बुराई के प्रतीक को मारना आज की सहूलियत का...

संपादकीय
10 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान के कई प्रदेशों में कल दशहरे पर रावण को जलाने की तैयारी चल रही है, और कई इलाके ऐसे भी रहेंगे जहां रावण नहीं जलाया जाता। दक्षिण भारत के बहुत से लोग और छत्तीसगढ़ में भी बस्तर के आदिवासी रावण नहीं जलाते। इनके अपने अलग-अलग सांस्कृतिक कारण हो सकते हैं, और दक्षिण के कई लोगों का यह मानना है कि रावण एक बड़ा विद्वान ब्राम्हण था, और उसे मारना गलत था। बाकी जगहों पर इसकी अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, लेकिन हम उसकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते। अभी हमारे ही अखबार के पन्नों पर लगातार यह बहस चल रही है कि दुर्गा के हाथों महिषासुर के मारे जाने की कहानी क्या आदिवासी विरोधी है? क्या महिषासुर आदिवासियों का देवता है और उसकी पूजा के साथ दुर्गा की पूजा का एक सांस्कृतिक टकराव है? हमने इस बहस के सभी पहलुओं के लिए बहुत सी जगह पन्नों पर निकाली, और इस कॉलम में भी इस बारे में लिखा। लेकिन आज मौका रावण के बारे में कुछ बातें करने का है।
रावण के दस सिरों को दस बुराइयों के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है, और राम के हाथों उसके मारे जाने की कहानी में यह दिन रावण के वध का रहता है। रावण अगर कहीं पर कोई रहा होगा, तो वह तो मर गया, लेकिन बुराई के प्रतीक को हर बरस सजाकर, खड़ा करके, उसे जलाकर मारने के बाद लोग तसल्ली से घर लौटते हैं, और एक-दूसरे को सोने की पत्ती देकर मुबारकबाद देते हैं। नतीजा यह होता है कि बुराई को मारने के लिए साल का एक दिन तय हो गया है। और इस दिन भी अपने भीतर के किसी रावण को मारने की कोई बात नहीं होती, क्योकि बांस और रंगीन कागज से बनाए गए रावण को आग लगाकर खत्म करना अधिक सुहाना लगता है, और उससे अपनी आत्मा को कोई कष्ट भी नहीं होता। अपने भीतर की दस बुराइयों को खत्म करने की कोई सोचे, तो उससे बहुत तकलीफ होगी, और सुख-सुविधा, सहूलियतें छिन जाएंगी। किसी की दो नंबर की कमाई कम हो जाएगी, किसी को पड़ोसन को बुरी नजर से देखना बंद करना पड़ेगा, और किसी को दारू या सिगरेट छोडऩा पड़ेगा। ऐसी दस भीतरी बुराइयों को छोडऩे का मतलब तो जिंदगी का पूरा रूख ही बदल देना हो जाएगा, और ऐसा करना इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है। नतीजा यह है कि इस असुविधा से बचने के लिए एक ऐसे प्रतीक को गढ़ लिया गया है जो कि विरोध नहीं कर सकता, वकील नहीं कर सकता कि उसके साथ हर बरस यह ज्यादती होती है।
और मजे की बात यह भी है कि यह प्रतीक कुछ कमजोर न दिखे, इसलिए इसे खूब सुहावना बनाया जाता है, सजाया जाता है, और आतिशबाजी के साथ उसे निपटाया जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकार के इंतजाम में रावण दहन का जो सबसे बड़ा कार्यक्रम होता है, उस कार्यक्रम में तो इस बरस एक बड़ी भारी चूक होते-होते रह गई। अखबारों में यह खबर छपी कि इस बार रावण को गुजरात के राजा की तरह सजाकर जलाया जाएगा। अब इसका गुजराती समाज ने विरोध किया कि रावण न तो गुजरात का था, और न ही गुजराती था, फिर उसे गुजरात के डेढ़ हजार मीटर कपड़े से सजाकर क्यों जलाया जा रहा है। इस विरोध के बाद प्रशासन ने भी दखल दी, और रावण को उसके मूल स्थान लंका या श्रीलंका के हिसाब से ही माना गया, और गुजरात के राजा के नाम पर होने जा रही एक बड़ी राजनीतिक चूक टल गई।
फिलहाल इस देश में ऐसे प्रतीकों से आजादी पाने की जरूरत है जिन्हें मारकर आम लोग राहत की सांस लेते हैं कि उन्होंने बुराई को मार डाला है। ऐसे प्रतीक सामाजिक परंपराओं से हटाने चाहिए क्योंकि इनके चलते हुए लोगों को अपने भीतर की बुराइयां दिखती भी नहीं हैं। जिस तरह स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर लोग देशभक्ति के गाने बजाकर, कारों पर छोटे से झंडे लगाकर, या कि सरहद पर पड़ोसी देश से टकराव के दिनों में देशभक्ति के संदेश फैलाकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं, उसी तरह दशहरे पर रावण को मारा जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और बुराई के नाम पर इतिहास के प्रतीक को मारना काफी नहीं रहना चाहिए, आज की मौजूदा हकीकत की भी बात होनी चाहिए। 

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