है, बाकी कोई नौकरी सुरक्षित नहीं रहती। अब इतना बड़ा तो ओहदा देश में अधिक संख्या में नहीं हो सकता, लेकिन इससे छोटे-छोटे पदों पर बैठे हुए लोग भी एक सबक ले सकते हैं कि आज की बाजार व्यवस्था में कोई भी कुर्सी ऐसी सुरक्षित नहीं रहती कि उस पर बैठे हुए लोग काम ठीक से न करते हुए भी अपनी नौकरी बचा सकें। यह बात छोटी-छोटी कुर्सियों पर भी लागू होती है, और सरकार से परे भी हर जगह इसलिए लागू होती है कि मजदूर और कर्मचारी कानून भी निकम्मेपन को नहीं बचा सकते। यह निकम्मापन टाटा के इस अफसर के संदर्भ में नहीं कहा जा रहा है, लेकिन जितने तरह की उम्मीदें किसी से कंपनी करती है, या मालिक करता है, उसे पूरा करना ही नौकरी को बचा सकता है।
दुनिया में जो कामयाब और उदार अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे किसी तरह की सुरक्षा कर्मचारियों को नहीं देती हैं, और अमरीका जैसे देश में लोगों को बस दराज खाली करके निकलने जितना वक्त मिलता है। भारत में भी लोगों के सामने यह मिसाल बेहतर काम करने के लिए एक प्रेरणा की तरह काम आनी चाहिए। काम अच्छा होने पर लोग कम उम्र में भी आगे बढ़ सकते हैं, और काम अच्छा न होने पर कोई भी नौकरी कायम भी नहीं रहती। टाटा में हुए इस ताजा फेरबदल की बाकी जानकारी आने में कुछ दिन का वक्त लगेगा, लेकिन यह बात सोचने के लायक है कि समाजसेवा में कंपनी की भूमिका को ठीक से ना निभाना भी कुर्सी जाने की वजह हो सकता है। 

बस्तर पुलिस ने जलाए लोकतंत्र के पुतले, और सरकारी खामोशी

विशेष संपादकीय
25 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल पुलिस ने फौजी किस्म की वर्दी पहने हुए सामूहिक रूप से जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, राजनीतिक नेताओं, और पत्रकारों के पुतले जलाए। और प्रतीक के रूप में स्थानीय थानों की पुलिस ने पुतलों की आगे बुझाने की कोशिश भी दिखाई। इन तस्वीरों को देखें तो यह हैरानी होती है कि पुलिस का एक हिस्सा एक ऐसे काम को रोक रहा है, जो कि पुलिस का ही दूसरा हिस्सा कर रहा है। और छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां पर पुलिस कर्मचारियों की कोई यूनियन भी नहीं है जिसे कि ऐसे किसी प्रदर्शन की छूट मिल सके। अभी तक राज्य सरकार की तरफ से कल की इस व्यापक सोची-समझी अलोकतांत्रिक कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है, इसलिए यह सोचना भी गलत होगा कि सरकार इस पर कोई कार्रवाई करने का सोच रही है। लेकिन यह एक राज्य का मामला नहीं है, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की लोकतांत्रिक परंपराओं और इसके लोकतांत्रिक ढांचे की बात है, और उसी नजरिए से बस्तर की कल की इस भयानक कार्रवाई के बारे में सोचना जरूरी है जिसमें पुलिस ने आदिवासियों का तो नहीं, लेकिन शहरी लोकतंत्र का लहू जरूर बहाया है।
बस्तर में अभी पिछले दो-चार दिनों के भीतर ही पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पेश सीबीआई जांच रिपोर्ट खबरों में है जिसमें ऐसा कहा बताया जाता है कि ताड़मेटला की बहुत चर्चित आगजनी में सुरक्षा बलों ने आदिवासी बस्तियों में आग लगाई थी। बस्तर में काम कर रहे सामाजिक संगठन, मीडिया के कुछ लोग, और बहुत से स्थानीय आदिवासी पहले से यही बात कह रहे थे, लेकिन राज्य सरकार में उनकी कोई सुनवाई नहीं थी। अब जब यह बात सीबीआई के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है, तो बस्तर की पुलिस मानो बौखलाते हुए ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही है जैसा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में याद नहीं पड़ता है। बस्तर के कई जिलों में सैकड़ों या हजारों पुलिस वालों ने जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों-पत्रकारों के पुतले यह कहते हुए जलाए कि वे नक्सल-हिमायती हैं, या कि नक्सल हैं।
अब यह बुनियादी सवाल उठता है कि बस्तर की जो पुलिस अनगिनत बेकसूर लोगों के खिलाफ अदालती कार्रवाई से लेकर मुठभेड़ हत्या तक की तोहमतें झेल रही है, उस पुलिस को कानूनी कार्रवाई करने से कौन रोक रहा था अगर ये सारे लोग नक्सली हैं? और अगर यह लोग नक्सली हैं भी, तो भी पुलिस का काम जांच करके उन्हें गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने का है, न कि सड़कों पर उनके पुतले जलाते हुए अपनी वर्दी की अलोकतांत्रिक ताकत का हिंसक प्रदर्शन करने का। लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है कि पुलिस कानून को अपने हाथ में लेकर लोगों को मुजरिम करार दे, और अपनी वर्दी के साथ जुड़े हुए नियमों को कुचलकर ऐसा जश्न मनाए कि वह जिसके चाहे उसके पुतले जला सकती है। यहां पर दो दिन पहले बस्तर के भारी विवादास्पद आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी का कैमरों के सामने दिया गया वह राजनीतिक और अलोकतांत्रिक बयान भी देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने खुले राजनीतिक-अहंकार के साथ लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ बयानबाजी की है, और अपने-आपको लोकतंत्र से ऊपर साबित करने की कोशिश की है। उनका यह बयान आदिवासी बस्तियों को जलाने की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के बाद और उसी संदर्भ में आया है। बस्तियों के बाद अब शहरों में लोकतांत्रिक लोगों के पुतले जलाकर कल्लूरी की पुलिस ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र की ऐसी आगजनी पर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता, और बस्तर की पुलिस बस्तियों के बाद बेकसूरों के पुतले भी एक आंदोलन की तरह जला सकती है।
छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक ढांचे में यह एक बहुत ही अनोखी नौबत है कि एक अफसर इस कदर अलोकतांत्रिक बर्ताव कर रहा है, और सरकार में कोई भी उस पर रोक लगाने की न सोच रहा है, न ऐसा कुछ बोल रहा है। जब निर्वाचित लोकतांत्रिक ताकतें लोकतंत्र को इस तरह और इस हद तक हांकने की ताकत वर्दीधारी अफसरों को दे देती हैं, तो वह एक भयानक खतरनाक नौबत से कम कुछ नहीं है। कोई अफसर नक्सलियों को मारने में कामयाब हो सकता है, लेकिन क्या इस खूबी को देखते हुए उसे बस्तर जैसे एक नाजुक और संवेदनशील, संविधान में विशेष हिफाजत मिले हुए आदिवासी इलाके में तानाशाही का ऐसा हक देना जायज है? ऐसे में मुल्क की सरहद पर बहादुरी दिखाने वाले फौजियों को भी कुछ कत्ल माफ होने चाहिए, और फौजियों को भी बस्तर की तरह यह छूट मिलनी चाहिए कि वे भारत के जिन सामाजिक आंदोलनकारियों को पाकिस्तान का हिमायती समझते हैं उनके पुतले जलाने के लिए दिल्ली के राजपथ पर वर्दी में इकट्ठे हों।
पुलिस या किसी भी फौज में अफसर तो आते-जाते रहते हैं, और हिंसक और तानाशाह अफसर भी लोगों ने वक्त-वक्त पर देखे हैं, लेकिन वे अफसर लोकतंत्र की आखिरी ताकत नहीं रहते हैं। लोकतंत्र में आखिरी ताकत निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहते हैं, और छत्तीसगढ़ की निर्वाचित सरकार सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के आदेश देखने के बावजूद सबसे बेजुबान आदिवासियों के बस्तर में जिस तरह की तानाशाही की छूट देकर चल रही है, वह रूख हक्का-बक्का करने वाला है। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार ऐसे अफसरों के कितने ही जुर्म अनदेखे क्यों न करें, बस्तर सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और हमको वह दिन दूर नहीं दिख रहा है जब लोकतंत्र के पुतलों को इस तरह से जलाने को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाएगा। अब यह काम सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुतले जलने के पहले होगा, या बाद में, यह देखना होगा।

सोशल मीडिया से पाखंड का भांडा फूट रहा है...

संपादकीय
24 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान में आज उग्र राष्ट्रवाद के चलते हुए जिस तरह से पाकिस्तान और चीन के सामानों और इंसानों के बहिष्कार के फतवे चल रहे हैं, उनमें सोशल मीडिया की मेहरबानी से भांडाफोड़ भी होते चल रहा है। मुंबई में एक कागजी शेर राज ठाकरे ने फतवा जारी करके पाकिस्तानी कलाकार वाली एक मुंबईया फिल्म के बहिष्कार का नारा दिया, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भूलकर राज ठाकरे और फिल्म उद्योग के बीच बिचौलिया बनकर यह समझौता कराया कि इस फिल्म का निर्माता सैनिक कल्याण कोष में पांच करोड़ दान देगा। लेकिन इसके बाद एक बड़ी जायज प्रतिक्रिया भूतपूर्व सैनिकों से लेकर शिवसेना के उद्धव ठाकरे तक से आई कि ऐसी फिरौती के अंदाज में वसूली गई रकम की जरूरत हिन्दुस्तान के सैनिकों को नहीं है।
दूसरी तरफ बाजार में सामानों के बहिष्कार का नाटक भी पूरी तरह से उजागर हो रहा है। जो बाबा रामदेव चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं, उनकी खुद की ट्वीट चीन में बने हुए मोबाइल फोन से पोस्ट हो रही है। दूसरी तरफ उनकी कंपनी जो आयुर्वेद दवाएं बेचती है, उनमें मुल्तानी मिट्टी भी शामिल है जो कि पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी है। और जिन पार्टियों के लोग लगातार ऐसे बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उनमें से भाजपा के राज वाले महाराष्ट्र और गुजरात ने अभी-अभी चीनी कंपनियों के साथ दसियों हजार करोड़ रूपए के अनुबंध किए हैं, और हैरानी और हिकारत की बात यह है कि सड़क किनारे दस-बीस रूपए के चीनी सामान बेचने वाले फेरीवालों के सामानों का बहिष्कार किया जा रहा है। लोगों को इस बात की जानकारी कम है कि नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ इन दोनों के एक सरीखे करीब उद्योगपति सजन जिंदल ने इन दोनों के बीच बातचीत और दोस्ती करवाई, और सजन जिंदल सहित अदानी-अंबानी जैसे उद्योगपति पाकिस्तान के साथ हजारों करोड़ का कारोबार कर रहे हैं। तो बहिष्कार के फतवे महज छोटे लोगों के लिए हैं, और ऐसे दिखावे के लिए हैं जिनसे हिन्दुस्तान के मक्कार लोग अपनी राष्ट्रभक्ति और अपने राष्ट्रप्रेम के सुबूत बैनरों की तरह हवा में लहरा सकें।
आज जब किसी राजनीतिक दल के नेता ऐसे बहिष्कार के फतवे दें, तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि देश के बाकी कारोबार का हिसाब भी सामने रखें। छोटे लोगों के पेट पर लात मारना, और खरबपतियों के कारोबार को जारी रखना, यह कहां का देशप्रेम है? सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों का ऐसा पाखंड उजागर होते चल रहा है। देश के भीतर के मुद्दों पर भी यह बात बार-बार उजागर हुई कि किस तरह गाय को बचाने के नाम पर इंसानों के कत्ल की वकालत करने वाले नेता गाय काटने और गोश्त बेचने वाले कारखानों में भागीदार हैं, उनसे करोड़ों का चंदा लेते हैं। यह एक अच्छी बात है कि सोशल मीडिया से भारत के बेजुबान लोगों को एक नया अधिकार मिला है, और देश-विदेश के ऐसे पाखंड का भांडा फूट रहा है।

उत्तरप्रदेश में सपा राजनीति एक नई नौजवान करवट...

संपादकीय
23 अक्टूबर 2016
उत्तरप्रदेश में सामंती मालिकाना हक की तरह, समाजवाद के नाम पर चलाई जा रही पार्टी और सरकार झेल रही है अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी दरार। ऐसा लग रहा है कि मुलायम सिंह और उनके बेटे के बीच यह पार्टी ऊपर से नीचे तक पूरी तरह दो फांक होने जा रही है, और यह शायद भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा दलीय विभाजन होगा जो कि बाप-बेटे को एक-दूसरे के सामने खड़ा कर देगा। हालांकि अभी इस लड़ाई में कई और बातें आना बाकी है, लेकिन अपने मौजूदा मतभेदों की वजह से भी आज यह मुद्दा लिखने लायक है।
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में समाजवाद के नाम पर जिस तरह का सामंतवाद चलता है, उसकी दो सबसे बड़ी मिसालें उत्तरप्रदेश और बिहार के ये दो बड़े यादव कुनबे हैं जो कि अब समधियाना भी बन चुके हैं। जब ऐसे बड़े-बड़े परिवार अपने सारे विस्तार के साथ एक ही पार्टी, एक ही सरकार, और एक ही प्रदेश पर इस तरह लद जाते हैं कि किसी को सांस लेने के लिए भी अलग से जगह न मिले, तो ऐसे तनाव और ऐसी खींचतान अनहोनी नहीं कही जा सकती। फिर यह भी है कि मुलायम सिंह की राजनीति किसी ईमानदारी के लिए नहीं जानी जाती। अनुपातहीन सम्पत्ति के मामले उनके कुनबे पर चलते रहे हैं, और उत्तरप्रदेश में जातिवाद, भ्रष्टाचार, सत्ता की मनमानी, इन सब में मुलायम सिंह की परले दर्जे की दखल सुनाई पड़ती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी का, विदेश में पढ़कर लौटा नौजवान अगर पार्टी और सरकार के तौर-तरीकों को थोड़ा सा बदलने की कोशिश करता है, तो एक स्वाभाविक टकराव होना बड़ी स्वाभाविक बात है। और समाजवादी पार्टी में आज कुछ उसी तरह की हलचल हो रही है जैसी कि धरती के नीचे लाखों बरस पहले की चट्टानी प्लेटों के खिसकने से भूकंप की शक्ल में होती है।
उत्तरप्रदेश के सामने खड़े चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का भविष्य अभी असमंजस में दिख रहा था। रीता बहुगुणा जैसे जिन नेताओं ने पार्टी को पूरी तरह से डुबाकर रख दिया था, उन्हें किसी चैंपियनशिप की ट्रॉफी की तरह पार्टी में लाकर, सजाकर भाजपा अपनी दुविधा का सुबूत दे रही थी। ऐसे में सबसे बड़ी समाजवादी पार्टी में इस तरह का दो फांक विभाजन भाजपा के लिए बड़े मजे का हो सकता है, लेकिन सिर्फ एक खतरा ऐसे में बाकी दिखता है कि अगर समाजवादी पार्टी का अखिलेश वाला हिस्सा और कांग्रेस पार्टी मिलकर कोई गठबंधन बनाएं, तो भाजपा के सामने एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह की राजनीति अगर इस तरह की एक नौजवान करवट लेती है, तो हो सकता है कि आगे चलकर प्रदेश के लिए वह एक अच्छी बात हो। हम किसी की ईमानदारी और बेईमानी के बारे में यहां अटकलबाजी करना नहीं चाहते, लेकिन उत्तरप्रदेश को करीब से देखने वाले बहुत से अखबारनवीस यह लिखते हैं कि अखिलेश एक बेहतर मुख्यमंत्री हैं, और शायद कम बेईमान हैं, या शायद कुछ ईमानदार हैं। अगर ऐसी बात होती है तो फिर एक सामंती, जातिवादी, और भ्रष्ट पीढ़ी का राजनीति के हाशिए पर चले जाना ही बेहतर होगा।
उत्तरप्रदेश की राजनीति पूरे उत्तर भारत या पूरे हिन्दी भाषी इलाके को प्रभावित करने वाली राजनीति रहती है, और सांसदों की संख्या के हिसाब से भी यह प्रदेश देश में सबसे बड़ा प्रदेश है जिसकी वजह से संसद में भी इस राज्य की पसंद देश की पसंद बनने की संभावना रखती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी अगर राजनीति में आगे बढ़ रही है, तो पारिवारिक टकराव के बावजूद इसके कुछ अच्छे नतीजे हो सकते हैं। फिलहाल यह लिखना समय के पहले लिखने की तरह है, और हो सकता है कि आने वाले हफ्तों में बाप-बेटे एक बार फिर एक साथ हो जाएं। अब उत्तरप्रदेश में कल तक जो रीता बहुगुणा मोदी और अमित शाह के खिलाफ जहरीली और तेजाबी ट्वीट करती थीं, वे आज भाजपा का दुपट्टा पहनकर बड़े गर्व के साथ एक नई पारी शुरू कर रही हैं। तो जिस राजनीति में ऐसे अजीब हमबिस्तर होते हों, वहां पर मुलायम और अखिलेश तो फिर भी अब तक एक ही पार्टी के बाप-बेटे हैं।

इजराइल से सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, साइबर सुरक्षा सीखी जाए

संपादकीय
22 अक्टूबर 2016
भारत के बैंक ग्राहकों में से करीब पौन करोड़ के एटीएम कार्ड में विदेशी हैकरों ने सेंध लगा दी है, ऐसी खबर सरकार की तरफ से आई है। और इसमें सारे नामी-गिरामी बड़े-बड़े बैंक हैं जिनके पास अपने कम्प्यूटरों की हिफाजत करने की ताकत होनी चाहिए थी। लेकिन यह दुनिया की एक नई हकीकत है कि कम्प्यूटरों में कुछ भी सुरक्षित नहीं रह सकता, और दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर-ताकत अमरीका सरकार के खुफिया कम्प्यूटरों में भी लगातार घुसपैठ चलती ही रहती है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम ऐसी एक नौबत को लेकर कई बार लिखते हैं कि दुनिया की आने वाली जंग जरूरी नहीं है कि फौजी हथियारों से ही लड़ी जाए, और भारत जैसे देश की सरहद पर फौजी हमले से जितना नुकसान हो सकता है, उससे कहीं अधिक नुकसान एक साइबर हमले से हो सकता है जिससे पल भर में रेल रिजर्वेशन खत्म हो जाए, बैंकों के रिकॉर्ड तहस-नहस हो जाएं, विमानों की सीट बुकिंग के रिकॉर्ड मिट जाएं, और लोगों के ई-मेल पर हमला हो जाए। इससे जो तबाही होगी, उसके जख्म आसानी से भरे भी नहीं जा सकेंगे।
कुछ महीने पहले की बात है कि बांग्लादेश के एक बड़े सरकारी बैंक में बड़ी साइबर डकैती हुई थी, और बैंक को शायद कंगाल बना दिया गया था। आज भारत में यहीं के घरेलू साइबर मुजरिम हर दिन हजारों लोगों के खातों से तरह-तरह की ठगी और जालसाजी करते हैं, और जनता के बीच अपने बैंक खातों के हिफाजत की समझ बड़ी कमजोर है। ऐसे में अगर पौन करोड़ लोगों के बैंक-कार्ड पर हमला हुआ है, तो इससे बैंकों पर लोगों का भरोसा भी उठेगा। और भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी जमीन, शेयर बाजार, या सोने के मुकाबले बैंक मेें जमा रकम को अधिक सुरक्षित माना जाता है और यह नौबत अगर बदलेगी तो बैंकों से हटाए गए पैसे कम सुरक्षित जगहों पर जाएंगे और देश की अर्थव्यवस्था एक अलग किस्म से तबाह होगी।
अभी यह ठीक से मालूम नहीं है कि भारत ऐसे साइबर-हमलों के लिए किस हद तक तैयार है, लेकिन अमरीका की बनी हुई कई रोमांचक अपराध फिल्मों में यह देखने मिलता है कि सरकार और पुलिस के कम्प्यूटरों पर कब्जा करके अपराधियों का एक छोटा सा गिरोह भी एक कमरे में बैठकर पूरे देश के बिजलीघरों को ठप्प कर सकता है, उपग्रह संचार प्रणाली को बैठा सकता है, और सड़कों पर सारे के सारे ट्रैफिक लाईट अपने काबू में ले सकता है। अब ऐसा साइबर खतरा अकेले भारत पर है, ऐसा हम नहीं कहते, लेकिन भारत ऐसे किसी खतरे से निपटने की तैयारी में बड़ा दमखम रखता हो, ऐसा भी नहीं लगता है। एक बात यह भी याद रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था में भारत के कॉल सेंटर दसियों लाख लोगों को रोजगार देते हैं, और ये महंगी कमाई वाले काम है। लेकिन अगर इनकी साइबर सुरक्षा खतरे में रहेगी, तो ये रोजगार भारत से छिन भी सकते हैं।
इन तमाम बातों को देखते हुए भारत को अपने कम्प्यूटरों और इंटरनेट की हिफाजत बड़ी तेजी से बढ़ानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो दिन पहले सर्जिकल स्ट्राइक के लिए इजराइल का जिक्र तारीफ के साथ किया है। इजराइल के तमाम हमले बेकसूर और निहत्थे फिलीस्तीनियों पर रहते हैं। अगर इजराइल से कुछ सीखना है तो वह साइबर-सुरक्षा है जिसमें कि इजराइल दुनिया में नंबर वन का देश है।

घूरों-नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए

संपादकीय
21 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर से लगे हुए ओडिशा के इलाकों में जापानी बुखार फैला हुआ है, और वहां मौतें सौ के करीब पहुंचने को हैं और जिस तरह छत्तीसगढ़ की सरहद से लगे हुए ओडिशा, आन्ध्र, तेलंगाना, और महाराष्ट्र से यहां पर नक्सली आते हैं, उसी तरह बीमारियां भी यहां आ सकती हैं। आज बस्तर के सुकमा में एक बच्ची की जापानी बुखार से मौत के साथ ही इस राज्य में भी इस बीमारी का खतरा पहुंच गया है। यह बीमारी पालतू सुअरों से फैलने की जानकारी है, और जब ओडिशा में बड़ी संख्या में सुअर मारे जाने लगे, तो उन्हें औने-पौने दाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर में लाकर भी बेचना शुरू किया गया। यह खतरा भारत और पाकिस्तान या भारत और बांग्लादेश जैसे दो देशों के बीच भी रहता है जहां सरहद को पार करना आसान रहता है। और छत्तीसगढ़ और ओडिशा तो एक ही देश के दो ऐसे राज्य हैं जहां खरीद-बिक्री पर भी कोई रोक नहीं है, और न ही लोगों के आने-जाने पर। इसलिए यह खतरा और अधिक है कि एक प्रदेश की बीमारी दूसरे प्रदेश तक पहुंच जाए।
लोगों को याद होगा कि एक समय जब गुजरात के सूरत में गंदगी की वजह से प्लेग फैला था, और वहां से रेलगाडिय़ों में भरकर लोग पूरे देश में जा रहे थे, तब सूरत से आने वाली रेलगाड़ी को देखकर दहशत फैलती थी। लेकिन आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का मकसद ओडिशा के इंसानों या वहां के सुअर को लेकर छत्तीसगढ़ में दहशत फैलाना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि ऐसी कोई महामारी यहां के जानवरों से भी यहां फैल सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गंदगी आसमान को छू रही है, शहर के बहुत से हिस्से ऐसे हैं जहां गंदगी का अम्बार है, और उस पर सुअरों के झुंड पूरे समय दिखते रहते हैं। इस शहर में चौथाई सदी तो इस बात को सुनते हो गई है कि डेयरियों को बाहर ले जाना है। जब यहां शहर के बाहर गोकुल नगर बनाया गया, उस बरस जिस बच्चे का नाम गोकुल रखा गया होगा, वह बच्चा भी अब 25 बरस का हो चुका होगा। लेकिन स्थानीय संस्थाएं अब निजी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की तरह कांक्रीट के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में उलझकर रह गई हैं, और सफाई की अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी को भूल चुकी हैं। जब तक शहर साफ नहीं रहता, तब तक आसपास के गांव और कस्बों को भी साफ रहने के लिए नसीहत नहीं दी जा सकती। हालत यह है कि पूरा का पूरा छत्तीसगढ़ गंदगी के प्रति संवेदना खो चुका है, और अब वह गंदगी को अपनी नियती मान बैठा है। ऐसे में किसी भी दिन कोई बड़ी महामारी न सिर्फ ओडिशा से यहां आ सकती है, बल्कि वह यहां से उपज भी सकती है, और पड़ोसी राज्यों के लिए भी खतरा बन सकती है।
गुजरात का सूरत इस बात की मिसाल है कि गंदगी की मिसाल बनने के बाद और महामारी का शिकार होने के बाद हक्का-बक्का नागरिकों के साथ मिलकर एक जिम्मेदार स्थानीय म्युनिसिपल किस तरह शहर को देश के  सबसे साफ शहरों में से एक बना सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित यहां के कई और शहरों को, बहुत से कस्बों को एक ऐसी सफाई की जरूरत है जो कि किसी महामारी की नौबत न आने दे। सरकार को भी यह चाहिए कि स्थानीय संस्थाओं को कमाऊ प्रोजेक्ट में जोत देने के बजाय उनको सफाई का उनका जिम्मा याद दिलाना चाहिए। आज हजारों करोड़ की लागत से एक-दो शहरों को स्मार्ट बनाने का नारा हवा में तैर रहा है, हम चाहते हैं कि कम से कम घूरों और नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए, और वहां से शुरुआत करना जरूरी है।

नई दीवाली के बहाने, पुरानी सलाह फिर से

संपादकीय
20 अक्टूबर 2016
आज हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा ही हिस्सा एक बड़े त्योहार दीवाली की तैयारियों में लगा है, घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन किए जा रहे हैं। इसके कुछ दिन पहले ही गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को देश भर में स्वच्छता अभियान एक बार फिर शुरू हुआ। सड़कों के किनारे झाड़ू लिए हुए नेता और अफसर तस्वीरें खिंचवाकर छपवा भी चुके हैं, और उसके बाद अब शहरी इलाके फिर से घूरे जैसे दिखने लगे हैं। ऐसे में सार्वजनिक जगहों से परे, निजी जिंदगी में भी एक सफाई की गुंजाइश बनती है और इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। हम हर बरस इन्हीं दिनों इस मुद्दे पर लिखते हैं, और हो सकता है कि कुछ लोगों पर उसका असर भी होता है।
मध्यम वर्ग और उससे ऊपर के तबकों में, घरों में बहुत से सामान ऐसे रहते हैं जो कि कचरा नहीं रहते, खराब नहीं रहते, लेकिन वे बेकार पड़े रहते हैं, या बेकाम रहते हैं। चीजों का मोह ऐसा रहता है कि लोग कई बार बच्चों के झूले, उनको घुमाने की गाडिय़ां, अगली पीढ़ी तक सम्हालकर रख लेते हैं। यही हाल कपड़ों और जूतों का रहता है, नए सामान आते जाते हैं, और पुरानों की बिदाई कभी नहीं हो पाती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, घरों में कबाड़ उसी अनुपात में बढ़ते चलता है। घर पर कोई साइकिल चलाने वाले नहीं रह जाते, लेकिन जंग खाती साइकिल रह जाती है। लेकिन बड़े सामानों से परे, बहुत से छोटे सामान भी रहते हैं। दवाइयां बची रह जाती हैं, बदले हुए नंबरों के नए चश्मे आ जाते हैं, और पुराने चश्मे पड़े रहते हैं। ऐसे अनगिनत सामान रहते हैं जिनको कि दूसरे जरूरतमंद लोग इस्तेमाल कर सकते हैं।
कई बरस पहले हमने इसी जगह पर 'दस का दम' नाम का एक ऐसा अभियान सुझाया था कि जिसके तहत उत्साही लोग दस-दस के समूह बनाएं, और अपने आसपास के लोगों के घरों से फालतू सामान इकट्ठा करके उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम करें। हमने यह भी सुझाया था कि जिस तरह नेटवर्क मार्केटिंग के नाम पर झांसा देने वाली कंपनियां अपनी चेन बढ़ाती चलती हैं, उसी तरह नेक काम का सिलसिला भी फैलते चल सकता है, और उत्साही लोगों में से हर कोई अपने साथ ऐसे दस लोगों को जोड़ सकते हैं, जो कि आगे वैसे ही दस-दस उत्साही लोगों को जोडऩे के लिए तैयार हों। हमने यह बात कई बरस पहले लिखी थी, और अभी सफाई अभियान के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक इसी तरह का काम किया, और उन्होंने देश के नौ प्रमुख लोगों के नाम लिए, और उन्हें सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मा दिया। इसके बाद ये प्रमुख लोग अपने आसपास के और लोगों के नाम ले रहे हैं, और यह सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ रहा है।
सालाना सफाई के त्यौहार दीवाली के मौके पर हम इस सोच को फिर याद दिला रहे हैं कि धरती पर नए सामानों का बोझ घटाने के लिए, घरों से कबाड़ का बोझ कम करने के लिए, और जरूरतमंद तबके की मदद करने के लिए इस तरह का 'दस का दम' अभियान लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी में जब हम अच्छे काम करते हैं, तो उससे एक ऐसी ताकत भी मिलती है कि तन और मन बाकी कामों को भी बेहतर कर सकते हैं। अमरीका जैसे पूंजीवादी देश में भी किसी कंपनी का मुखिया बनाने के पहले इस बात को देखा जाता है कि ऐसे लोग सामाजिक सरोकारों के काम कर चुके हैं या नहीं। वहां के सबसे कामयाब लोगों में से एक, बिल गेट्स अभी पूरी दुनिया में घूम-घूमकर खरबपतियों का हौसला बढ़ा रहे हैं कि वे अपनी पूंजी का कम से कम आधा हिस्सा समाज सेवा के लिए दें।
हम अपने आसपास ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो कि बिना किसी मतलबपरस्ती के, दूसरों के भले के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भले लोग खबरों में कम आते हैं, और मीडिया जुर्म की खबरों से भरे रहता है। लेकिन अच्छा काम करने के लिए खबरों में जगह पाने की कोई जरूरत नहीं रहती। लोग घरों से कबाड़ निकालकर समाज के कमजोर तबके तक बांटने का सिलसिला शुरू करें, तो उन्हें देखकर हर किसी को यह याद पडऩे लगेगा कि वे अपने घर से कौन सा कबाड़ कम कर सकते हैं। और सामानों के इस तरह दो-चार बार इस्तेमाल से ही धरती के साधनों का बचाव होगा, और धरती बच सकेगी।

समाज में सेक्स-खतरों पर खुली बातचीत की जरूरत

संपादकीय
19 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के भिलाई में एक महंगे निजी स्कूल में चार बरस की छोटी सी बच्ची के साथ स्कूल के ही एक कर्मचारी द्वारा बलात्कार करने की खबर आ रही है। अभी वहां भीड़ लगी हुई है और तनाव जारी है, बच्ची के घरवालों की शिकायत के बाद आरोपी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके पहले भी न सिर्फ इस शहर में, बल्कि छत्तीसगढ़ के बहुत से शहर-कस्बों में, गांव-गांव के आदिवासी आश्रम-छात्रावासों में, मदरसों में और दूसरे धर्मों से जुड़ी हुई स्कूलों में ऐसे मामले हुए हैं, और एक भी मामला ऐसा नहीं रहा जिसमें कोई पकड़ाया न गया हो। लेकिन मुजरिम के पकड़े जाने और सजा पाने से बच्चों की बाकी पूरी जिंदगी पर लगने वाले जख्म की कोई भरपाई नहीं हो सकती। और छत्तीसगढ़ के जिस भिलाई में यह घटना हुई है, वह दुर्ग-भिलाई शहर बलात्कार के मामले में कई बार देश में सबसे अधिक बलात्कार वाले दस लाख आबादी के शहरों में सबसे ऊपर गिनाता है।
ऐसे हादसों की जानकारी पर हमारा एक बिना किसी आधार का अंदाज यह है कि दस-बीस में से कोई एक मामला ही बच्चे अपने मां-बाप या स्कूल-टीचर को बता पाते हैं, और उनमें से अधिकतर मामलों में पुलिस में शिकायत नहीं होती है कि कौन बदनामी झेले, कौन अस्पताल और कोर्ट-कचहरी में आते-जाते कैमरों का सामना करे। समाज में जब सेक्स-अपराधों के खिलाफ शिकायत के मामले में लोगों में हौसला कम है, और शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होने पर छत्तीसगढ़ में ही लड़कियों और महिलाओं की आत्महत्या के मामले बहुत अधिक हैं, तो ऐसे में सरकार और समाज दोनों को मिलकर जागरूकता का एक अभियान चलाना चाहिए। हमारा ऐसा खयाल है कि बलात्कारी की नीयत चाहे जो भी हो, अपराध करने के ऐसे दौर के दौरान उसके दिमाग से यह डर निकल जाता है कि उसे किस तरह की जेल हो सकती है, और उतनी लंबी कैद के दौरान उसका परिवार किस तरह और किस हद तक तबाह हो सकता है। अगर समाज के लोगों को ऐसी नौबत का एहसास कराया जाए, तो हो सकता है कि कई मुजरिमों का ऐसे जुर्म का हौसला जवाब दे जाए। दूसरी तरफ परिवार और समाज को सरकार के साथ मिलकर खतरों की ऐसी नौबत को घटाना होगा जिनमें बच्चे या लड़कियां-महिलाएं अकेले रह जाते हैं, और किसी सेक्स-अपराधी के शिकार हो जाते हैं। स्कूलें, खेल के मैदान, काम की जगह, अस्पताल, या सूना घर, इन जगहों को किस तरह की सामाजिक या सरकारी निगरानी या सावधानी में रखा जा सकता है, इसके बारे में अपने मोहल्ले या कॉलोनी में लोगों को बैठकर सोचना चाहिए, और उसके रास्ते निकालने चाहिए। हमारा यह पक्का मानना है कि पुलिस की वर्दी और लाठी, बंदूक या निगरानी मिलकर भी न तो किसी बलात्कारी के दिल-दिमाग को पढ़ सकते, और न ही इस जुर्म को रोक सकते। इसलिए लोगों को ही सावधानी से ऐसे जुर्म के खतरे को घटाना होगा।
दूसरी बात यह कि बलात्कार से कम गंभीर सेक्स-अपराध ऐसे होते हैं जिनमें छोटे बच्चों के देह शोषण के मामले गिनती में बहुत अधिक होते हैं। यह बात अधिकतर हर परिवार के लोग, दोस्त और पड़ोसी, और परिचित लोग ही अधिक करते हैं। इसके बारे में भी स्कूलों को बच्चों को जागरूक करने का अभियान छेडऩा चाहिए, दिक्कत यह है कि इसे तुरंत यौन शिक्षा का लेबल लगाकर दकियानूसी लोग इसके खिलाफ अभियान छेड़ देते हैं। हम इन मुद्दों पर और अधिक लिखने के बजाय केवल यही चाहते हैं कि सरकार और समाज मिलकर इस तरह के सेक्स-खतरों पर खुलकर चर्चा करे, क्योंकि खुली बातचीत के बिना किसी तरह के बचाव की कोई गुंजाइश नहीं बन सकेगी।

मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2016
बिना जरूरत और बिना मतलब कहना सार्वजनिक जीवन में खासी दिक्कत खड़ी कर सकता है। आमतौर पर खबरों में एक अच्छे इंसान की तरह दिखाए जाने वाले भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर अपने एक बयान से एक निहायत ही गैर जरूरी विवाद में फंसे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय फौज ने पाकिस्तान पर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया, उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच का फायदा मिला था। अब इस बात का कोई तुक नहीं बनता कि एक ऐसी फौजी कार्रवाई को संघ से जोड़कर रक्षामंत्री लोगों को इस हमले और संघ पर चौतरफा टिप्पणी करने का मौका दिया। अच्छे भले समझदार लोग भी माइक सामने आते ही बेमतलब बातें करने लगते हैं, और पिछले दो बरस में कम से कम आधा दर्जन बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उनकी पार्टी की तरफ से अनौपचारिक सार्वजनिक बयानों में पार्टी के नेताओं को चुप रहने की नसीहत दी गई है। किसी भी मुद्दे को तबाह करना हो, तो उसकी गंभीरता से परे कोई ओछी या बेतुकी बात छेड़ दी जाए, तो मुद्दा धरे रह जाता है, और बेतुकी बातों पर लाठियां चलने लगती हैं।
यह पता नहीं सोची समझी बात रहती है, या कि महज संयोग है कि यूपीए के रक्षामंत्री एके एंटोनी और मनोहर पर्रिकर, दोनों ही अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। और राजनीति में इनको ईमानदार भी माना जाता है। चूंकि किसी भी देश में फौजी खरीदी में सैकड़ों करोड़ से लेकर हजारों करोड़ तक के भ्रष्टाचार की खबरें रहती हैं, और ऐसे में दिखावे के लिए एक ईमानदार मंत्री सरकारी की साख के लिए अच्छा साबित होता है। लेकिन ऐसे अच्छे मंत्री को सरकारी काम से परे सार्वजनिक बयानों में भी अच्छा बने रहना चाहिए, और मनोहर पर्रिकर ने हिंदुस्तानी फौज की एक कार्रवाई को लेकर यह निहायत गैरजरूरी बयान दिया है। भारत की फौज की तारीफ इसलिए नहीं हो सकता है कि वह किसी संगठन की सोच के मुताबिक फौजी कार्रवाई करे। उसकी तारीफ तभी हो सकती है, जब वह एक अच्छी फौज की तरह कार्रवाई करे।
सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर वैसे भी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में लगी भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उसे भाजपा की एक जीत साबित करने पर उतारू है, वह तरीका भी भारतीय फौज का सम्मान करने का नहीं है, और वह उसकी एक साधारण कार्रवाई को राजनीतिक रूप से दुहने का काम है, जो कि नहीं किया जाना चाहिए। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता। 

बीसीसीआई के मामले में काटजू का यह बयान ठीक लगता है कि कपड़े उतार कोड़े लगाएं...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2016
भारत में क्रिकेट को नियंत्रित करने वाला संगठन बीसीसीआई कम से कम तीन बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों की काबू वाली संस्था है, और इसका सैकड़ों करोड़ का बजट है, यह हजारों करोड़ तक शायद कारोबार करता है, और इसी के दम पर यह संगठन लगातार सुप्रीम कोर्ट से ऐसा टकराव ले रहा है जिसे देखकर देश की गरीब और बेबस जनता हक्का-बक्का है। लगातार यह सुप्रीम कोर्ट को उसकी औकात दिखा रहा है, और अपने आपको सूचना के अधिकार से परे मानता है, पांच सितारा होटलों से यह संस्था चलाता है, और देश के क्रिकेट खिलाड़ी इसके बंधुआ मजदूर बनकर खेलते हैं, या फिर उनके पास क्रिकेट से बाहर हो जाने की भी एक पसंद रहती है। लेकिन अकेले बीसीसीआई के मुद्दे पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, और इसके साथ-साथ एक दूसरा मुद्दा है जिसे जोड़कर ही हम यहां लिखना चाहते हैं।
सहारा नाम की एक कंपनी के रहस्यमय कारोबार के चलते उसके मुखिया महीनों से जेल में है, और सुब्रत राय सहारा की जमानत को लेकर, पैरोल को लेकर, जेल से उनके दफ्तर चलाने को लेकर जितनी छोटी-छोटी बातों पर सुप्रीम कोर्ट अपना वक्त दे रहा है, और अब तक शायद देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले की सुनवाई में सेंचुरी पूरी कर चुकी है, और ऐसी ही सेंचुरी बीसीसीआई की सुनवाई में भी जज लगा चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि देश की यह सबसे बड़ी अदालत जहां पर जनता के हित के मामले महीनों के इंतजार के बाद मिनटों का वक्त भी शायद ही पाते हों, वहां पर इन दो धनकुबेरों के लिए अदालत आखिर इतना वक्त कैसे निकालती है, क्यों निकालती है, और ऐसी अदालत देश के उन बाकी तमाम करोड़ों लोगों को चेहरा कैसे दिखाती है, जिनकी रोजी-रोटी, भूख-प्यास, और जिंदगी से जुड़े हुए बुनियादी मुद्दों के मामले इसी अदालत में कतार में खड़े-खड़े दम तोड़ते दिखते हैं।
करोड़ों की फीस लेने वाले अरबपति वकीलों को ऐसे मुवक्किलों के लिए सुप्रीम कोर्ट का इतना वक्त कैसे मिलता है, यह भी हैरान करने वाली बात है। ऐसे बददिमाग लेकिन ताकतवर लोगों को देश की सबसे बड़ी अदालत में बात-बात पर इतने मौके मिलना, इतने किस्म की रियायत मिलना, एक वकील पर अदालत के भड़कने के बाद घर से उठकर आए हुए दूसरे वकील को फिर अदालत से समय मिल जाना, यह सब देश के लोकतंत्र पर भरोसा घटाता है। हमारा यह मानना है कि ऐसे बददिमाग रईस लोगों को अदालतों में कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए, और भारत के कानून में यह फेरबदल भी करना चाहिए कि जब इतने पैसे वालों पर अदालत का वक्त लगता हो, तो ऐसे लोगों से उसकी भरपाई भी करवानी चाहिए, चाहे वे वादी हों, या प्रतिवादी हों। यह एक किस्म का अदालती टैक्स रहेगा, और उस पैसे का इस्तेमाल गरीबों को कानूनी राहत देने के लिए किया जा सकता है।
फिलहाल जिस मुद्दे से बात शुरू हुई थी, उस पर लौटें तो बीसीसीआई देश की सबसे बड़ी अदालत को जिस तरह की हेकड़ी दिखा रहा है, उस पर कुछ लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए। हमारा कोई भरोसा अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों पर नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ही एक रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू की यह बात ठीक लगती है कि बीसीसीआई के पदाधिकारियों के कपड़े उतारकर उन्हें कोड़े लगाने चाहिए।

तरह-तरह के सेक्स अपराधों से सत्ता का संबंध, कई राज्यों में

संपादकीय
16 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एक दलित शादीशुदा महिला का अपहरण करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की गई, और उसके बदन में ठीक उसी तरह लोहे की छड़ घुसा दी गई, जिस तरह दिल्ली में निर्भया के साथ किया गया था। शिकायत के बाद दो लोग गिरफ्तार हो गए हैं, और इन सबका बयान यह है कि भाजपा के एक नेता के बेटे ने यह सब योजना बनाकर किया, और अब वह कार लेकर फरार है। ऐसा नहीं कि ऐसा करने वाले लोग सिर्फ भाजपा के हैं, लेकिन कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में सेक्स रैकेट में भाजपा का एक नेता गिरफ्तार हुआ, जिसकी तस्वीरें प्रधानमंत्री से लेकर मध्यप्रदेश के बड़े-बड़े भाजपा नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर सजी हुई हैं, गुजरात में दो दिन पहले एक सेक्स रैकेट पकड़ाया जिसमें भाजपा का एक नेता भी पकड़ाया है।
इन बातों से एक नतीजा यह निकलता है कि इस तरह के धंधे और इस तरह की भयानक हरकतें करने का हौसला उन लोगों में अधिक होता है जो कि सत्ता के करीबी लोग हैं। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि ऐसे धंधों पर और ऐसे लोगों पर कार्रवाई जिस पुलिस को करनी चाहिए, उस पर सत्ता से जुड़े मुजरिमों को यह भरोसा रहता है कि उन पर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करेगी। हम छत्तीसगढ़ में भाजपा के लंबे शासनकाल के बाद अब जगह-जगह यह बात देखते हैं कि कई तरह के संगठित और नियमित अपराध भाजपा के स्थानीय नेताओं के साये तले चलते हैं। कुछ जगहों पर सत्तारूढ़ भाजपा नेता सट्टेबाजी से लेकर धान के घोटाले और सरकार को चूना लगाने तक के पीछे जाहिर तौर पर हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। सरगुजा में दो दिन पहले मंत्री के बेटे ने दुर्गोत्सव के समारोह में चल रहे अश्लील नाच के बीच अपने अंगरक्षक या दोस्त के साथ पहुंचकर वहां बंदूक से गोलियां चलवाईं, और उस पर न तो मंत्री का कोई जिम्मेदार बयान आया, और न ही पुलिस-प्रशासन का। नतीजा यह है कि पार्टी के छोटे लोग भी ऐसे रूख से यह मानकर चलते हैं कि वे भी मनमानी कर सकते हैं। और पूरे प्रदेश में सड़कों पर यह दिखता है कि नंबर प्लेट पर भाजपा के रंग की पट्टी लगवाकर हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता सायरन बजाते हुए चलते हैं, और अगर पुलिस रोकने की कोशिश करती है, तो कई जगह वह मार भी खा चुकी है।
यह पूरा सिलसिला मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निजी चाल-चलन और उनकी निजी सोच के ठीक खिलाफ है। छत्तीसगढ़ में ऐसा भी नहीं है कि भाजपा संगठन रमन सिंह की पहुंच से परे की कोई समानांतर सत्ता हो। उनको भाजपा के लोगों की मनमानी और अपराधों से उनके रिश्ते पर कड़ाई से रोक लगानी चाहिए, क्योंकि सरकारी अफसर तो कार्रवाई करने से कतरा सकते हैं लेकिन जब जनता का वोट देने का मौका आता है, तो वह चुप नहीं रहती है। और यह केवल छत्तीसगढ़ की बात नहीं है, बहुत से प्रदेशों में, सभी प्रदेशों में यह देखने में आता ही है कि जब किसी एक पार्टी की सरकार लंबे समय तक रहती है, तो वह सत्ता की ताकत से आने वाली बददिमागी का शिकार हो ही जाती है, और चुनाव में नुकसान झेलती है। छत्तीसगढ़ में पिछले कई चुनावों में ऐसा नुकसान भाजपा को नहीं झेलना पड़ा क्योंकि कांग्रेस की गुटबाजी ने भाजपा की मदद की। लेकिन डॉ. रमन सिंह को तरह-तरह के जुर्म और अराजकता से भाजपा के लोगों के रिश्ते को तोडऩा होगा, वरना ये तो पब्लिक है, यह सब जानती है।

लोकतंत्र में फौज को लेकर भावनात्मक उन्माद खतरनाक

संपादकीय
15 अक्टूबर 2016
पाकिस्तान पर भारतीय सेना के एक सर्जिकल स्ट्राईक के बाद से देश पर राज कर रहे गठबंधन की मुखिया भाजपा से लेकर विपक्षी कांग्रेस और बाकी राजनीतिक दलों, धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों, इन सबके बीच सेना को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। और सेना की कार्रवाई पर पाकिस्तान की तरफ से उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए भारत में जिन लोगों ने सरकार से मांग की, उन लोगों को बात की बात में देशद्रोही करार दे दिया गया। इसके बाद सेना को लेकर माहौल इतना संवेदनशील हो गया है कि सेना का लोग स्वागत किस तरह से करें, उनका सम्मान कैसे करें, इसके बारे में तरह-तरह के सुझाव हवा में तैरने लगे, और उन्हें राष्ट्रप्रेम के लिए एक अनिवार्य सुबूत की तरह मांगा जाने लगा है। फिर बात की बात में चीनी सामानों के बहिष्कार की बात होने लगी, पाकिस्तानी कलाकारों को वापिस भेज दिया गया, और इस हो-हल्ले में यह बात तो पूरी तरह अनदेखी कर दी गई कि भारत के कुछ सबसे बड़े उद्योगपति किस तरह पाकिस्तान के कुछ सबसे बड़े उद्योगपतियों के साथ मिलकर साझा कारोबार कर रहे हैं, और ये दोनों ही खेमे अपने-अपने देश के प्रधानमंत्रियों के कितने करीबी हैं, और किस तरह सजन जिंदल जैसे भारतीय उद्योगपति की पहल या दखल से मोदी और शरीफ की मुलाकातें हुईं। मतलब यह कि बड़े-बड़े कारोबारी और बड़े-बड़े काम तो जारी रहें, हजारों करोड़ का कारोबार चलता रहे, लेकिन किसी कलाकार या खिलाड़ी को लेकर देशनिकाला मांगा जाए और इसका विरोध करने वालों को गद्दार करार दिया जाए।
किसी भी लोकतंत्र में सभ्य समाज को यह बात याद रखना चाहिए कि ऐसा उग्र राष्ट्रवाद किसी दुश्मन का नुकसान तो सरहद पर जंग छिडऩे पर ही कर सकता है, लेकिन अपने खुद के लोगों की लोकतांत्रिक सोच, इंसानी सोच का नुकसान तो वह बिना जंग के भी, अमन के दौर में भी करते ही रहता है। आज भारत में जो लोग भी जंग के फतवे हवा में उछाल रहे हैं, वे लोग इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि सरहद पर गोला-बारूद और फौजी खर्च के बिना भी हिन्दुस्तान दुनिया के सबसे गरीब और भुखमरी वाले देशों में से एक है, और अभी इसी हफ्ते सामने आए आंकड़े बताते हैं कि किस तरह दुनिया की भूख की फेहरिस्त में भारत पड़ोस के गरीब देशों के मुकाबले भी बदहाल है। जो लोग जंग की बातें करते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसे बयान जारी करने वालों की खीर में से केसर भी कम नहीं होगी, लेकिन गरीबों के लिए अनाज, उनकी पढ़ाई, उनका इलाज, उनका पानी, यह सब कुछ एक जंग छीनकर ले जा सकती है। और जंग से पहले भी हवा में एक गैरजरूरी हिंसक सोच जिस तरह एक झंडे की शक्ल में फहरा रही है, वह भयानक है।
फौज को न सिर्फ एक राजनीतिक हथियार की तरह, चुनावी हथियार की तरह, राष्ट्रवाद के हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू हो गया है, और यह एक भयानक नौबत है। बिना सोचे-समझे यह बात भी हो रही है कि फौज को खुली छूट दी जाए, फौज ने सर्जिकल स्ट्राईक का फैसला लिया, या उसे ऐसा लेने का हक दिया जाए। ऐसा कहने वाले लोगों को बगल के पाकिस्तान को देख लेना चाहिए कि किस तरह वहां फौज को राजनीतिक या जंग के फैसले लेने की इजाजत दी जाती है तो उससे किस तरह फौजी तानाशाही का खतरा खड़ा होता है। दुनिया में पाकिस्तान ऐसे खतरे की सबसे बड़ी मिसाल है, और इस मिसाल को अनदेखा करके आज भारत के कुछ लोगों का धर्मोन्माद फौज को इस तरह से बढ़ावा दे रहा है कि वह देश की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार से परे या उससे ऊपर एक ताकत रहना चाहिए। भारत का संविधान इस तरह की व्यवस्था के लिए बना हुआ नहीं है। और इसके खतरे अनदेखा करके आज फौज को लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी ऊपर जिस तरह से बिठाया जा रहा है, वैसी अंधभक्ति खुद फौज के काम की नहीं है, उसके फायदे की नहीं है। अंधविश्वास का सबसे बड़ा नुकसान उसको होता है जिस पर अंधविश्वास होता है। भारत में ऐसे सैनिक-सपनों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए कि फौज जब बनाई गई है, तो सरहद के फैसले फौज को लेने देना चाहिए।

अमन के गीतकार को नोबल मिलना एक महत्वपूर्ण बात

संपादकीय
14 अक्टूबर 2016
अमरीका के एक गीतकार और गायक बॉब डिलन को नोबल साहित्य पुरस्कार कुछ लोगों को अटपटा लग रहा है क्योंकि उनकी पहचान गीतकार से अधिक गायक के रूप में है, और लोगों को लग रहा है कि साहित्य के लोगों का एक मौका इससे घट जा रहा है। लेकिन इस पुरस्कार को कई संदर्भों में देखने की जरूरत है। पिछली आधी सदी से बॉब डिलन अमरीका में युद्ध विरोधी गीतकार और गायक के रूप में जाने जाते हैं, और कई बार उनके नाम को लेकर यह चर्चा भी होती थी कि उन्हें साहित्य या शांति का नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए। उनके युद्ध विरोधी गीत दुनिया भर में फैले हुए थे, और उनसे राजनीतिक जनचेतना उठती थी।
अब अगर यह देखा जाए कि साहित्य के पैमाने पर उनके गीत अगर कमजोर बैठते हैं, और दुनिया के बाकी कुछ साहित्यकार इस पैमाने पर ऊपर जाते हैं, तो इसके साथ-साथ साहित्य के सामाजिक योगदान को भी देखना चाहिए। साहित्य सिर्फ भाषा नहीं रहता, साहित्य सिर्फ कोई विधा या शैली भी नहीं रहता, साहित्य तो समाज से जुड़े रहने वाली एक ऐसी रचनात्मकता है जिसके योगदान को अनदेखा करके उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। बहुत से साहित्यकार आलोचकों के बीच ऊंचे दर्जे के गिने और माने जाते हैं, लेकिन प्रकृति और प्रेम की उनकी अमूर्त बातों का सामाजिक योगदान उनकी रचनाओं जितना ही अमूर्त रहता है। दूसरी तरफ सामाजिक और राजनीतिक चेतना, संघर्ष और इंसाफ की लड़ाई की बात करने वाली साहित्यिक रचनाओं का योगदान बहुत बड़ा रहता है। हम साहित्य को महज आलोचकों के मूल्यांकन का सामान नहीं मानते, और हमारे हिसाब से इसके योगदान के बिना इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग क्रांति की बातें करते हैं, मजदूर संघर्ष की बात करते हैं, बराबरी के हक की बात करते हैं, उनके साहित्य का महत्व इतिहास में दर्ज होता है, और ऐसे तमाम लोग बाकी किस्म के साहित्यकारों के मुकाबले अधिक खतरे झेलते हुए, अधिक अभाव और नुकसान झेलते हुए काम करते हैं। जो लोग दूसरों के लिए लड़ते हैं, उनके भले के लिए अपना बुरा झेलने को तैयार रहते हैं, वैसे गीतकार मानवीय प्रेम या प्रकृति के गीतकारों के मुकाबले अधिक अहमियत वाले रहते हैं।
आज नोबल साहित्य पुरस्कार कमेटी ने जब इस नाम को चुना होगा, तो हमें भरोसा है कि आज दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे तरह-तरह के युद्ध और गृहयुद्ध पर उनकी नजर रही होगी। आज दुनिया में अमन-चैन की जरूरत पहले के मुकाबले कहीं अधिक है, और ऐसे में युद्ध विरोधी सोच को बढ़ावा देने वाले गीतकार का ऐसा सम्मान एक सामाजिक और राजनीतिक हकीकत का सम्मान भी है, और साहित्य को ऐसी हकीकत से अलग करके देखना कम से कम हमें जरा भी मंजूर नहीं है। साहित्य आलोचकों के लिए नहीं होता, वह महज साहित्यकारों के लिए भी नहीं होता, वह आम जनता के लिए होता है, और सीधी-सपाट बात से अमन के गीत गाने वाला सम्मान पाकर आज की जरूरत को भी सामने रख रहा है।

अब महज सावधान रहना काफी नहीं, साफ-सुथरा रहना जरूरी

संपादकीय
13 अक्टूबर 2016
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह पुराने टेप सामने आ रहे हैं, और एक उम्मीदवार के पति के पुराने मामले सामने आ रहे हैं, उससे न सिर्फ अमरीका में, न सिर्फ चुनाव में, बल्कि दुनिया में हर किसी को बहुत कुछ समझने और सीखने की जरूरत है। हिलेरी क्लिंटन के पति, बिल क्लिंटन के खिलाफ एक ऐसा नौजवान सामने आया है जो दावा कर रहा है कि वह क्लिंटन का अवैध बेटा है। क्लिंटन के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाने वाली चार महिलाओं को डोनाल्ड ट्रम्प ने हिलेरी के साथ बहस में सामने पेश कर ही दिया था, और अब डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ दो महिलाएं सामने आई हैं जिन्होंने दशकों पहले ट्रम्प के हाथों देह शोषण की शिकायतें मीडिया के सामने रखी हैं। लेकिन यह अमरीका की कोई खास बात नहीं है, और भारत में भी नारायण दत्त तिवारी से लेकर बहुत से दूसरे नेता ऐसे आरोप झेलते रहे हैं, डीएनए जांच से उनकी वैध-अवैध संतानें सामने आती रही हैं।
लेकिन आज इस घिसे-पिटे मुद्दे पर चर्चा की एक खास वजह है। अभी कोई 20-25 बरस पहले तक ऐसे स्टिंग ऑपरेशन नहीं होते थे, या टेलीफोन की रिकॉर्डिंग बहुत आम बात नहीं थी, या डीएनए जांच का उतना अधिक चलन नहीं था। आज तो छोटे-छोटे बच्चे भी हाथ में ऐसे मोबाइल लिए चलते हैं कि जिनसे कि तरह-तरह वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है, हर कॉल रिकॉर्ड हो सकती है, और हर संदेश हमेशा के लिए अपमान बनकर दर्ज हो सकता है। अब छोटे-छोटे पेन और की-रिंग में भी कैमरे आम बात हो चुके हैं, और हर किसी को न सिर्फ सावधान रहने की जरूरत है, बल्कि अपना चाल-चलन ही ठीक रखने की जरूरत है। गांधी के विरोधियों ने अभी कुछ दिन पहले ही एक लेख में यह सवाल उठाया कि क्या गांधी अपनी महानता के दर्जे का फायदा उठाकर कमउम्र लड़कियों के साथ अपने सेक्स प्रयोग नहीं करते थे? और क्या आज के कानून के मुताबिक वे प्रयोग उनको जेल में नहीं डाल देते?
वक्त के साथ-साथ तौर-तरीके बदल जाते हैं, आज कोई गांधी भी उस तरह के प्रयोग नहीं कर सकता, और कानून भी अब इतना कड़ा हो गया है कि एक नाबालिग बच्ची की शिकायत के बाद बरसों से आसाराम की जमानत नहीं हो रही है। अब वक्त इतना खतरनाक है कि महज सावधानी किसी को नहीं बचा सकती, अब पूरी तरह से साफ-सुथरे रहने वाले लोग ही सुरक्षित रह सकते हैं। आज का डिजिटल जमाना हर शब्द और हर पल को ऐसे रिकॉर्ड करता है कि उसे कोई मिटाना चाहे, तो भी वह मुमकिन नहीं है। लोगों को याद रखना चाहिए कि पुराने कुकर्म कब्र फाड़कर उठ खड़े होते हैं, और अच्छी भली जिंदगी को तबाह करने की ताकत रखते हैं। इसलिए आज टेक्नालॉजी ने कुछ कहना, कुछ लिखना, कुछ भेजना जितना आसान कर दिया है, उतना ही अधिक अपने आपको ठीक रखना भी जरूरी हो गया है। आज तो मन में अगर कोई गलत खयाल आया, तो मानो उसका पोस्टर ही छप गया।

सेक्स भुगतान का झगड़ा बलात्कार न मानना सही

संपादकीय
12 अक्टूबर 2016
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में बलात्कार के आरोप से तीन लोगों को बरी किया और कहा कि अगर कोई सेक्सकर्मी भुगतान के किसी झगड़े में ग्राहक के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराए तो वह बलात्कार नहीं कहा जा सकता। दो जजों की बेंच ने यह भी कहा कि महिला के दिए गए सुबूतों को महत्व दिया जाना चाहिए, लेकिन उसे परम सत्य की तरह नहीं मानना चाहिए। यह मामला बेंगलुरू का था जिसमें बीस साल से यह मुकदमा चल रहा था।
इस फैसले से कुछ और भी पहलू फिर बहस में आएंगे। किसी सेक्सकर्मी के भुगतान का मामला ग्राहक और कर्मी के बीच का भुगतान का लेन-देन का झगड़ा माना गया है, और यह सही भी है। लेकिन हमारा मानना है कि इसके अलावा एक और किस्म का मामला आए दिन सामने आता है जिस पर भी सुप्रीम कोर्ट को गौर करना चाहिए, और एक ज्यादती खत्म करनी चाहिए। हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं बलात्कार की एक ऐसी रिपोर्ट दर्ज होती है जिसमें शादी का वायदा करके बनाए गए शारीरिक संबंधों के बारे में लड़की या महिला की तरफ से कहा जाता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। हम शादी का वायदा करके बनाए गए संबंधों को बलात्कार नहीं मानते। इसे भी अगर बलात्कार मान लिया गया तो फिर वायदाखिलाफी शब्द का कहां इस्तेमाल होगा? और वायदे से परे भी यह तो मानकर चलना चाहिए कि जो लोग आज किसी के साथ शादी का इरादा रखते हैं, जरूरी नहीं है कि कुछ समय बाद भी उन्हें उनसे शादी करना ठीक लगे। लोगों के खयालात समय और हालात के मुताबिक बदलते हैं, और यही वजह है कि सगाई होने के बाद भी टूट जाती हैं, शादी हो जाने के बाद भी तलाक हो जाते हैं। तो जिस तरह शादी के बाद तलाक होता है, उसी तरह शादी के पहले के प्रेम संबंध भी टूट सकते हैं, और उसे बलात्कार से जोडऩा पूरी तरह नाजायज है।
आज दहेज का कानून, बलात्कार का कानून, कामकाज की जगह पर शोषण का कानून महिलाओं के पक्ष में बहुत हद तक झुका हुआ है, और यह बात जायज भी है। लेकिन यह बात नाजायज है कि प्रेम संबंध टूट जाने पर या शादी न करने पर पहले के देह संबंधों को बलात्कार करार दिया जाए। आज का कानून ऐसे बहुत से लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देता है, और बरसों तक वे लोग मुकदमा झेलते रहते हैं। किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला दिया हो, तो वह अभी हमें नहीं मालूम है, लेकिन किसी वजह से अगर शादी का वायदा पूरा नहीं किया जाता है, तो उसे किसी भी तरह का अपराध मानना गलत होगा। अभी सेक्सकर्मी के भुगतान के विवाद को लेकर जो फैसला आया है, उसकी भावना भी कुछ इसी किस्म की है। वह मिसाल तो अलग है लेकिन उस आधार पर वायदाखिलाफी जैसे मामलों पर भी गौर किया जाना चाहिए।

बुराई के प्रतीक को मारना आज की सहूलियत का...

संपादकीय
10 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान के कई प्रदेशों में कल दशहरे पर रावण को जलाने की तैयारी चल रही है, और कई इलाके ऐसे भी रहेंगे जहां रावण नहीं जलाया जाता। दक्षिण भारत के बहुत से लोग और छत्तीसगढ़ में भी बस्तर के आदिवासी रावण नहीं जलाते। इनके अपने अलग-अलग सांस्कृतिक कारण हो सकते हैं, और दक्षिण के कई लोगों का यह मानना है कि रावण एक बड़ा विद्वान ब्राम्हण था, और उसे मारना गलत था। बाकी जगहों पर इसकी अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, लेकिन हम उसकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते। अभी हमारे ही अखबार के पन्नों पर लगातार यह बहस चल रही है कि दुर्गा के हाथों महिषासुर के मारे जाने की कहानी क्या आदिवासी विरोधी है? क्या महिषासुर आदिवासियों का देवता है और उसकी पूजा के साथ दुर्गा की पूजा का एक सांस्कृतिक टकराव है? हमने इस बहस के सभी पहलुओं के लिए बहुत सी जगह पन्नों पर निकाली, और इस कॉलम में भी इस बारे में लिखा। लेकिन आज मौका रावण के बारे में कुछ बातें करने का है।
रावण के दस सिरों को दस बुराइयों के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है, और राम के हाथों उसके मारे जाने की कहानी में यह दिन रावण के वध का रहता है। रावण अगर कहीं पर कोई रहा होगा, तो वह तो मर गया, लेकिन बुराई के प्रतीक को हर बरस सजाकर, खड़ा करके, उसे जलाकर मारने के बाद लोग तसल्ली से घर लौटते हैं, और एक-दूसरे को सोने की पत्ती देकर मुबारकबाद देते हैं। नतीजा यह होता है कि बुराई को मारने के लिए साल का एक दिन तय हो गया है। और इस दिन भी अपने भीतर के किसी रावण को मारने की कोई बात नहीं होती, क्योकि बांस और रंगीन कागज से बनाए गए रावण को आग लगाकर खत्म करना अधिक सुहाना लगता है, और उससे अपनी आत्मा को कोई कष्ट भी नहीं होता। अपने भीतर की दस बुराइयों को खत्म करने की कोई सोचे, तो उससे बहुत तकलीफ होगी, और सुख-सुविधा, सहूलियतें छिन जाएंगी। किसी की दो नंबर की कमाई कम हो जाएगी, किसी को पड़ोसन को बुरी नजर से देखना बंद करना पड़ेगा, और किसी को दारू या सिगरेट छोडऩा पड़ेगा। ऐसी दस भीतरी बुराइयों को छोडऩे का मतलब तो जिंदगी का पूरा रूख ही बदल देना हो जाएगा, और ऐसा करना इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है। नतीजा यह है कि इस असुविधा से बचने के लिए एक ऐसे प्रतीक को गढ़ लिया गया है जो कि विरोध नहीं कर सकता, वकील नहीं कर सकता कि उसके साथ हर बरस यह ज्यादती होती है।
और मजे की बात यह भी है कि यह प्रतीक कुछ कमजोर न दिखे, इसलिए इसे खूब सुहावना बनाया जाता है, सजाया जाता है, और आतिशबाजी के साथ उसे निपटाया जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकार के इंतजाम में रावण दहन का जो सबसे बड़ा कार्यक्रम होता है, उस कार्यक्रम में तो इस बरस एक बड़ी भारी चूक होते-होते रह गई। अखबारों में यह खबर छपी कि इस बार रावण को गुजरात के राजा की तरह सजाकर जलाया जाएगा। अब इसका गुजराती समाज ने विरोध किया कि रावण न तो गुजरात का था, और न ही गुजराती था, फिर उसे गुजरात के डेढ़ हजार मीटर कपड़े से सजाकर क्यों जलाया जा रहा है। इस विरोध के बाद प्रशासन ने भी दखल दी, और रावण को उसके मूल स्थान लंका या श्रीलंका के हिसाब से ही माना गया, और गुजरात के राजा के नाम पर होने जा रही एक बड़ी राजनीतिक चूक टल गई।
फिलहाल इस देश में ऐसे प्रतीकों से आजादी पाने की जरूरत है जिन्हें मारकर आम लोग राहत की सांस लेते हैं कि उन्होंने बुराई को मार डाला है। ऐसे प्रतीक सामाजिक परंपराओं से हटाने चाहिए क्योंकि इनके चलते हुए लोगों को अपने भीतर की बुराइयां दिखती भी नहीं हैं। जिस तरह स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर लोग देशभक्ति के गाने बजाकर, कारों पर छोटे से झंडे लगाकर, या कि सरहद पर पड़ोसी देश से टकराव के दिनों में देशभक्ति के संदेश फैलाकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं, उसी तरह दशहरे पर रावण को मारा जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और बुराई के नाम पर इतिहास के प्रतीक को मारना काफी नहीं रहना चाहिए, आज की मौजूदा हकीकत की भी बात होनी चाहिए। 

सरकारी नौकरी और विचारों की आजादी के दायरे...

संपादकीय
9 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ में एक और आईएएस अधिकारी की फेसबुक पोस्ट को लेकर सरकार परेशानी में घिरी है, और इस नौजवान अफसर को जिले की तैनाती से हटाकर मंत्रालय लाकर बिठा दिया गया है। ऐसे मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन बीच-बीच में आते रहते हैं। खासकर बस्तर के पानी में ऐसा कुछ दिखता है कि वहां तैनात अफसर अधिक बेकाबू हो जाते हैं। कभी कोई कलेक्टर, तो कभी कोई दूसरा अफसर। और फिर पुलिस के वहां के आला अफसर तो सोशल मीडिया सहित बाकी मीडिया के कैमरों के सामने भी एक अलग स्वायत्तशासी बस्तर साबित करते दिखते हैं। ऐसे में राज्य सरकार बार-बार परेशानी में घिरती है, और अब आज राज्य के आईएएस अफसरों के संगठन ने अपने सदस्यों को गलतियों और गलत कामों से रोकने के लिए एक मार्गदर्शक मंडल बनाया है।
भारत में शासकीय अधिकारियों के जो सेवा नियम हैं, वे उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने से रोकते हैं, और सरकार की छवि को खराब करने वाली किसी भी बात से रोकते हैं। इसके लिए बहुत विस्तार से किसी नियम का इंतजाम नहीं किया गया है, और सेवा शर्तों में लिखी गई एक लाईन ही बहुत से मामलों को रोकने के लिए काफी है, और सरकार उसके आधार पर किसी बेकसूर के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती है। सेवा शर्तों में लिखा गया है कि ऐसा आचरण जो कि शासकीय सेवक को शोभा न देता हो, अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर। अब यह बात इस पर भी लागू हो सकती है कि सार्वजनिक जगह पर कोई अफसर शराब पी ले, या कि किसी को गाली दे दे। सरकार चाहे तो इसे भी शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ मान सकती है, और कार्रवाई कर सकती है। लेकिन दूसरी तरफ बहुत से ऐसे मामले हैं जो कि सरकार की आलोचना के दायरे में नहीं आते, लेकिन सरकार के लिए असुविधा के होते हैं।
ताजा मामला बस्तर के एक नौजवान एक आईएएस अफसर का है जिसने फेसबुक पर दो दिन पहले भाजपा के प्रेरणास्रोत दीनदयाल उपाध्याय की उपलब्धियों और उनके योगदान पर गंभीर सवाल उठाए, और सवाल पूछने की तर्ज पर लिखा कि अगर किसी की जानकारी में उनका कोई योगदान हो तो बताए। अब यह बात रायपुर से लेकर दिल्ली तक की सरकारों को नागवार गुजरना तय है क्योंकि भाजपा की सारी सरकारें दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा पर काम कर रही हैं, और घोषित रूप से उन्हें मार्गदर्शक मानकर चल रही हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतकर आने वाली हर सरकार को यह हक रहता है कि वह अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय करे, और अपने आदरणीय लोगों की विचारधारा पर अमल करे। भाजपा ऐसा करके कोई अनोखा काम नहीं कर रही है। कोई पार्टी नेहरू-गांधी को मानती है, कोई लोहिया को, और कोई पार्टी देश के बाहर के माक्र्स को भी मानती है।
ऐसे में भाजपा शासन के लिए काम करने वाले एक अफसर ने दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल खड़े करके हो सकता है कि अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में ही काम किया हो, लेकिन यह काम जाहिर तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ था, सरकार की आलोचना के बराबर था, और इस नाते वह उम्मीद एक शासकीय सेवक से नहीं की जा सकती। हो सकता है कि इस पोस्ट के बाद जताए गए खेद के बाद भी सरकार को आगे कोई कार्रवाई जरूरी लगे, और यह कार्रवाई कानूनी न होकर महज प्रशासनिक हो सकती है। हो सकता है कि अदालत में जाकर यह अफसर अपने लिखे को अपना कानूनी अधिकार साबित भी कर दे, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठेगा कि शासकीय अधिकारियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का किस हद तक और कैसा इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि ऐसे सवाल उठाकर इस अधिकारी ने जो सार्वजनिक असुविधा अपनी सरकार के लिए खड़ी की है, उससे बचा जाना चाहिए था।

सोशल मीडिया से छाती पर से हट जाने वाला वजन...

संपादकीय
8 अक्टूबर 2016
इंसानों और जानवरों, सभी को कुछ तरह की गलतफहमी होती है। कुछ लोगों को जब यह शक रहता है कि उनकी तबियत ठीक नहीं हो रही है, तो उन्हें काम की दवाईयों के साथ-साथ बिना दवाई वाले ऐसे कैप्सूल भी दिए जाते हैं कि उनके दिल-दिमाग को यह तसल्ली मिले कि उनका इलाज हो रहा है। इसे प्लेसिबो असर कहते हैं जो कि बिना दवाई के भी असर करता है। जानवरों के साथ भी ऐसा होता है और विकसित देशों में उनकी भी मनोचिकित्सा होती है, हिन्दुस्तान में तो खैर इंसानों को भी मनोचिकित्सा नसीब नहीं है। लेकिन ऐसी झूठी तसल्ली बहुत से लोगों को इलाज से परे की बातों में भी मिलती है।
कई लोगों को कसरत के वीडियो देखने, और फिटनेस के बारे में पढऩे से यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपनी सेहत के प्रति जागरूक हैं। बहुत से लोगों को क्रिकेट या किसी और खेल का प्रसारण देखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे खेलों में हिस्सा ले रहे हैं। और इन दिनों भारत में बहुत से लोगों को सोशल मीडिया पर देशभक्ति के बारे में लिखते हुए या पड़ोस के दुश्मन माने जा रहे देश के खिलाफ लिखते हुए यह तसल्ली होने लगती है कि वे अपने देश का भला कर रहे हैं। हालांकि यह अपने आपको धोखा देकर एक खुशफहमी में रहने की बात है कि वे सचमुच कुछ कर रहे हैं। बहुत से लोग गरीब और गरीबी के बारे में सोशल मीडिया में लिखकर अपनी यह सामाजिक जवाबदेही पूरी कर लेते हैं कि वे गरीबों की फिक्र करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही वे लोग भी करते हैं जो रात-रात भर जागकर किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं, और जिन्हें लगता है कि वे धर्मालु हैं। ऐसे भी लोग रहते हैं जो करोड़ों रूपए की काली कमाई करके कुछ लाख का दान किसी धर्म स्थान को दे देते हैं, और वे परोपकारी कहलाने लगते हैं।
कुछ तो धर्म जैसी बातें लोगों को ऐसी सहूलियत दिला देती हैं, और कुछ अब सोशल मीडिया लोगों को ऐसा मौका दे देता है। एक तरफ तो जिस तरह चर्च में कन्फेशन चेंबर में जाकर लोग अपने पाप मान लेते थे, और माफी पा लेते थे, कुछ उसी तरह अपनी गलतियों को लोग सोशल मीडिया पर मान लेते हैं, और फिर यह मान लेते हैं कि वे उन गलतियों के जुर्म से उबर गए हैं। यह सिलसिला ऐसी सहूलियत न रहने के मुकाबले अधिक खतरनाक है। जब लोगों को इस तरह लिखने और पोस्ट करने की सुविधा नहीं थी, तो उनके गलत काम कम से कम कुछ वक्त तक तो उनकी छाती पर वजन की तरह सवार रहते थे। लेकिन अब तो पल भर में आत्मा ड्राईक्लीन होकर निकल आती है, अगले दाग-धब्बों के लिए एकदम तैयार होकर।
पिछले कुछ बरसों में ही ऐसी सामाजिक प्रतिक्रियाओं के सोशल मीडिया का विस्तार एक धमाके की तरह हुआ है, और इससे इंसानों की मानसिकता पर क्या असर पड़ा है, लोगों के दिल-दिमाग पर क्या फर्क पड़ा है, इसका ठीक-ठीक अंदाज भी अभी समाजशास्त्री नहीं लगा पाए हैं। आने वाले बरसों में हो सकता है कि इसका अंदाज लग सके।

शहादत के मौके पर राहुल की बेमौके की बेतुकी बात

संपादकीय
7 अक्टूबर 2016
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 26 दिन की किसान यात्रा खत्म होने के बाद जंतर-मंतर पर अपने भाषण में कहा कि पीएम मोदी जवानों की दलाली कर रहे हैं। जो हमारे जवान है, जिन्होंने अपना खून दिया है, जम्मू कश्मीर में जिन्होंने अपना खून दिया है, जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए सर्जिकल स्ट्राइक किया है, उनके खून के पीछे आप छुपे हुए हो, उनकी आप दलाली कर रहे हो, ये बिल्कुल गलत है। हिंदुस्तान की सेना ने हिंदुस्तान का काम किया है, आप अपना काम कीजिए, आप हिंदुस्तान के किसान की मदद कीजिए, आप हिंदुस्तान की सेना को सातवें पे कमीशन में पैसा बढ़ा कर दीजिए,ये आपका काम है, ये आपकी जिम्मेदारी है।
राहुल गांधी के इस बेतुके बयान के बाद आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मीडिया से बात करते हुए इसे बहुत धिक्कारा और कहा कि राहुल गांधी को देश के मुद्दे समझ ही नहीं आते हैं, उन्हें आलू की खेती के बारे में भी बयान देना चाहिए। आलू से राहुल का अगर कोई छुपा हुआ रिश्ता हो तो पता नहीं, लेकिन अमित शाह का यह बयान सही है कि राहुल गांधी को देश के मुद्दे समझ नहीं आते। वे लगातार बेतुकी बातें करते हैं, और जब देश में पाकिस्तान के साथ जंग की बातें हो रही हैं, सरहद से ताबूत अलग-अलग इलाकों में लौट रहे हैं, शहीदों के बच्चों की रोते-बिलखते तस्वीरें चारों तरफ आ रही हैं, तब राहुल गांधी का दलाली का ऐसा बयान पता नहीं उनकी कौन सी समझ से उपजा है।
कांग्रेस की एक बहुत बड़ी दिक्कत यह है कि वह राहुल से परे देखने की ताकत नहीं रखती, और अगर रखती भी है, तो उसे राहुल से परे देखने की इजाजत नहीं है। खुद सोनिया के परिवार में लंबे समय से उनकी दूसरी संतान के राजनीति में आने के बारे में बातें होती रहती हैं, लेकिन कुल मिलाकर कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी के ही हाथों में दे दिया गया दिखता है। और राहुल का मिजाज, उनका बर्ताव, ये सब देश के नाजुक मौकों पर या तो विदेश में छुट्टी मनाते दिखता है, और जब उन्हें ऐसे मौकों पर विदेश जाने का मौका नहीं मिलता, तो वे अटपटी की ऐसी नासमझ बातें बोलते हैं कि लोग उस पर हॅंस पड़ते हैं, और कांग्रेस का भला चाहने वाले लोग रो पड़ते हैं। लेकिन जिस राहुल के कंधों पर कांग्रेस ने अपना भविष्य टिका दिया है, वे कांग्रेस के लिए संभावना नहीं है, कांग्रेस के लिए महज एक आशंका हैं।
देश की राजनीति इस बात की गवाह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी भाजपा, और एनडीए के दूसरे दलों को जब उम्मीद से बहुत अधिक सीटें मिलीं, और खुद भाजपा हक्का-बक्का रह गई, तो उसका एक बहुत बड़ा श्रेय राहुल गांधी को भी गया है। जब देश के मतदाताओं के सामने राहुल और मोदी के बीच तुलना करने की बात आई, तो मतदाताओं के पास सोचने-विचारने का कोई मौका बचा नहीं था। कांग्रेस पार्टी को अपने इस युवराज को राजनीति सिखाने में मेहनत करनी चाहिए, हो सकता है कि कुछ बरसों में वे बेहतर हो जाएं, और बेमौके पर बेतुकी बात कहने से बचें। फिलहाल कांग्रेस पार्टी को अपने ही घर के चिराग से एक बड़ा नुकसान हुआ है, और इस पार्टी में कोई इस नुकसान को गिना भी नहीं सकते।

कल के दिन क्या सुप्रीम कोर्ट विधायकों की राय भी जानेगा और सीएम का नाम घोषित करेगा

संपादकीय
6 अक्टूबर 2016
तमिलनाडू हाईकोर्ट ने कल राज्य सरकार को एक नोटिस जारी करके कहा कि मुख्यमंत्री जयललिता की सेहत की जानकारी का बुलेटिन जारी किया जाए। वे पिछले कई दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी कोई खबर जनता को नहीं है। हिन्दुस्तान में नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी छुपाने की आदत है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां पर सरकार में बैठे हुए नेताओं को अपनी सेहत की जानकारी जनता को देनी पड़ती है। और जो सरकारें जनता के टैक्स के पैसों पर चलती हैं, उनकी एक जवाबदेही जनता के प्रति बनती भी है। लेकिन आज की बात महज जनता को मिलने वाली जानकारी नहीं है, उससे परे की भी है।
तमिलनाडू में आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि अगर जयललिता सरकार चलाने की हालत में नहीं रहती हैं, या कि जैसा कि प्रकृति का नियम है, वे अगर किसी दिन नहीं रहती हैं, तो उनका वारिस कौन होगा। अभी तमिलनाडू से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक उन्होंने किसी मंत्री या नेता का नाम लिखकर लिफाफे में बंद रखा है कि उनकी जगह अगर किसी को सीएम बनना हो, तो वह कौन हो। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब उन्हें अदालती फैसले के चलते कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, तो उनके एक करीबी सहयोगी को मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया था, और उसने सिंहासन पर जयललिता के खड़ाऊ रखकर नीचे फर्श पर बैठकर सरकार चलाने के अंदाज में काम किया था, और जिस दिन अदालती रोक हटी, फिर जयललिता मुख्यमंत्री बन गईं। अब सवाल यह उठता है कि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन की तरह अगर पार्टी की नेता अपनी मर्जी से वारिस भी तय करके जाती है, तो फिर भारत के इस लोकतांत्रिक ढांचे का क्या मतलब है, या कि यह ढांचा आखिर लोकतंत्र के नाम का कैसा ढकोसला करता है?
और यह बात महज जयललिता की नहीं है, एक नेता या एक कुनबे के राज वाली कांग्रेस सहित दर्जन भर से अधिक पार्टियों का यही हाल है। कांग्रेस में सोनिया परिवार की मर्जी से परे की कोई कल्पना भी कोई नहीं कर सकते। इसी तरह पिछले कुछ हफ्तों में उत्तरप्रदेश की राजनीति में मुलायम कुनबे का जिस तरह का अलोकतांत्रिक नाटक जनता ने देखा है, वह सबके सामने है। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी अपनी पार्टी के लिए दुर्गा माता की तरह हैं, और उधर देश के दूसरे सिरे पर कश्मीर में एक कुनबे की तीसरी पीढ़ी, और दूसरे कुनबे की दूसरी पीढ़ी के बीच लोकतंत्र पिस रहा है। ऐसे में लगता है कि भारत के संविधान में क्या ऐसे फेरबदल होने चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति की तरह दो कार्यकाल से अधिक वक्त किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को न मिले? और क्या पार्टियों के ढांचे में चुनाव आयोग के ऐसे नियम बनने चाहिए कि एक पार्टी के मुखिया के ओहदे पर एक व्यक्ति कितने समय तक रहे? या फिर अगर देश को और अधिक सुधार की जरूरत है, तो यह भी देखा जाए कि क्या बाल ठाकरे के परिवार से परे शिवसेना कुछ है? नवीन पटनायक से परे उनकी पार्टी कुछ है? और क्या आयोग की शर्तों को पूरा करने के लिए इन तमाम पार्टियों में चुनाव के नाम पर एक नाटक नहीं होता है?
भारत की जनता में लोकतंत्र के लिए सम्मान बहुत कम है। वह कुनबों को चुनती है और ढोती है, वह भ्रष्ट लोगों को चुनती है, और उनको अपना नेता मानने में गर्व महसूस करती है। उसे चुनाव में भ्रष्ट आचरण से परहेज नहीं है, उसे जेल की सजा काट रहे लोगों को चुनने से परहेज नहीं है, वह बाहुबलियों को चुन लेती है, डकैतों को चुन लेती है, बलात्कारियों को चुन लेती है। तो अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत की संसदीय चुनाव प्रणाली सचमुच अच्छी है, या इसमें किसी तरह के सुधार की जरूरत है? क्या चुनाव में उम्मीदवार बनने, और राजनीतिक दलों में किसी ओहदे पर आने के लिए जुर्म से परे रहने की शर्तों को और कड़ा किया जाना चाहिए? हम जानते हैं कि आज इस मुद्दे को छेड़ते हुए हमारे पास जवाब कम हैं, सवाल अधिक हैं। और एक दिन ऐसा आ सकता है कि बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट को जिस तरह की सख्ती करनी पड़ रही है, उस तरह की सख्ती पार्टियों के चुनाव करवाने में भी करनी पड़े, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज बैठकर विधायकों की अलग-अलग राय जाने, और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करे। आगे-आगे देखें होता है क्या।

देश के भड़काऊ माहौल में नेहरू की कमी खलती है

संपादकीय
5 अक्टूबर 2016
देश में कई जगहों पर दुर्गा और महिषासुर की कहानी को लेकर तनाव हो रहा है। कुछ दिन पहले बस्तर में एक सीपीआई भूतपूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने महिषासुर की महिमा में कुछ लिखा तो उसे लेकर हिन्दू समाज के कुछ लोगों ने पुलिस में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की पुलिस रपट दर्ज कराई। आज एक और जिले मुंगेली में किसी के सोशल मीडिया पर लिखे हुए को लेकर तनाव खड़ा हुआ है, और वहां आगजनी हो रही है। दुर्गा और महिषासुर से जुड़ी हुई जो कहानियां हैं, उनमें ये बातें पहली बार सामने नहीं आ रही हैं, ये दशकों से किताबों में दर्ज हैं, और इन्हें लेकर हिन्दुओं और आदिवासियों के बीच एक मतभेद चलते भी आया है। लेकिन अब बदली हुई हवा में जहां हर कोई बुरा मानने को तैयार बैठे दिखते हैं, वहां ऐसे तनाव खड़े हो रहे हैं।
किसी देश में समाज के भीतर दूसरों के लिए, या कि असहमति के लिए एक सहनशीलता का बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र सहनशीलता के बिना चलना नामुमकिन रहता है क्योंकि कई तबकों के अलग-अलग किस्म के संस्कार रहते हैं, रीति-रिवाज रहते हैं, उनकी मान्यताएं अलग-अलग रहती हैं, और उनके बीच किसी हिंसक टकराव के बजाय असहमत रहने पर एक सहमति जरूरी होती है। अगर ऐसा न हो तो विविधता खत्म ही हो जाए, बहुमत का ही राज होने लगे। बस्तर में जहां एक आदिवासी नेता मनीष कुंजाम की अपनी आदिवासी-मान्यताओं के खिलाफ हिन्दुओं ने रिपोर्ट लिखाई है, और मनीष कुंजाम ने यह दोहराया है कि ये बातें कोई नई नहीं हैं, और बरसों से चली आ रही आदिवासी-मान्यताओं के मुताबिक ही उन्होंने लिखा है। लेकिन आज जरा-जरा सी बात पर असहमति को हिंसा में बदलना चलन हो गया है।
हर देश में समाज में एक वैज्ञानिक सोच को विकसित करना भी जरूरी रहता है। बहुत से धर्मों के भीतर अपनी खुद की कहानियों में ऐसी बातें लिखी रहती हैं कि जिन्हें आज कोई बाहरी व्यक्ति कहे, तो लोग उबल पड़ते हैं। जैसा कि आज ताजा इतिहास को लेकर हो रहा है, लोग किसी तरह की अप्रिय बात को सुनना नहीं चाहते, यह मानना भी नहीं चाहते कि उनके इतिहास में कोई अप्रिय बात रही थी, उसी तरह लोग धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी एक कट्टरता दिखा रहे हैं, और यह महज हिन्दू धर्म के साथ नहीं है, सभी धर्मों के साथ कमोबेश ऐसी नौबत आ रही है। इसकी वजह यह है कि आज समाज में राजनीति से परे के सामाजिक नेताओं का शून्य हो गया है। और राजनीतिक नेताओं को हर नौबत में किसी न किसी तबके को नाराज करने या खुश करने में अपना एक फायदा दिखता है। फिर वह चाहे भारत-पाक सरहद के फौजी तनाव की बात हो, या फिर वह किसी धर्म या जाति की बात हो। आज सच कहना बड़ा मुश्किल हो गया है, क्योंकि सच को बर्दाश्त करना लोगों को अपना अपमान लगने लगा है।
देश में ऐसा भड़काऊ वातावरण अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों में, अलग-अलग पेशे के लोगों में बढ़ते चल रहा है। और ऐसे ही मौके पर जवाहर लाल नेहरू सरीखे नेताओं की कमी खलती है जिन्होंने नास्तिक रहते हुए भी पूरे देश का सम्मान पाया था, और जनता में वैज्ञानिक समझबूझ को विकसित करने का ऐतिहासिक काम किया था।

आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश हो

संपादकीय
4 अक्टूबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के हालात के बिना भी किसी क्रिकेट मैच को लेकर भी इतना तनाव हो जाता है कि दोनों देशों में कई लोगों को गद्दार कहा जाने लगता है, और देशभक्ति के नए पैमाने तय होने लगते हैं। एक-दूसरे के बारे में कहा जाने लगता है कि वे दुश्मन देश का साथ दे रहे हैं, या अपनी फौज का हौसला पस्त कर रहे हैं। और यह जरूरी नहीं है कि ऐसा नेताओं के बीच ही होता हो, ऐसा इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से आम लोगों के बीच भी होने लगता है, और हो रहा है।
दरअसल दुनिया की सभ्यता का इतिहास बताता है कि राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद,  धर्म या जाति के आंदोलन बिना किसी दुश्मन के धारणा के नहीं चलते। जब भारत या किसी भी दूसरे देश में राष्ट्रवाद की एक सोच को भड़काया जाता है, तो वह देश प्रेम की सोच से अलग रहती है। उसके लिए दूसरे देशों से नफरत जरूरी हो जाती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि धर्मान्धता किसी दूसरे धर्म से नफरत, और साथ-साथ विज्ञान से भी नफरत के आधार पर ही चलती है। जब जातिवाद पनपता है, तो वह किसी दूसरी जाति के खिलाफ ही पनपता है। जब क्षेत्रवाद आक्रामक होता है, तो वह अपने क्षेत्र को आगे बढ़ाने पर नहीं टिका होता, वह किसी दूसरे क्षेत्र का विरोध करने पर टिका होता है। इसलिए जब किसी देश में युद्धोमाद को बढ़ावा दिया जाता है, तो वह पड़ोसी देश के साथ तमाम किस्म के रिश्ते खत्म करने पर आमादा हो जाता है। आज भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ इसी तरह की हिंसक-बेवकूफियां चल रही हैं।
पाकिस्तान में चूंकि लोकतंत्र कमजोर है, वहां पर परमाणु युद्ध की बात करने वाले लोग कुछ अधिक हैं। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग हैं जो कि अमरीका में प्रोफेसर रह चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान की 10 करोड़ आबादी को खत्म करने के लिए वे हिंदुस्तान के 10 करोड़ लोगों को भी परमाणु युद्ध में खत्म कर देेने को बुरा नहीं मान रहे है। देशभर में ऐसे लोग फैले हुए हैं, जो पड़ोस के देश से कला, साहित्य, खेल, फिल्म, कारोबार, सभी तरह के रिश्ते तोड़ लेना चाहते हैं। और यह दीवानगी सरहद से दूर अधिक रहती है, सरहद के लोग तो आज अपना घर-बार, अपनी फसल, अपने जानवर छोड़कर दूर भेजे जा रहे हैं, और इस नुकसान की भरपाई कोई नहीं करने वाला है। खासकर जो लोग सोशल मीडिया पर रात-दिन युद्धोन्माद की बातें कर रहे हैं, उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा हुआ है। आज जो लोग चीन के सामानों के बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उसके संदेश चारों तरफ फैला रहे हैं, वे यह बात भूल गए हैं कि गुजरात में सरदार पटेल की जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बन रही है, उसका कुछ हिस्सा चीन से बनकर आ रहा है। उसके लिए भारत ने देशभर के गांव-गांव से लोहा तो इकट्ठा किया गया था, लेकिन उसका इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं यह तो पता नहीं, चीन से प्रतिमा का हिस्सा आना सार्वजनिक रूप से मान लिया गया है।
युद्ध की सोच भी खराब होती है, हिंसक होती है, और लोगों के दिल दिमाग को जहर से भर देती है। युद्ध का नुकसान सिर्फ सरहद पर नहीं होता, यह आम लोगों को भी हिंसक बना देता है। इसलिए इस देश में तमाम जिम्मेदार तबकों को आम लोगों के बीच युद्धोन्माद घटाने की कोशिश करनी चाहिए।

हॉर्न प्लीज की जगह नो हॉर्न की जरूरत

संपादकीय
3 अक्टूबर 2016
एक मजेदार खबर यह है कि ट्रकों के पीछे हॉर्न प्लीज क्यों लिखा होता है? इसके अलग-अलग कई मायने हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में यह बात बड़ी साफ है कि ट्रैफिक हॉर्न से तय होता है। अगर पीछे से कोई हॉर्न बजाते न आए तो आगे चलने वाले मुडऩे का संकेत भी नहीं देते। और बिना संकेत दिए मुडऩे वाले से कोई शिकायत करे, तो उसे आंख दिखाई जाती है कि पीछे से आ रहे थे तो हॉर्न क्यों नहीं बजाया। भारत में सबसे अधिक असभ्यता का प्रदर्शन सड़कों पर ही होता है, और वहां हर कोई अपने हक और दूसरों की जिम्मेदारी को ही देखते हुए चलते हैं, या कि गाड़ी चलाते हैं। जो लोग नियमों को मानते हुए चलना चाहते हैं उनके लिए मन में इस हसरत के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचता कि वे किसी और देश में पैदा हुए होते तो अच्छा होता।
लेकिन फिलहाल यह बात करें कि गाडिय़ों के पीछे हॉर्न प्लीज लिखा होने का क्या नतीजा होता है। सड़कों पर जब लोग लगातार ऐसा लिखा हुआ पढ़ते चलते हैं, तो उनके दिमाग में हॉर्न बजाने की बात बैठ भी जाती है। और इसके बाद जरूरत रहे, या कि न रहे, उनके हाथ हॉर्न को दबाते चलते हैं। एक मनोवैज्ञानिक असर लोगों की सोच को बदलकर रख देता है, और हॉर्न बजाने का यह उकसावा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते चलता है क्योंकि मां-बाप के साथ चलते हुए बच्चे उनको बिना जरूरत हॉर्न बजाते देखकर वही सीखते चलते हैं। किसी भी सभ्य देश को यह सीखना और समझना चाहिए कि बिना कहे हुए समाज में जो बुरे संदेश जाते हैं, उनको कैसे रोका जाए। वैसे तो भारत में इसको रोकने के लिए जो संदेश लिखे जाते हैं, उनका भी असर दिखता नहीं है, और जहां भी थूकने या पेशाब करने के खिलाफ लिखा जाता है, वहीं पहुंचकर लोगों को ऐसी हरकत सूझती है। नतीजा यह होता है कि इस देश में आने वाले पर्यटक ऐतिहासिक महत्व की जगहों पर जाकर भी बहती हुई पेशाब और दीवारों पर पीक को देखकर कांप जाते हैं।
चीन में कुछ बरस पहले तक लोगों को खखारकर थूकने की बड़ी बुरी आदत थी और सड़कों के किनारे लोग ऐसा करते चलते थे। फिर जब चीन का विदेश व्यापार बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय संबंध बढ़े, तो कारोबार को ध्यान में रखते हुए चीन की सरकार ने अपने स्कूल-कॉलेज से ही अंग्रेजी के साथ-साथ ऐसी तहजीब देकर लोगों को निकालना देकर शुरू किया कि वे दुनिया के दूसरे देशों में जाकर भी देश का नाम न डुबाएं। जो हिन्दुस्तानी बाहर जाते हैं, उन्हें कई महीने यह समझने में लग जाता है कि ऐसा हॉर्न बजाने पर दुनिया के सभी सभ्य देशों में बड़ा भारी जुर्माना हो सकता है। भारत में लोगों को तमीज सिखाने की जरूरत है, क्योंकि अब बढ़ते हुए शोर की वजह से लोगों की मानसिक सेहत भी खराब होने लगी है, और ऐसे प्रदूषण का एक बड़ा कारण सड़कों पर गैरजरूरी हॉर्न भी है।

बस्तर के नक्सलियों से बातचीत की जरूरत

संपादकीय
2 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक तरफ तो पुलिस की अगुवाई में केन्द्र से आए हुए सुरक्षा बल भी नक्सलियों से मोर्चा लेने में लगे हुए हैं, और दूसरी तरफ राज्य सरकार नक्सल कब्जे से छूटते हुए इलाकों में काम करने की कोशिश भी कर रही है। आए दिन सरकार की तरफ से ब्यौरा जारी होता है कि बस्तर में कौन-कौन से निर्माण कार्य शुरू हुए हैं, कौन से पूरे हुए हैं, और कौन से चल रहे हैं। अभी जब हम यह बात लिख रहे हैं तब बस्तर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सरकार की विकास योजनाओं और कामयाबी के बारे में भाषण दे ही रहे हैं। पिछले दिनों कई कार्यक्रमों में उन्होंने बस्तर की पुलिस की भी इस बात को लेकर तारीफ की, कि वह बहुत अच्छा काम कर रही है।
दूसरी तरफ बस्तर में काम करने वाले कई पत्रकारों और सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार आंदोलनकारियों और वकीलों का लगातार यह आरोप जारी है कि बस्तर की पुलिस नक्सली बताकर बेकसूरों को मार रही है, आदिवासी लड़कियों के साथ बलात्कार कर रही है, और बेकसूरों को जेल डाल रही है। पुलिस और सामाजिक क्षेत्र के बीच बरसों से चल रहे इस टकराव के बीच बस्तर में समय-समय पर कुछ ऐसे सामाजिक संगठन भी सामने आए हैं जिनके बारे में लोगों को यह शक रहा कि वे पुलिस द्वारा प्रायोजित हैं, और पुलिस की तमाम ज्यादतियों पर पर्दा डालने के लिए, इसका विरोध करने वाले लोगों को नक्सली ठहराने के लिए बनाए गए हैं। यह टकराव भी बस्तर में खूब चल रहा है, और यह नया भी नहीं है। एक वक्त बस्तर के कलेक्टर रहे हुए पुराने वक्त के आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा जब सामाजिक आंदोलनकारी की हैसियत से बस्तर गए थे, तो उन पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगाकर उनके कपड़े फाड़े गए थे, और शायद उनके चेहरे पर कालिख भी पोती गई थी। उनके अलावा स्वामी अग्निवेश का भी वही हाल हुआ था, और छत्तीसगढ़ के बाहर से आने वाले कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कई पत्रकारों का बस्तर में यही हाल किया गया। कुल मिलाकर वहां एक ऐसा माहौल दिखता है कि जो कोई पुलिस के साथ पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं है, उसकी उठाई गई हर आवाज नक्सल-समर्थक नारा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का मिजाज जानने वाले लोग यह जानते हैं कि वे बस्तर किस्म की असंवैधानिक हिंसा की हिमायती नहीं हो सकते। लेकिन आज हकीकत यही है कि बस्तर के बेकसूर आदिवासी एक तरफ नक्सलियों के हाथों अपना गला कटवा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर में पुलिस का एक किस्म से राज ही कायम है, और वहां पर पुलिस को जो नापसंद हैं, उनके कोई लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हैं। यह नौबत इस वजह से भी आई हुई हो सकती है कि नक्सल मोर्चे पर बस्तर के बड़े पुलिस अफसर जिस तरह की हथियारबंद कामयाबी पा रहे हैं, उसे दिखाकर वे अपनी बाकी बातों के लिए एक किस्म की मंजूरी सरकार से पा रहे हैं। हमारा यह मानना है कि सरकार को इन दोनों बातों को अलग-अलग करके देखने की कोशिश करनी चाहिए, और असल नक्सलियों को मारने में कामयाबी पाने से किसी को सामाजिक आंदोलनों को कुचलने की इजाजत, मीडिया का गला घोंटने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। नक्सलियों की लाशें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन इतिहास बेकसूरों पर ज्यादती को भी बड़ी गंभीरता से दर्ज करता है।
आज छत्तीसगढ़ के बाहर इस राज्य के बारे में अगर कोई एक बात सरकार के खिलाफ जाती है, व्यापक प्रचार पाती है, तो वह बस्तर के इलाके में पुलिस ज्यादतियों की है। हमारा यह मानना है कि नक्सलियों को मारने के लिए बाकी लोगों पर ज्यादती करने की कोई जरूरत नहीं है, और न ही यह न्यायसंगत है कि पुलिसिया कामयाबी पाने वाले को ज्यादती करने की छूट दे दी जाए। राज्य सरकार को आज उसके साथ योजना मंडल में काम करने वाले भूतपूर्व मुख्य सचिव सुनील कुमार सरीखे किसी अधिकारी का इस्तेमाल करके नक्सलियों से बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले बस्तर में एक कलेक्टर का अपहरण हुआ था, तब उनके साथ बातचीत करने वाले सरकारी लोगों में सुनील कुमार भी थे। उनको आदिवासी मामलों की समझ भी है, और वे पहले ऐसी समझौता और शांति की बात कर भी चुके हैं। उनके जैसे कुछ और लोग भी हो सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी बातचीत की पहल करनी चाहिए। बंदूकों का मोर्चा चलते रह सकता है, लेकिन उसकी लागत बहुत अधिक आ रही है, रूपयों के खर्च में भी, और बेकसूर आदिवासियों के अधिकारों की शक्ल में भी।

पाकिस्तान से परमाणु खतरा न सिर्फ भारत को, बल्कि अमरीका सहित पूरी दुनिया को

संपादकीय
1 अक्टूबर 2016
भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे मौजूदा तनाव को लेकर हम बार-बार कुछ अधिक लिखना तो नहीं चाहते, लेकिन एक मुद्दा ऐसा है जिसे ऐतिहासिक संदर्भों में देखते हुए उस पर लिखना ही होगा। यह तनाव बढ़ता है तो भी यह लिखना माकूल होगा, और अगर खत्म होता है, तो भी। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की सरकार के बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए गैरफौजी लोगों ने भी परमाणु हथियारों को लेकर बड़ी गैरजिम्मेदारी के बयान दिए हैं। वहां के मंत्रियों ने भी यह साफ-साफ कहा कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियार रखने के लिए नहीं बनाए हैं, जरूरत पडऩे पर वह उनका इस्तेमाल भी करेगा। और ऐसे ही बयानों को देखते हुए अमरीका ने आज एक आम नसीहत दी है कि परमाणु हथियारों के बारे में उनसे लैस देशों को बयान भी जिम्मेदारी से देने चाहिए। यह बात सिर्फ पाकिस्तान पर इसलिए लागू होती है कि भारत में सरकार और फौज की तरफ से परमाणु हथियार शब्द का भी इस्तेमाल नहीं हुआ है। और इस देश के एक बहुत ही भयानक बड़बोले और गैरजिम्मेदार भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जरूर यह कहा है कि भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए और परमाणु युद्ध में भारत के दस करोड़ लोग मारे जाएं तो भी परवाह नहीं करनी चाहिए क्योंकि पाकिस्तान पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों को खुद भाजपा के भीतर कोई गंभीरता से नहीं लेते हैं क्योंकि वे आए दिन अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ भयानक सनसनीखेज आरोप लगाते रहते हैं, और मंत्रियों को हटाने की मांग करते रहते हैं। इसलिए स्वामी के बयान को न तो भाजपा का बयान माना जा सकता है, न ही मोदी सरकार का।
अभी दो दिन पहले ही हमने एक खबर छापी है कि अगर भारत और पाकिस्तान में परमाणु युद्ध होता है तो करीब दो करोड़ लोग मारे जाएंगे, और इससे मौसम पर जो असर पड़ेगा, उससे फसल पर पडऩे वाली मार से दसियों करोड़ लोग दुनिया में और मारे जाएंगे। ये आंकड़े मोटे तौर पर दोनों देशों के पास मौजूद परमाणु हथियारों के अंदाज को लेकर निकाले जाते हैं, और दुनिया यह उम्मीद करती है कि ऐसी नौबत नहीं आएगी, और इन दोनों देशों के जो मददगार या दोस्त देश हैं, उनमें से अमरीका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियां तनाव को उतना बढऩे से रोकने के लिए बहुत कुछ करेंगी। लेकिन आज ही अमरीकी मीडिया में वहां के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का भी एक ऑडियो तैर रहा है जिसमें अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन ने इस आशंका को लेकर चिंता व्यक्त की है कि पाकिस्तान में जेहादियों की पहुंच यदि परमाणु हथियारों तक हो गई तो वहां से परमाणु आत्मघाती हमलावर तैयार हो सकते हैं। उन्होंने कहा- हम इस भय में जीते हैं कि वहां एक तख्तापलट होगा, यह कि जेहादी सरकार पर अपना नियंत्रण कर लेंगे, वे परमाणु हथियारों तक पहुंच बनाएंगे और आपको आत्मघाती परमाणु हमलावरों से जूझना पड़ेगा।
दुनिया को अब यह लगभग भूल चला है कि एक वक्त भारत परमाणु हथियारों के खिलाफ चलने वाले आंदोलन का एक बड़ा प्रमुख नेता था। और कुछ दशक पहले परमाणु निशस्त्रीकरण शब्द लगातार खबरों में बने रहता था क्योंकि दूर की सोचने वाले लोगों को यह अंदाज था कि ऐसी बेकाबू नौबत किसी दिन आ सकती है। और अगर आज भारत और पाकिस्तान से परे देखें, तो उत्तर कोरिया का बददिमाग तानाशाह लगातार अमरीका को परमाणु हथियारों की धमकी देते रहता है, और यह धमकी बहुत फर्जी भी नहीं है, क्योंकि उत्तर कोरिया ने परमाणु हमले की ताकत हासिल कर रखी है।
पाकिस्तान एक बहुत ही कमजोर लोकतंत्र है, और वहां पर कोई बददिमाग या बेदिमाग फौजी अफसर या तानाशाह, या कि कोई धर्मांध आतंकी गिरोह आत्मघाती अंदाज में परमाणु हथियारों पर कब्जा करके उनका इस्तेमाल सबसे करीबी निशाने, हिन्दुस्तान पर कर सकते हैं। यह खतरा एक हकीकत है, और ऐसे खतरे के चलते हुए हिंदुस्तान की सरकार अगर पाकिस्तान के ऐसे परमाणु ठिकानों के खिलाफ कोई फौजी कार्रवाई करती है, तो वह वैसी ही होगी जैसी कि इराक पर अमरीका ने की थी। इराक के खिलाफ तो बुश ने गढ़े हुए झूठे सुबूतों के सहारे हमले को न्यायसंगत ठहराया था, लेकिन पाकिस्तान के खतरे को तो अमरीका सहित बाकी दुनिया ठीक से जान रही है। और एक नौबत ऐसी भी आ सकती है कि भारत नहीं, दुनिया के दूसरे देश पाकिस्तान की परमाणु क्षमता पर ठीक उसी तरह की रोक लगाने को मजबूर हों, जैसी रोक अभी ईरान की परमाणु क्षमता पर अमरीका और बाकी देशों ने लगाई हुई है। अमरीका को पता नहीं यह कब समझ आएगा कि उससे मिलने वाली मदद से पाकिस्तान एक ऐसा खतरा बन रहा है जो कि किसी दिन अमरीका पर हमला करने वाले आतंकी लोगों को हथियार दे सकता है।