बीसीसीआई के मामले में काटजू का यह बयान ठीक लगता है कि कपड़े उतार कोड़े लगाएं...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2016
भारत में क्रिकेट को नियंत्रित करने वाला संगठन बीसीसीआई कम से कम तीन बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों की काबू वाली संस्था है, और इसका सैकड़ों करोड़ का बजट है, यह हजारों करोड़ तक शायद कारोबार करता है, और इसी के दम पर यह संगठन लगातार सुप्रीम कोर्ट से ऐसा टकराव ले रहा है जिसे देखकर देश की गरीब और बेबस जनता हक्का-बक्का है। लगातार यह सुप्रीम कोर्ट को उसकी औकात दिखा रहा है, और अपने आपको सूचना के अधिकार से परे मानता है, पांच सितारा होटलों से यह संस्था चलाता है, और देश के क्रिकेट खिलाड़ी इसके बंधुआ मजदूर बनकर खेलते हैं, या फिर उनके पास क्रिकेट से बाहर हो जाने की भी एक पसंद रहती है। लेकिन अकेले बीसीसीआई के मुद्दे पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, और इसके साथ-साथ एक दूसरा मुद्दा है जिसे जोड़कर ही हम यहां लिखना चाहते हैं।
सहारा नाम की एक कंपनी के रहस्यमय कारोबार के चलते उसके मुखिया महीनों से जेल में है, और सुब्रत राय सहारा की जमानत को लेकर, पैरोल को लेकर, जेल से उनके दफ्तर चलाने को लेकर जितनी छोटी-छोटी बातों पर सुप्रीम कोर्ट अपना वक्त दे रहा है, और अब तक शायद देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले की सुनवाई में सेंचुरी पूरी कर चुकी है, और ऐसी ही सेंचुरी बीसीसीआई की सुनवाई में भी जज लगा चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि देश की यह सबसे बड़ी अदालत जहां पर जनता के हित के मामले महीनों के इंतजार के बाद मिनटों का वक्त भी शायद ही पाते हों, वहां पर इन दो धनकुबेरों के लिए अदालत आखिर इतना वक्त कैसे निकालती है, क्यों निकालती है, और ऐसी अदालत देश के उन बाकी तमाम करोड़ों लोगों को चेहरा कैसे दिखाती है, जिनकी रोजी-रोटी, भूख-प्यास, और जिंदगी से जुड़े हुए बुनियादी मुद्दों के मामले इसी अदालत में कतार में खड़े-खड़े दम तोड़ते दिखते हैं।
करोड़ों की फीस लेने वाले अरबपति वकीलों को ऐसे मुवक्किलों के लिए सुप्रीम कोर्ट का इतना वक्त कैसे मिलता है, यह भी हैरान करने वाली बात है। ऐसे बददिमाग लेकिन ताकतवर लोगों को देश की सबसे बड़ी अदालत में बात-बात पर इतने मौके मिलना, इतने किस्म की रियायत मिलना, एक वकील पर अदालत के भड़कने के बाद घर से उठकर आए हुए दूसरे वकील को फिर अदालत से समय मिल जाना, यह सब देश के लोकतंत्र पर भरोसा घटाता है। हमारा यह मानना है कि ऐसे बददिमाग रईस लोगों को अदालतों में कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए, और भारत के कानून में यह फेरबदल भी करना चाहिए कि जब इतने पैसे वालों पर अदालत का वक्त लगता हो, तो ऐसे लोगों से उसकी भरपाई भी करवानी चाहिए, चाहे वे वादी हों, या प्रतिवादी हों। यह एक किस्म का अदालती टैक्स रहेगा, और उस पैसे का इस्तेमाल गरीबों को कानूनी राहत देने के लिए किया जा सकता है।
फिलहाल जिस मुद्दे से बात शुरू हुई थी, उस पर लौटें तो बीसीसीआई देश की सबसे बड़ी अदालत को जिस तरह की हेकड़ी दिखा रहा है, उस पर कुछ लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए। हमारा कोई भरोसा अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों पर नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ही एक रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू की यह बात ठीक लगती है कि बीसीसीआई के पदाधिकारियों के कपड़े उतारकर उन्हें कोड़े लगाने चाहिए।

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