लोकतंत्र में फौज को लेकर भावनात्मक उन्माद खतरनाक

संपादकीय
15 अक्टूबर 2016
पाकिस्तान पर भारतीय सेना के एक सर्जिकल स्ट्राईक के बाद से देश पर राज कर रहे गठबंधन की मुखिया भाजपा से लेकर विपक्षी कांग्रेस और बाकी राजनीतिक दलों, धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों, इन सबके बीच सेना को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। और सेना की कार्रवाई पर पाकिस्तान की तरफ से उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए भारत में जिन लोगों ने सरकार से मांग की, उन लोगों को बात की बात में देशद्रोही करार दे दिया गया। इसके बाद सेना को लेकर माहौल इतना संवेदनशील हो गया है कि सेना का लोग स्वागत किस तरह से करें, उनका सम्मान कैसे करें, इसके बारे में तरह-तरह के सुझाव हवा में तैरने लगे, और उन्हें राष्ट्रप्रेम के लिए एक अनिवार्य सुबूत की तरह मांगा जाने लगा है। फिर बात की बात में चीनी सामानों के बहिष्कार की बात होने लगी, पाकिस्तानी कलाकारों को वापिस भेज दिया गया, और इस हो-हल्ले में यह बात तो पूरी तरह अनदेखी कर दी गई कि भारत के कुछ सबसे बड़े उद्योगपति किस तरह पाकिस्तान के कुछ सबसे बड़े उद्योगपतियों के साथ मिलकर साझा कारोबार कर रहे हैं, और ये दोनों ही खेमे अपने-अपने देश के प्रधानमंत्रियों के कितने करीबी हैं, और किस तरह सजन जिंदल जैसे भारतीय उद्योगपति की पहल या दखल से मोदी और शरीफ की मुलाकातें हुईं। मतलब यह कि बड़े-बड़े कारोबारी और बड़े-बड़े काम तो जारी रहें, हजारों करोड़ का कारोबार चलता रहे, लेकिन किसी कलाकार या खिलाड़ी को लेकर देशनिकाला मांगा जाए और इसका विरोध करने वालों को गद्दार करार दिया जाए।
किसी भी लोकतंत्र में सभ्य समाज को यह बात याद रखना चाहिए कि ऐसा उग्र राष्ट्रवाद किसी दुश्मन का नुकसान तो सरहद पर जंग छिडऩे पर ही कर सकता है, लेकिन अपने खुद के लोगों की लोकतांत्रिक सोच, इंसानी सोच का नुकसान तो वह बिना जंग के भी, अमन के दौर में भी करते ही रहता है। आज भारत में जो लोग भी जंग के फतवे हवा में उछाल रहे हैं, वे लोग इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि सरहद पर गोला-बारूद और फौजी खर्च के बिना भी हिन्दुस्तान दुनिया के सबसे गरीब और भुखमरी वाले देशों में से एक है, और अभी इसी हफ्ते सामने आए आंकड़े बताते हैं कि किस तरह दुनिया की भूख की फेहरिस्त में भारत पड़ोस के गरीब देशों के मुकाबले भी बदहाल है। जो लोग जंग की बातें करते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसे बयान जारी करने वालों की खीर में से केसर भी कम नहीं होगी, लेकिन गरीबों के लिए अनाज, उनकी पढ़ाई, उनका इलाज, उनका पानी, यह सब कुछ एक जंग छीनकर ले जा सकती है। और जंग से पहले भी हवा में एक गैरजरूरी हिंसक सोच जिस तरह एक झंडे की शक्ल में फहरा रही है, वह भयानक है।
फौज को न सिर्फ एक राजनीतिक हथियार की तरह, चुनावी हथियार की तरह, राष्ट्रवाद के हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू हो गया है, और यह एक भयानक नौबत है। बिना सोचे-समझे यह बात भी हो रही है कि फौज को खुली छूट दी जाए, फौज ने सर्जिकल स्ट्राईक का फैसला लिया, या उसे ऐसा लेने का हक दिया जाए। ऐसा कहने वाले लोगों को बगल के पाकिस्तान को देख लेना चाहिए कि किस तरह वहां फौज को राजनीतिक या जंग के फैसले लेने की इजाजत दी जाती है तो उससे किस तरह फौजी तानाशाही का खतरा खड़ा होता है। दुनिया में पाकिस्तान ऐसे खतरे की सबसे बड़ी मिसाल है, और इस मिसाल को अनदेखा करके आज भारत के कुछ लोगों का धर्मोन्माद फौज को इस तरह से बढ़ावा दे रहा है कि वह देश की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार से परे या उससे ऊपर एक ताकत रहना चाहिए। भारत का संविधान इस तरह की व्यवस्था के लिए बना हुआ नहीं है। और इसके खतरे अनदेखा करके आज फौज को लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी ऊपर जिस तरह से बिठाया जा रहा है, वैसी अंधभक्ति खुद फौज के काम की नहीं है, उसके फायदे की नहीं है। अंधविश्वास का सबसे बड़ा नुकसान उसको होता है जिस पर अंधविश्वास होता है। भारत में ऐसे सैनिक-सपनों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए कि फौज जब बनाई गई है, तो सरहद के फैसले फौज को लेने देना चाहिए।

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