अमन के गीतकार को नोबल मिलना एक महत्वपूर्ण बात

संपादकीय
14 अक्टूबर 2016
अमरीका के एक गीतकार और गायक बॉब डिलन को नोबल साहित्य पुरस्कार कुछ लोगों को अटपटा लग रहा है क्योंकि उनकी पहचान गीतकार से अधिक गायक के रूप में है, और लोगों को लग रहा है कि साहित्य के लोगों का एक मौका इससे घट जा रहा है। लेकिन इस पुरस्कार को कई संदर्भों में देखने की जरूरत है। पिछली आधी सदी से बॉब डिलन अमरीका में युद्ध विरोधी गीतकार और गायक के रूप में जाने जाते हैं, और कई बार उनके नाम को लेकर यह चर्चा भी होती थी कि उन्हें साहित्य या शांति का नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए। उनके युद्ध विरोधी गीत दुनिया भर में फैले हुए थे, और उनसे राजनीतिक जनचेतना उठती थी।
अब अगर यह देखा जाए कि साहित्य के पैमाने पर उनके गीत अगर कमजोर बैठते हैं, और दुनिया के बाकी कुछ साहित्यकार इस पैमाने पर ऊपर जाते हैं, तो इसके साथ-साथ साहित्य के सामाजिक योगदान को भी देखना चाहिए। साहित्य सिर्फ भाषा नहीं रहता, साहित्य सिर्फ कोई विधा या शैली भी नहीं रहता, साहित्य तो समाज से जुड़े रहने वाली एक ऐसी रचनात्मकता है जिसके योगदान को अनदेखा करके उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। बहुत से साहित्यकार आलोचकों के बीच ऊंचे दर्जे के गिने और माने जाते हैं, लेकिन प्रकृति और प्रेम की उनकी अमूर्त बातों का सामाजिक योगदान उनकी रचनाओं जितना ही अमूर्त रहता है। दूसरी तरफ सामाजिक और राजनीतिक चेतना, संघर्ष और इंसाफ की लड़ाई की बात करने वाली साहित्यिक रचनाओं का योगदान बहुत बड़ा रहता है। हम साहित्य को महज आलोचकों के मूल्यांकन का सामान नहीं मानते, और हमारे हिसाब से इसके योगदान के बिना इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग क्रांति की बातें करते हैं, मजदूर संघर्ष की बात करते हैं, बराबरी के हक की बात करते हैं, उनके साहित्य का महत्व इतिहास में दर्ज होता है, और ऐसे तमाम लोग बाकी किस्म के साहित्यकारों के मुकाबले अधिक खतरे झेलते हुए, अधिक अभाव और नुकसान झेलते हुए काम करते हैं। जो लोग दूसरों के लिए लड़ते हैं, उनके भले के लिए अपना बुरा झेलने को तैयार रहते हैं, वैसे गीतकार मानवीय प्रेम या प्रकृति के गीतकारों के मुकाबले अधिक अहमियत वाले रहते हैं।
आज नोबल साहित्य पुरस्कार कमेटी ने जब इस नाम को चुना होगा, तो हमें भरोसा है कि आज दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे तरह-तरह के युद्ध और गृहयुद्ध पर उनकी नजर रही होगी। आज दुनिया में अमन-चैन की जरूरत पहले के मुकाबले कहीं अधिक है, और ऐसे में युद्ध विरोधी सोच को बढ़ावा देने वाले गीतकार का ऐसा सम्मान एक सामाजिक और राजनीतिक हकीकत का सम्मान भी है, और साहित्य को ऐसी हकीकत से अलग करके देखना कम से कम हमें जरा भी मंजूर नहीं है। साहित्य आलोचकों के लिए नहीं होता, वह महज साहित्यकारों के लिए भी नहीं होता, वह आम जनता के लिए होता है, और सीधी-सपाट बात से अमन के गीत गाने वाला सम्मान पाकर आज की जरूरत को भी सामने रख रहा है।

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