मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2016
बिना जरूरत और बिना मतलब कहना सार्वजनिक जीवन में खासी दिक्कत खड़ी कर सकता है। आमतौर पर खबरों में एक अच्छे इंसान की तरह दिखाए जाने वाले भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर अपने एक बयान से एक निहायत ही गैर जरूरी विवाद में फंसे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय फौज ने पाकिस्तान पर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया, उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच का फायदा मिला था। अब इस बात का कोई तुक नहीं बनता कि एक ऐसी फौजी कार्रवाई को संघ से जोड़कर रक्षामंत्री लोगों को इस हमले और संघ पर चौतरफा टिप्पणी करने का मौका दिया। अच्छे भले समझदार लोग भी माइक सामने आते ही बेमतलब बातें करने लगते हैं, और पिछले दो बरस में कम से कम आधा दर्जन बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उनकी पार्टी की तरफ से अनौपचारिक सार्वजनिक बयानों में पार्टी के नेताओं को चुप रहने की नसीहत दी गई है। किसी भी मुद्दे को तबाह करना हो, तो उसकी गंभीरता से परे कोई ओछी या बेतुकी बात छेड़ दी जाए, तो मुद्दा धरे रह जाता है, और बेतुकी बातों पर लाठियां चलने लगती हैं।
यह पता नहीं सोची समझी बात रहती है, या कि महज संयोग है कि यूपीए के रक्षामंत्री एके एंटोनी और मनोहर पर्रिकर, दोनों ही अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। और राजनीति में इनको ईमानदार भी माना जाता है। चूंकि किसी भी देश में फौजी खरीदी में सैकड़ों करोड़ से लेकर हजारों करोड़ तक के भ्रष्टाचार की खबरें रहती हैं, और ऐसे में दिखावे के लिए एक ईमानदार मंत्री सरकारी की साख के लिए अच्छा साबित होता है। लेकिन ऐसे अच्छे मंत्री को सरकारी काम से परे सार्वजनिक बयानों में भी अच्छा बने रहना चाहिए, और मनोहर पर्रिकर ने हिंदुस्तानी फौज की एक कार्रवाई को लेकर यह निहायत गैरजरूरी बयान दिया है। भारत की फौज की तारीफ इसलिए नहीं हो सकता है कि वह किसी संगठन की सोच के मुताबिक फौजी कार्रवाई करे। उसकी तारीफ तभी हो सकती है, जब वह एक अच्छी फौज की तरह कार्रवाई करे।
सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर वैसे भी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में लगी भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उसे भाजपा की एक जीत साबित करने पर उतारू है, वह तरीका भी भारतीय फौज का सम्मान करने का नहीं है, और वह उसकी एक साधारण कार्रवाई को राजनीतिक रूप से दुहने का काम है, जो कि नहीं किया जाना चाहिए। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें